बलात्कार पर मौत की सज़ा की सिफ़ारिश नहीं

 बुधवार, 23 जनवरी, 2013 को 19:09 IST तक के समाचार

दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में गठित समिति ने बलात्कार के दोषी व्यक्ति को मृत्युदंड की सिफ़ारिश से इनकार किया है.

समिति ने हर स्तर पर व्यापक प्रशासनिक सुधारों की सिफ़ारिश की है और कहा है कि पहले से मौजूद क़ानूनों को लागू किया जाए तो भी ऐसे अपराधों से निपटा जा सकता है.

दिल्ली में न्यायमूर्ति वर्मा, गोपाल सुब्रहम्ण्यम और जस्टिस लीला सेठ ने एक प्रेस कॉनफ़्रेंस के दौरान इस रिपोर्ट को जारी किया. ये हैं रिपोर्ट की कुछ मुख्य सिफ़ारिशें:

  • बलात्कार का अपराध ‘दुर्लभतम’ अपराधों की श्रेणी में नहीं आता क्योंकि इसमें कई बार हत्या की मंशा साबित करना मुश्किल होता है. इसलिए इसके लिए मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता.
  • बलात्कार जैसे अपराध के दौरान अगर पीड़ित की हत्या कर दी जाती है या फिर वो इस कदर घायल हो जाता है कि सामान्य जीवन बिताने लायक नहीं रहता तो अपराधी की न्यूनतम सज़ा उम्रक़ैद होनी चाहिए.
  • यौन अपराधों की परिभाषा को व्यापक किया गया है और इसमें परेशान करना, ताकाझाँकी, छेड़छाड़, यौन इरादे से छूना आदि शामिल है. इन अपराधों के लिए तीन से पाँच साल तक की सज़ा का प्रावधान किया गया है.
  • बलात्कार की शिकार महिला की मेडिकल जाँच को आसान बनाया जाए.
  • पुलिस पूछताछ में संवेदनशील तरीके से पेश आया जाए और जाँच प्रक्रिया और सुनवाई जल्दी पूरी हो.
  • कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी राज्यों में तैनात सैनिक, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के लोग अगर यौन अपराध करते हैं तो उन पर आम अदालत में मुकदमा चलाया जाए और विशेष कानून के तहत उनका बचाव न किया जाए.

न्यायमूर्ति जेएस वर्मा की अध्यक्षता में गठित समिति को राज्यों के पुलिस महानिदेशकों से ठंडी प्रतिक्रिया मिली और अधिकतर का जवाब नहीं आया.

जस्टिस वर्मा ने बताया कि उन्हें 80,000 जवाब मिले लेकिन सरकारी विभागों और मंत्रालयों का रवैया ठंडा रहा. उन्होंने उम्मीद ज़ाहिर की कि सरकार इस रिपोर्ट पर संसद में बहस करवाएगी.

पुलिस निदेशकों की कड़ी आलोचना करते हुए न्यायमूर्ति वर्मा ने कहा कि उनकी ओर से कोई जवाब नहीं आया. उन्होंने कहा जिस तरीक़े से पुलिस महानिदेशकों ने पैनल की अपील को नज़र अंदाज़ किया उसे देखते हुए उनकी नियुक्तियों की समीक्षा की जानी चाहिए.

वर्मा ने इस बात पर अचरज जताया कि दिल्ली में गैंगरेप की घटना के बाद गृह सचिव ने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को शाबासी दी.

अशांत क्षेत्र

रिपोर्ट में कहा गया है कि कश्मीर, उत्तर-पश्चिमी राज्यों, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे संघर्ष के इलाक़ों में महिलाओं की सुरक्षा का इंतज़ाम करवाया जाना चाहिए.

रिपोर्ट के मुताबिक़ सुरक्षा बलों द्वारा इन इलाकों में बलात्कार को आम अपराध की श्रेणी में लाया जाना चाहिए.

नीरज कुमार

दिल्ली के पुलिस आयुक्त की पीठ थपथपाए जाने पर भी जस्टिस वर्मा ने उठाए सवाल

सशस्त्र सेना विशेष अधिकार अधिनियम की तुरंत समीक्षा करने की ज़रूरत पर बल दिया गया है.

रिपोर्ट पेश करते हुए इस समिति की ओर से बताया गया कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पुलिस व्यवस्था के उनके अधीन नहीं होने का मसला उठाया. मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस उप राज्यपाल के मार्फत गृह मंत्रालय के तहत है इसलिए वे कुछ नहीं कर पाए. इस धुंध को जल्दी से स्पष्ट किया जाए.

कमेटी ने केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभागों से भी आँकड़े माँगे. उनकी तरफ से ठंडा रवैया मिला. विदेशों से लोगों ने हमसे संपर्क किया लेकिन कुछ लोगों को जिन्हें कमेटी में शामिल होने के लिए कहना चाहिए था, उनकी ओर से कल शाम पाँच बजे जवाब मिला.

उन्होंने कहा कि हम तीस दिन में इस रिपोर्ट को तैयार करने पर राज़ी हुए क्योंकि हम चाहते थे कि 22 फ़रवरी से शुरू होने वाले संसद के सत्र में इस पर बहस हो सके.

सिफ़ारिशें लागू हों

जस्टिस वर्मा ने कहा कि अगर इस रिपोर्ट को जल्दी से जल्दी लागू नहीं किया गया तो ये पूरी कवायद निर्रथक साबित होगी.

उन्होंने कहा कि चुस्त प्रशासन लागू करने में असफलता के कारण ही मौजूदा असुरक्षा का माहौल बना है. कानून का शासन इसलिए ख़त्म नहीं होता कि कानूनों की कमी है. अगर और कानूनों की ज़रूरत है तो विशेषज्ञ समितियों की ओर से कई सिफारिशें मौजूद हैं लेकिन उन्हें लागू नहीं किया गया है.

जस्टिस वर्मा ने सरकार, पुलिस-प्रशासन, न्यायपालिका के साथ साथ आम लोगों के नज़रिए की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि बलात्कार की शिकार लड़की और उसके साथी को निर्वस्त्र करके फेंक दिया गया पर किसी ने भी उनकी मदद नहीं की.

उन्होंने कहा कि सरकार की संस्थाओं के साथ साथ समाज में भी महिलाओं के प्रति भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि संवैधानिक ज़िम्मेदारी को पूरा किया जा सके. कमेटी ने एक विशेष चार्टर बनाने की सिफ़ारिश की है जिससे महिलाओं को यौन स्वायत्तता सहित पूर्ण स्वायत्तता दी जाए.

खाप पंचायतों की कड़ी आलोचना करते हुए कमेटी ने स्पष्ट किया है कि इन पंचायतों को कानून की संस्तुति नहीं है.

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