...दहशत फिर भी पीछा नहीं छोड़ती

''हमारी ज़िंदगी वहां बेहद मुश्किल थी. जब मैंने नमाज़ के लिए जाना बंद कर दिया तो लोगों को मुझ पर शक हुआ. उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मैं ईसाई बन गया हूं, लेकिन मैंने अपनी जान बचाने के लिए झूठ बोला. हम तहखानों में जमा होकर प्रार्थना करते थे. यानी मैं धर्म से ईसाई था लेकिन दुनिया के लिए एक मुसलमान.''

33 साल के ओमर आज भी अफगानिस्तान की अपनी ज़िंदगी को याद कर सिहर उठते हैं. उनसे हमारी मुलाकात दिल्ली के एक अफगान-दरी चर्च में हुई.

यानी एक छोटा सा कमरा जहां प्लास्टिक की कुछ कुर्सियों, दरी-पश्तो में लिखी बाइबल, पादरी के इंतज़ार में सजे एक कोने के अलावा कुछ ऐसे लोग मौजूद थे जो अपनी मौत के डर से अफगानिस्तान से भागकर भारत आए.

सिर्फ एक सज़ा मौत

अफगानिस्तान एक इस्लामी देश है जहां कानून किसी दूसरे धर्म को मानने की इजाज़त नहीं देता. सरकार हो या तालिबान इस हुक्म को न मानने की सिर्फ एक सज़ा है, मौत.

ओमर कहते हैं, ''सरकार की बात तो छोड़िए, हालात ऐसे हैं कि मेरे गांव के लोगों, मेरे अपने भाइयों-रिश्तेदारों को अगर पता लग जाए कि मैं ईसाई हूं तो वो मुझे मार डालेंगे.''

फिर भी अफगानिस्तान में कुछ लोग ऐसे हैं जो ईसाई धर्म को मानते हैं और दुनिया से छिपकर ईश्वर का नाम लेते हैं.

ये लोग दुनिया से अपना भेद छिपाकर ईसाई और मुसलमान की दोहरी ज़िंदगी जीते हैं, लेकिन भेद खुलने पर उनके पास रातों-रात देश छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं.

छूट गया घर-बार

चर्च के पादरी एक अफगान ईसाई हैं जो 2007 में अपने परिवार के साथ भागकर भारत आए.

Image caption दरी चर्च अफगान ईसाईयों को उनकी अपनी भाषा में प्रार्थना करने का मौका देता है.

वो कहते हैं,''कई साल हम वहां छिपकर रहे. मुझे ईश्वर पर विश्वास था और अपने ईसाई होने पर गर्व. फिर हमें धमकियां मिलने लगीं और आखिरकार हम भागकर भारत आए. तालिबान मानता है कि जो खुद ईसाई है वो दूसरों को भी ईसाई बनाएगा, इसलिए बिना जाने-पूछे वो सीधे काफिरों का सिर कलम कर देते हैं.''

42 वर्षीय आदिल अफगानिस्तान के अपने आलीशान घर और फलते-फूलते गाड़ियों के कारोबार को याद कर रुआंसे हो उठते हैं.

वो कहते हैं, ''गाड़ियों पर मेरी पकड़ इतनी ज़बर्दस्त थी कि मैं चलती गाड़ी को देखकर बता सकता हूं कि गाड़ी कितनी पुरानी है और उसमें क्या खराबी है. वहां मेरा अपना करोबार था, कई गाड़ियां किराए पर चलती थीं और नई से नई गाड़ी खरीदने का मुझे शौक था. मैंने जब वतन छोड़ा तो तीन लाख पाकिस्तानी रुपए में सब कुछ बेच दिया.''

दिन रात की इस दहशत से पीछा छुड़ाने और अपनी दोहरी ज़िंदगी से तंग आकर ये लोग सबकुछ छोड़कर भारत तो आ गए, लेकिन सच ये है कि उस डर ने यहां भी उनका पीछा नहीं छोड़ा है.

