अन्ना क्यों कमज़ोर दिखे पटना में?

अन्ना हजारे
Image caption पटना में अन्ना हजारे की रैली बहुत ज्यादा प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही

अन्ना हज़ारे और उनकी नई टीम द्वारा पटना में बुधवार को आयोजित 'जनतंत्र रैली' कुछ ख़ास रंग नहीं ला सकी. लम्बे समय से बहुप्रचारित यह आयोजन किसी बड़ी रैली जैसी शक़्ल में नहीं उभर पाया.

चूंकि उम्मीद से काफी कम भीड़ जुटी, इसलिए विस्तृत गांधी मैदान में यह रैली एक सामान्य-सी जनसभा नज़र आ रही थी. लोग उमड़ पड़ेंगे वाला अनुमान सही नहीं निकला.

फिर भी हाथ में तिरंगा और सिर पर अन्ना-टोपी वाले उत्साहित जत्थों ने सभा में बार-बार अन्ना की जय-जयकार करके वहां माहौल को जीवंत बनाए रखा.

अन्ना के भाषण में नया कुछ नहीं था, सिवा इसके कि 'जनतंत्र मोर्चा' नाम से राष्ट्रीय स्तर का एक नया संगठन बनाने का उन्होंने ऐलान किया.

लेकिन उन्होंने जब ये कहा कि प्रस्तावित जनतंत्र मोर्चा चुनाव नहीं लडेगा, तो वहां कानाफूसी शुरू हो गई कि तब सत्ता-राजनीति की आकांक्षा लेकर अन्ना से जुड़ने वालों का क्या होगा ?

नीतीश पर चुप

चर्चा इस बात की भी हो रही है कि बिहार के नीतीश शासनकाल में बढ़ते भ्रष्टाचार के सवाल पर अन्ना इस रैली में एक शब्द भी क्यों नहीं बोले ?

जबकि मीडिया के ज़रिये कई लोगों ने अन्ना की नई टीम के सामने यह सवाल उठाकर इस पर अन्ना से स्पष्ट राय की मांग की थी.

शायद इसी कारण यह आरोप लग रहा है कि राज्य की भाजपा-जदयू सरकार से मित्र-भाव बनाए रखने की शर्त पर अन्ना को यहाँ गांधी मैदान में सभा करने की प्रशासनिक अनुमति मिली.

हालांकि कुछ जानकार लोग इसे भाजपा के साथ अन्ना के कथित अंदरूनी लगाव से भी जोड़कर देखते हैं. मुस्लिम समाज का रुझान इस ओर कम होने का यही कारण माना जा रहा है.

रैली में बहुत भीड़ क्यों नहीं जुटी के सवाल पर लोगों का यही कहना है कि अन्ना टीम में मतभेद और बिखराव देख-समझ रहे लोगों को अब अन्ना हज़ारे से पहले जैसी उम्मीद नहीं रही.

कुल मिलाकर इस रैली का असरदार नहीं होना यही बता रहा है कि भ्रष्टाचार जैसी विकट समस्या के ख़िलाफ़ उभरे जनाक्रोश को निर्णायक आन्दोलन बना पाने में अन्ना कमज़ोर पड़े हैं.

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