क्या इस बार विवादों से पाक रहेगा जयपुर उत्सव

 गुरुवार, 24 जनवरी, 2013 को 14:24 IST तक के समाचार
दलाई लामा

दलाई लामा भी दिखेंगे

जयपुर में गुरुवार से साहित्य का बड़ा मेल शुरू हो गया है. इस बार इस साहित्य उत्सव पर महात्मा बुद्ध के ज्ञान और विचारों की छाप और छाया रहेगी.

उत्सव ने इस बार महात्मा बुद्ध को अपनी थीम बनाया है. निर्वासित तिब्बतियों के अध्यात्मिक गुरु दलाई लामा खुद उत्सव में शिरकत करेंगे.

प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी जैसी कई नामी हस्तिया भी इस उत्सव में भाग ले रही हैं. आयोजकों के अनुसार इस बार देश विदेश से 283 साहित्यकार इस उत्सव भाग लेंगे.

भारतीय भाषाओं की उपस्थिति का विस्तार किया गया है. इस बार कोई सत्रह भारतीय भाषाएं इसमें अपनी आमद दर्ज कराएगी.

पिछली बार सलमान रुश्दी को लेकर खासी विवाद हुई जिसके बाद वो जयपुर साहित्य उत्सव में नहीं थे. मगर अब विरोध करने वालो के तेवर नर्म पड़ गए हैं.

बॉलीवुड की चर्चा

जयपुर साहित्य उत्सव

पिछली बार साहित्य उत्सव में एक लाख से ज्यादा लोग उमड़े

दलाई लामा पहले ही दिन उत्सव को संबोधित करेंगे. अदब के मेले में बुद्ध के मन्त्रों की ध्वनि और संगीत सुनाई देते रहेंगे. फिर लगातार अलग अलग सत्रों में इसके वैचारिक और अध्यात्मिक आयाम पर विद्वान चर्चा करेंगे.

इस बार साहित्य का ये मेला अपने विषय, विचारकों की विविधता और आयोजन के अंदाज के लिहाज से भिन्न होगा.

आयोजन से जुड़े संजोय रॉय कहते है इस बार बुद्ध साहित्य पर बहुत जोर है. विभिन्न देशों के विद्वान बुद्ध संबंधी साहित्य और उसके प्रभाव पर बात करेंगे.

भारत के बॉलीवुड को सो साल हो गए हैं, लिहाजा फिल्म पर अच्छी खासी चर्चा होगी. अगर बॉलीवुड है, तो हॉलीवुड पर भी चर्चा होगी.

दृश्य कला पर अच्छे विचारक यहां होंगे और उसके कई पहलुओं पर बात करेंगे. साहित्य के इस उत्सव में खेल पर भी चर्चा होगी.

पाकिस्तान का विरोध

मेले में देश और देशज होगा तो पड़ोस के पाकिस्तान से सात साहित्यकार शिरकत करेंगे.

"हमें कला और साहित्य को सरहदों की बेड़ियो में नहीं जकड़ना चाहिए. हाँ, किसी को ऐतराज है तो अपनी बात कहे. इस तरह हर विरोध करने वालो को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए. मीडिया को भी इसमें अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए."

संजोय रॉय, आयोजक

हालांकि बीजेपी की युवा शाखा ने इसका ये कह कर विरोध किया है कि पाकिस्तान ने भारतीय सैनिकों के साथ गैर इंसानी सुलूक किया है, लिहाजा वे पाकिस्तानी साहित्यकारों के आगमन का विरोध करेंगे.

लेकिन बीजेपी ने बाद में खुद को लचीला किया और कहा उनका विरोध शांतिपूर्वक होगा. बीजेपी ने ये भी कहा ये विरोध पाकिस्तान की सत्ता से है, साहित्य से नहीं.

पाकिस्तानी लेखकों और साहित्यकारों के आगमन पर विरोध पर इस उत्सव के एक आयोजक संजोय रॉय कहते हैं, “हमें कला और साहित्य को सरहदों की बेड़ियो में नहीं जकड़ना चाहिए."

उनका कहना है कि को ऐतराज है तो अपनी बात कहे. इस तरह हर विरोध करने वालो को प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए. मीडिया को भी इसमें अपनी भूमिका अदा करनी चाहिए.

बढ़ती लोकप्रियता

उत्सव साल दर साल लोकप्रिय हुआ, तो भीड़ उमड़ने लगी. आयोजको ने महसूस किया उत्सव स्थल डिग्गी पैलेस छोटा पड़ने लगा है. इसलिए इस बार सहूलियत के लिहाज से कुच्छ बदलाव किए गए हैं.

राजस्थानी की स्थापत्य कला की खूबियों को बयान करते डिग्गी पैलेस में दो और बैठकें तैयार की गई है. डिग्गी पैलेस के मालिक रामप्रकाश सिंह कहते हैं कि इस बार चार बाग़ नाम से एक और सभागार बनाया गया है.

इससे छह हज़ार लोग और हर घंटे उत्सव में शिरकत कर सकते हैं. पहले साँझ में होने वाले संगीत के कार्यक्रम बहुत जगह घेरते थे.

ये कार्यक्रम अब होटल क्लार्क्स आमेर में होंगे. इसके बदले उभरी जगह पर डिग्गी पैलेस में दो तीन और जगहों में कार्यक्रमों के लिए स्थान बनाया गया है.

सिंह के अनुसार पिछले वर्ष इस उत्सव में एक लाख 22 हजार लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी. इस बार ये संख्या और भी बढ़ेगी.

साहित्य के साथ सिनेमा, वास्तु, मूर्तिकला, वाचन परंपरा, साहित्य और ना जाने कितने और विषय भी होंगे. जब विद्वान बोलेंगे और लोग सुनेंगे. दलित साहित्य पर भी मंथन होगा.

भाषाओं की रिश्तेदारी

पुस्तक मेला

मेले के लिए व्यापक इंताजम किए गए हैं

इस उत्सव की सह निदेशक नमिता गोखले के अनुसार इस बार कोई सत्रह भारतीय भाषाओं का साहित्य और साहित्यकार इस जलसे में मौजूद रहेंगे.

वे कहती हैं कि दरसल ये सारी भाषाएं आपस में मिली जुली है, मसलन अगर कश्मीरी में बात हो रही है तो उसमे अंग्रेजी भी होगी, उर्दू भी होगी.

ये जो द्वि और त्रि भाषी हमारे जो भारतीय संस्कार है, लेखन और वाचन परंपरा में, उसकी यहाँ नुमाइश होगी. इसमें एक सत्र 'हिंदी इंग्लिश भाई भाई नाम से होगा.

नमिता गोखले कहती है, “खान पान, बोलचाल और साहित्य ये सब एक दुसरे से जुड़े हुए है. 'जैसे पाकिस्तान के साथ हमारा तीन भाषाओं अंग्रेजी, पंजाबी और सिन्धी का जुड़ाव है. तो हम सब कहीं न कहीं एक दूजे से जुड़े हुए है.”

पांच दिन के इस मेले में साहित्य, लेखक,किताबें, विचार और उनका प्रवाह होगा. इसमें उमड़ती भीड़ गवाही देती है कि समाज में न केवल साहित्य की समझ बढ़ी है बल्कि साहित्य के लिए चाहत भी हिलोरे मार रही है.

पर सवाल ये है, फिर किताबो में लिखी इबारत का उतना असर दिखाई क्यों नहीं दिखाई देता.

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