संशोधन के साथ लोकपाल बिल को कैबिनेट की मंजूरी

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Image caption कैबिनेट ने लोकपाल बिल को कुछ संशोधनों के साथ मंजूरी दी है.

केंद्रीय कैबिनेट ने कुछ संशोधनों के साथ लोकपाल विधेयक को मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही प्रस्तावित कानून को संसद में पेश किए जाने का रास्ता साफ हो गया है.

इस विधेयक में राज्य के लोकायुक्त की गठन प्रक्रिया से केंद्र सरकार को अलग रखा गया है. संशोधित विधेयक में राज्यसभा की सेलेक्ट कमेटी के कई सुझावों को भी शामिल किया गया गई है.

इनमें अभियोजन निदेशक की सीवीसी द्वारा की जाने वाली नियुक्ति भी है. कमेटी ने कुल 16 सिफारिशें की थी जिनमें 14 मान ली गई हैं.

सेलेक्ट कमेटी की एक अन्य सिफारिश को सरकार ने मान लिया है जिसमें कहा गया था कि धनराशि के बजाय सरकारी मदद लेने वाले संगठन लोकपाल के दायरे से बाहर रखे जाने चाहिए.

लेकिन सरकार से बड़ी रकम लेने वाले संगठन प्रस्तावित लोकपाल के दायरे में रखे गए हैं.

दो सिफारिशें अस्वीकार

हालांकि सरकार ने पैनल के उस मुख्य सिफारिश को नहीं माना है जिसमें शुरुआती जांच के समय आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी को सफाई का मौका नहीं दिए जाने का सुझाव दिया गया था.

किसी अधिकारी को अपनी सफाई देने का मौका दिए जाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार की यह राय है कि ऐसा संरक्षण जरूरी है.

आरोपों का सामना कर रहे अधिकारी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका न देना संरक्षण के सिद्धांत के विरुद्ध होगा.

राज्य सभा की सेलेक्ट कमेटी ने सिफारिश की थी कि किसी मामले की जांच कर रहे सीबीआई अधिकारी के स्थानांतरण के लिए लोकपाल की पूर्व सहमति होनी चाहिए.

कैबिनेट ने सेलेक्ट कमेटी की इस सिफारिश को खारिज कर दिया.

इस मुद्दे पर सरकार का कहना है कि किसी अधिकारी का तबादला एक प्रशासनिक विषय है और यह सीबीआई प्रमुख का विशेषाधिकार है.

विपक्ष की प्रतिक्रिया

Image caption कैबिनेट की मंजूरी के बाद विधेयक राज्यसभा में पेश किया जाना है.

प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की स्वायत्ता को लेकर गंभीर नहीं है.

पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा,"भाजपा ने सीबीआई के निदेशक के कार्यकाल नियत करने का सुझाव दिया था. हमने सुझाव दिया था कि दो वर्ष की नियुक्ति नियत करने और कार्यकाल पूरा होने के बाद कोई पद न दिए जाने जैसे उपाय जरूरी हैं. इस मुद्दे पर सरकार ने कुछ नहीं कहा है".

प्रसाद ने कहा कि लोकपाल की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और यह पूरी तरह से स्वायत्त होना चाहिए.

समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक अन्ना हजारे ने लोकपाल को कैबिनेट से मिली मंजूरी को तमाशा करार दिया है.

अन्ना ने कहा है कि वे प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिखकर उनसे स्पष्टीकरण मांगेंगे.

इंतजार बाकी है

राजनीतिक पार्टियों के बीच गहरे मतभेद के मद्देनजर सेलेक्ट कमेटी ने लोकायुक्त पद के गठन को लोकपाल विधेयक से अलग किए जाने की सिफारिश की थी.

शुरुआती मसौदे के इस प्रावधान को लेकर विवाद हो गया था.

राजनीतिक दलों का यह कहना था कि इससे केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के अधिकारक्षेत्र में दखल देने का मौका मिल जाएगा.

विधेयक में यह कहा गया था कि लोकपाल के लागू हो जाने के एक साल की अवधि के भीतर राज्य सरकारों को लोकायुक्त का गठन करना होगा.

इन संशोधनों को अब राज्यसभा में मतदान के लिए पेश किया जाएगा. वहां से पारित होने पर इसे नए सिरे से मंजूरी के लिए लोकसभा भेजा जाएगा.

हालांकि लोकसभा लोकपाल विधेयक को पहले ही पारित कर चुकी है लेकिन इसे संविधानिक दर्जा दिए जाने की सरकार की कोशिश सफल नहीं हो पाई.

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