खत्म नहीं हुईं परेशानियां

अफगानिस्तान से हर साल बड़ी संख्या में लोग व्यापार और इलाज के लिए भारत आते हैं. ज्यादातर अफगान शरणार्थी इन लोगों के साथ दुभाषिए का काम करते हैं. ये काम ही अक्सर मुसीबत की सबसे बड़ी वजह बन जाता है.

हामिद कहते हैं, ''अफगानिस्तान से आए एक शेख के साथ मैं कई दिनों तक दुभाषिए की तरह रहा. हमारे परिवार काफी करीब आ गए थे. एक दिन उन्हें पता लगा कि मैं ईसाई हूं. उन्होंने न सिर्फ मुझे काफिर कहा बल्कि मेरी तस्वीरें फेसबुक यू-ट्यूब पर डाल दीं. अफगानिस्तान ही नहीं भारत में भी कई मुस्लिम कट्टरपंथी अब मेरे पीछे हैं.''

आदिल भारत में बतौर ईसाई अपनी पहचान छिपाना नहीं चाहते लेकिन इसकी कीमत है बेरोज़गारी.

वो कहते हैं, ''मैं कई जगह काम मांगने गया लेकिन लोग अफगानों को नौकरी देने से डरते हैं. फिर मैंने एक अफगान बेकरी में नौकरी कर ली. लेकिन दूसरे अफगानों को जब मेरे ईसाई होने का पता लगा तो उन्होंने बेकरी से सामान लेना बंद कर दिया. कुछ दिन बाद मालिक ने मुझे दूसरी नौकरी ढूंढने को कह दिया.''

समस्याएं बहुत हैं, लेकिन मदद के रास्ते में कई रुकावटें हैं. भारत सरकार पर शरणार्थियों की सुरक्षा और उन्हें शरण देने संबंधी संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन के नियम लागू नहीं होते क्योंकि भारत 1951 रेफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सेदार नहीं.

वतन से लगाव कम नहीं

मानवाधिकार संस्था ‘यूएन हाई कमिशनर फॉर रेफ्यूजीज़’ (यूएनएचसीआर) की तरफ से भारत में हर रेफ्यूजी को एक पहचान-पत्र दिया जाता है. ताकि एक अजनबी देश में वो सुरक्षित रहकर अपनी ज़िंदगी बिता सकें, लेकिन एक कार्ड के सहारे दहशत और नफरत से लड़ना आसान नहीं.

Image caption अफगानिस्तान से आए कई लोग हर दिन वतन वापस लौटने की दुआ करते हैं.

यूएनएचसीआर से जब हमने अफगान इसाईयों के मुद्दे पर बात करनी चाही तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि ये मामला इतना संवेदनशील है कि वो इस पर कुछ नहीं कहना चाहते.

ज़िंदगी की उम्मीद में इन लोगों ने अपना देश छोड़ा. भारत आकर अपने अलग चर्च बनाए ताकि अपनी भाषा दरी या पश्तो में प्रार्थना कर सकें, लेकिन ऐसा नहीं कि इन लोगों को अफगानिस्तान से प्यार नहीं.

तीन महीने पहले चर्च का हिस्सा बने शफ़ीक कहते हैं, ''मैं एक अफगान हूं, मुझे अपना देश अच्छा लगता है, वहां के लोग अच्छे लगते हैं, अपनी भाषा अपना खान-पान, पहनावा अच्छा लगता है, लेकिन मेरे देश के कुछ लोगों को मैं अच्छा नहीं लगता. उन्होंने मुझे वतन छोड़ने को मजबूर कर दिया.''

शफ़ीक की तरह कई नौजवान हैं जो वापस लौटना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि हालात सुधरें. यही वजह है कि हफ्ते के एक दिन, शहर के किसी कोने में, दुनिया से छिपकर ये लोग, जब ईश्वर का नाम लेने जमा होते हैं, तो पहली दुआ अफगानिस्तान के नाम होती है.

(रिपोर्ट में सभी नाम बदले गए हैं.)

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