असहिष्णुता की शुरूआत अयोध्या आंदोलन से

  • 30 जनवरी 2013
रामायण
Image caption दिल्ली विश्वविद्यालय में रामायण पर लिखे गए लेख को लेकर लंबा विवाद चला.

भारत में तीव्र असहिष्णुता की जो भावना इस समय नजर आती है उसकी शुरूआत अयोध्या राम मंदिर आंदोलन से देखी जा सकती है.

नब्बे के दशक में चलाए गए इस आंदोलन में पहली बार बहुसंख्यकों के नाम पर ये संदेश आया कि संख्या में अधिक होने पर आप अपनी किसी भी बात को मनवा सकते हैं, आपकी विचारधारा ही सही है ये बात अपनी ताक़त की बिना पर मनवाई जा सकती है.

उससे पहले बहुसंख्यक का मतलब, उसी की बात सही होने या माने जाने का ख़्याल उस तरह से गहरा नहीं था. तब ये भी सोचा जाता था कि आप अल्पसंख्यक होकर भी तर्क के आधार पर अपनी बात सही साबित कर सकते हैं, उसे मनवा सकते हैं.

इस आंदोलन के दौरान ये बात समझाई गई कि हम जो सोचते हैं वही सही है.

राजनीति में असहिष्णुता का ये उफ़ान धीरे-धीरे समाज में भी फैलता गया, जो अंबेडकर के कार्टून, सलमान रूश्दी या तसलीमा नसरीन की किताब, या आशीष नंदी के बयान पर मचे हंगामे, या दूसरी इसी तरह की घटनाओं में साफ़ साफ़ देखी जा सकती है.

मुल्क की नींव

अयोध्या के आंदोलन ने उन सभी बातों - धर्म-निरपेक्षता, सहिष्णुता, बहु-सांस्कृतिवाद जैसी विचारधाराओं को नकारा जिसके आधार पर मुल्क की नींव रखी गई थी.

Image caption महात्मा गांधी पर लिखी एक किताब को गुजरात सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था.

इन सबसे परेशानी ये हुई है कि जो भी मामले सामने आते हैं उसे कोई न कोई समूह ख़ुद से जोड़कर देखने लगते हैं, और अगर वो उनकी सोच के ज़रा भी अलग हुई या उसके ख़िलाफ़ हुई तो उससे नाराज़गी या चोट पहुंचने की भावना का इज़हार करने लगते हैं.

लेकिन इस बढ़ी हुई असहिष्णुता को समूहों के पहचान स्थापित करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है.

जिस किसी मामले में भी उन्हें ये लगता है कि ये उनकी पहचान स्थापित कर सकता है वो उसे उठाने लगते हैं उसपर हंगामा करने लगते हैं.

आशीष नंदी के बयान पर मचे हंगामे या अंबेडकर के कार्टून पर हुए विवाद को इस नज़िरए से भी देखा जा सकता है.

हां एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है कि जब अयोध्या मूवमेंट के बाद बढ़ी असहिष्णुता की बात होती है तो ये सिर्फ भारत के एक धर्म तक ही सीमित नहीं है, ये समाज के सभी वर्गों चाहे वो किसी भी धर्म से तालुक्क़ रखता है, में घर कर गई है.

रही बात किसी भी बात से विरोध रखने पर उसपर बहस करके उसको सुलझाने की, या अपनी बात कहने की, तो उसकी शुरूआत बच्चों में शुरूआती दौर से ही करनी होगी, जो मुझे लगती है कि कहीं न कहीं नहीं हो पा रही है.

(बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित)

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