क्या पटना में नीतीश के खिलाफ बोलेंगे अन्ना?

 मंगलवार, 29 जनवरी, 2013 को 11:19 IST तक के समाचार
पटना में अन्ना

अन्ना की रैली को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं

अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में बुधवार को पटना के गांधी मैदान में होने जा रही 'जनतंत्र रैली' कई शंकाओं और सवालों से घिर गई है.

आयोजक के रूप में शामिल लोगों और संस्थाओं के बीच बिगड़े तालमेल से ये सवाल और गहरा रहे हैं. ख़ुद को अन्ना के सबसे निकट बताने की होड़-सी मची है.

जनरल वीके सिंह इस आयोजन के सूत्रधार की भूमिका निभा रहे हैं और उन्हें सक्रिय सहयोग देने वालों में सबसे प्रमुख हैं पत्रकार संतोष भारती.

जेपी आंदोलन से जुड़े कई प्रमुख लोग इसमें सहयोग कर रहे हैं. लेकिन उन्हें कथित विवादास्पद तत्वों के संदेहास्पद 'अन्ना प्रेम' को लेकर आपत्ति भी है.

सबसे बड़ी शंका इस बात को लेकर है कि कहीं यह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम एक दल विशेष को राजनीतिक लाभ पहुंचाने तक न सीमित रह जाए.

लोग पूछने लगे हैं कि 'भ्रष्टाचार विरोधी रैली' के बजाय 'जनतंत्र रैली' नाम रखने का आखिर रहस्य क्या है?

नीतीश से नजदीकी?

"अन्ना की पुरानी या नई टीम से जुड़े प्रायः हर किसी का स्वार्थ इतना प्रबल है कि ऐसे में आन्दोलन की कोई शक्ल उभर ही नहीं पाएगी. अब देखिए कि बुधवार को पटना में अन्ना की रैली होने वाली है लेकिन उसके प्रति लोगों में कहीं कोई उत्साह नज़र नहीं आ रहा है."

सत्यनारायण मदन, जेपी आंदोलन से संबंद्ध

रैली के एक दिन पहले पटना के गांधी मैदान में आम लोगों का कहना है, ''भ्रष्टाचार में तो अकेली कांग्रेस ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी और तमाम क्षेत्रीय दल भी लिप्त है. बिहार में भाजपा और नीतीश जी की पार्टी जदयू का शासन है और यहां भी खूब घपले-घोटाले या भ्रष्टाचार हो रहे है. तो क्या अन्ना और उनकी नई टीम के लोग सीधे भाजपा और नीतीश सरकार की आलोचना से बचना चाहते हैं?''

दरअसल यह चर्चा उसी समय से ज़ोर पकड़ने लगी है, जब यहां गांधी मैदान में रैली की अनुमति के लिए अन्ना हजारे ने फ़ोन करके मुख्यमंत्री से पैरवी की.

उसके बाद जनरल वीके सिंह यहां न सिर्फ नीतीश कुमार से मिले, बल्कि इस आशय का बयान भी दिया कि बिहार में विकास की बयार चल रही है.

ज़ाहिर है कि बिहार की भाजपा-जदयू सरकार इस रैली को अपने प्रतिकूल नहीं, अनुकूल समझने लगी है.

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या अन्ना हज़ारे पटना की अपनी 'जनतंत्र रैली' में बिहार में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ भी खुलकर बोलेंगे?

कहां से आ रहा है पैसा

इस रैली के आयोजन में सक्रिय और जेपी विचारधारा से जुड़े सामाजिक कार्यकर्त्ता रमेश पंकज ने इस सवाल को जायज़ माना है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, ''अन्ना को नीतीश राज में भी बढे भ्रष्टाचार का विरोध करना चाहिए. हम लोगों ने इस रैली के होर्डिंग्स और पोस्टर-बैनर में थल सेनाध्यक्ष की वर्दी पहने जनरल वीके सिंह की तस्वीर छपे होने पर भी आपत्ति ज़ाहिर की है. साथ ही ये भी ना हो कि जनहित से जुड़े मुद्दों वाले इस आंदोलन को किसी दलविशेष के राजनीतिक लाभ का ज़रिया बना दिया जाए.''

कई अन्य लोगों ने भी वर्दी पहने वीके सिंह की तस्वीर इस रैली के पोस्टर में छपे होने को सेना की वर्दी का दुरूपयोग माना है.

सवाल ये भी उठा है कि रैली के प्रचार के लिए बड़े-बड़े होर्डिंग्स और क्षेत्रीय टेलीविज़न चैनलों पर अन्ना की अपील वाले विज्ञापन पर हो रहे भारी ख़र्च का स्रोत क्या है?

दिलचस्प बात ये भी है कि अरविन्द केजरीवाल या मनीष सिसोदिया ने ख़ुद को इस रैली से अलग रखते हुए भी अपनी 'आम आदमी पार्टी' के बिहारी कार्यकर्ताओं को रैली में सहयोग करने का निर्देश दिया है.

इसी तरह कई ग़ैर सरकारी संगठन के लोग इस रैली की आयोजक मंडली में शरीक हैं. लेकिन इन तमाम अन्ना सहयोगियों की आपसी किचकिच कई बार सामने आ चुकी है.

फीकी पड़ी चमक

अन्ना का आंदोलन

विश्लेषकों का कहना है कि अन्ना के आंदोलन की चमक खत्म होती जा रही है

जेपी आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी निभाने वाले मदन और कंचन की जोड़ी ने बताया कि वे दोनों इस रैली से अपने को अलग कर चुके है.

कंचन बाला कहती हैं, ''जेपी की क्रन्तिभूमि बिहार से अन्ना ने देशव्यापी मुहिम की शुरुआत का ऐलान तो किया है लेकिन इस रैली के किसी भी होर्डिंग या पोस्टर-बैनर में जेपी का उल्लेख तक नहीं है. दूसरी बात कि गांधी और जयप्रकाश नारायण का सिर्फ नाम लेकर जनांदोलन छेड़ने जैसे किसी राजनीतिक खेल के पीछे अब जनता भागने वाली नहीं है. अन्ना को लेकर लोगों के मन में कई सवाल उठने लगे हैं.''

सत्यनारायण मदन का कहना है, ''अन्ना जी की पुरानी या नई टीम से जुड़े प्रायः हर किसी का स्वार्थ इतना प्रबल है कि ऐसे में आन्दोलन की कोई शक्ल उभर ही नहीं पाएगी. अब देखिए कि बुधवार को पटना में अन्ना की रैली होने वाली है लेकिन उसके प्रति लोगों में कहीं कोई उत्साह नज़र नहीं आ रहा है.''

यह बात सही है कि अन्ना टीम का जैसा वैचारिक अंग-भंग या बिखराव देखा गया, उससे अन्ना हज़ारे के प्रति लोगों में पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा है.

हालांकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश बिहार में तनिक भी कम हुआ हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है. लेकिन इसे लेकर सशक्त जनांदोलन की संभावना फ़िलहाल मलिन पडी हुई-सी लग रही है.

इस निराशा और तमाम शंका-सवालों के बावजूद ये माना जा रहा है कि पहली बार बिहार आ रहे अन्ना हज़ारे को देखने-सुनने वालों की भीड़ पटना के गांधी मैदान में ज़रूर जुटेगी.

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