शराब की मार झेलता बिहार

 शुक्रवार, 25 जनवरी, 2013 को 14:35 IST तक के समाचार

एक तरफ देसी दारू का ज़हर बिहार की मलिन बस्तियों में ग़रीब मज़दूरों पर क़हर बनकर बार-बार टूटता है. दूसरी तरफ शराब माफिया का अवैध कारोबार यहाँ विभागीय भ्रष्टाचार के सहारे फलता-फूलता है.

इन दोनों बातों से जुड़े कारणों को क़रीब से देख-समझ पाने का मौक़ा तलाशते हुए हाल ही एक दिन मैं पटना के ‘चीना कोठी’ मोहल्ले में जा पहुंचा. यह झोपड़पट्टी शहर के मध्य भाग में बसी हुई है.

रिक्शा-ठेला चलाने वाले मज़दूरों और दाय-नौकरानी का काम करने वाली औरतों की इस बस्ती में सस्ती देसी शराब को पारिवारिक कलह और बीमारियों की मुख्य वजह माना जाता है.

चीना कोठी मोहल्ले में प्रवेश करते ही सबसे पहले मेरा सामना उन औरतों से हुआ, जो अपने-अपने परिवार के पियक्कड़ मर्दों के ख़िलाफ़ आक्रामक रूख़ अख्तियार किए हुए थीं.

कहने लगीं, "जो भी कमाता है, दारू पीने में उड़ा देता है. पीने से मना करो या घर चलाने का खर्चा मांगो, तो पीटता है. अब गली-गली में बिक रहा पन्नी (पाउच) वाला दारू जी का जंजाल हो गया है. कहाँ-कहाँ तो पी के सब मर रहा है और यहाँ भी मरेंगे. ये तो जहर बेच रही है न सरकार? उसे तो लगता है जैसे दारु में जीवन है."

नशे की मार

औरतों की बातें सुनकर वहां जमा हुए मर्दों ने कहना शुरू किया, “जो मेहनत-मजूरी करेगा वो थकान मिटाने के लिए थोड़ा-बहुत पीएगा. लेकिन जो नकली पाउच की भरमार हो गई है, इसमें तो गलती सरकार कर रही है. कहती है कि शराब से टैक्स खूब मिलता है और उसी से स्कूल में लड़का-लडकी को साइकिल-पोशाक मिलती है. तो हम पूछते हैं कि जहरीली शराब पी के जो गरीब मर रहा है, उसके बाल-बच्चे साइकिल –पोशाक लेके क्या करेंगे?”

"यह मुझे बहुत परेशान कर रहा है. नशा के लिए हमेशा रूपए मांगता रहता है और घर में जो भी रहता है, ले जाकर दारू में उड़ा देता है. अभी दो हज़ार रूपया मांग रहा है, कहाँ से मैं दूं?"

एक महिला, अपने बेटे के बारे में

कुछ ज़्यादा रोष में दिख रहे बस्ती वाले बोल उठे, “ये नकली दारू बनाता कौन है और बेचवाता कौन है? यही थाना-पुलिस और आबकारी विभाग वाले सब सरकारी आदमी घूस लेकर सारा खेल करवाते हैं और मरते हैं गरीब.”

बस्ती में कुछ दूर आगे जाने पर एक झोपड़ी के पास बैठी हुई महिला और बगल में बैठे एक नशेड़ी-से दिख रहे युवक पर मेरी नज़र पडी.

अधेड़ उम्र की वह महिला रोते-बिलखते स्वर में अपने जवान बेटे को कुछ समझा रही थी. मुझे देखकर बोल पड़ी, “यह मुझे बहुत परेशान कर रहा है. नशा के लिए हमेशा रूपए मांगता रहता है और घर में जो भी रहता है, ले जाकर दारू में उड़ा देता है. अभी दो हज़ार रूपया मांग रहा है, कहाँ से मैं दूं? मार-पीट करने लगता है. कुछ घर में बचा भी नहीं कि बेचकर दूं. चार दिन से मैं भूखी हूँ, इसके चलते. अब बर्दाश्त नहीं होता इतना दुःख. मैं क्या करूं? ''

बस्ती वाले जब उस दुखी माँ के नशेबाज़ बेटे को समझाने लगे तो उलटे वह गाली -गलौज पर उतर आया. लोगों ने बताया कि वहां कई और परिवारों को ऐसी ही त्रासदी से गुज़रना पड़ रहा है.

शराबबंदी की मांग

पिछले दो महीनों में पाउच वाली ज़हरीली देसी दारू पीने से आरा में 29, गया में 13 और पटना सिटी में 12 लोगों की जानें जा चुकी हैं.

उस समय इन मौतों पर मचे कोहराम की ख़बरें मीडिया की सुर्ख़ियाँ बनीं. फिर सरकारी और समाजी, दोनों हल्क़ों में परंपरानुसार मौसमी हंगामा हुआ.

बिहार में मलिन बस्तियां

झुग्गी बस्तियों में नशे की लत एक बड़ी समस्या है

बहस भी छिड़ी कि बिहार में शराब की ख़रीद-बिक्री प्रतिबंधित करके यहाँ पूर्ण नशाबंदी लागू की जाए या नहीं.

ज़ाहिर है कि इस पर बहस पहले भी होती रही है और आगे भी होती रहेगी. लेकिन राज्य सरकार ने इस बाबत अपनी मंशा व्यक्त कर दी है.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि यहाँ नशाबंदी या शराब की ख़रीद-बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाना शराब के अवैध कारोबार को और बढ़ने जैसा क़दम साबित होगा.

उन्होंने इसे राजस्व से जुड़ा हुआ मामला बताते हुए कहा, “सात साल पहले इस मद में सालाना राजस्व आमदनी मात्र तीन सौ करोड़ रूपए के आस-पास था, जो अब बढ़कर दो हज़ार करोड़ रूपए हो गई है. इसी पैसे से राज्य में स्कूली लड़के-लड़कियों के लिए साइकिल-पोशाक जैसी शैक्षणिक विकास योजना चलाने में मदद मिलती है.”

समझा जा सकता है कि यहाँ सरकार के नज़रिए में और समाज के नज़रिए में क्या फ़र्क़ है और शराब माफिया क्यों बेफ़िक्र है.

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