जनतंत्र में कट्टरवाद का बोलबाला क्यों?

उग्र विरोध प्रदर्शन

विश्वरूपम फ़िल्म पर पाबंदी लगाने का मुद्दा हो या जयपुर लिटररी फेस्टिवल में समाजशास्त्री आशीष नंदी के बयान पर भड़का बवाल, ये दरअसल जनतंत्र की समस्या है.

भारत में ये सब होता इसलिए दिखता है क्योंकि भारत नज़दीक है. मगर दुनिया भर में जहाँ जहाँ चुनावी जनतंत्र है वहाँ इस तरह की चीज़ें देखने में आती हैं.

ब्रिटेन में भी ये होता है कि अगर किसी सांसद के मतदाताओं में कश्मीरी ज़्यादा हैं तो वहाँ पार्टी लाइन बदल जाती है. ख़ालिस्तान आंदोलन के दौर में भी हमने कई बार ऐसा देखा.

दरअसल, चुनावी जनतंत्र एक हद के बाद अनुदार नतीजे पैदा करने लगता है. उदाहरण के लिए एक चुनाव क्षेत्र में अगर तीन समुदाय हैं तो उन समुदायों के कट्टरपंथी लोग ही उम्मीदवार बनकर उभरते हैं.

जातीय और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों को उछालकर मतदाताओं को एकजुट करना आसान होता है. इसीलिए हमारे समाज में बार बार किसी किताब पर, किसी फ़िल्म पर या किसी कला पर पाबंदी लगाने की माँग सामने आती है. राजनेता वोट की राजनीति के कारण ऐसी माँगों का समर्थन करते हैं.

पर जनतंत्र से जुड़े इन सवालों के बारे में बात करने से हमारे राजनीतिक सिद्धांतकार घबराते हैं. क्योंकि फिर सवाल आएगा कि क्या जनतंत्र को ख़त्म कर दिया जाए और क्या कोई दूसरा रास्ता ढूँढा जाए?

बीमीरी की जड़

Image caption भारत में मीडिया कई बहसों को जन्म और हवा देता है.

दरअसल ये मामला है कि पालिए बीमारियों को, मारिए बीमार को. हम जो बीमारियाँ पाले हुए हैं उसका ही नतीजा हैं ये गड़बड़ियाँ.

मीडिया में इमरजंसी से पहले जो मीडिया था उसकी भूमिका सरकार को आलोचनात्मक समर्थन देने की थी. इमरजंसी के दौरान हमने इंदिरा गाँधी का विरोध किया और इसके बाद हम विपक्ष की भूमिका निभाने लगे. फिर विपक्ष में रहने की आदत बन गई और उसमें कोई सुधार नहीं किया गया.

नब्बे के दशक में अर्थव्यवस्था के खुलते ही मीडिया चीख-पुकार में बदल गया. ऊँची आवाज़ में बात कहने की आदत पड़ गई. क्योंकि सब लोग बाज़ार में बैठे हैं और अपना माल बेच रहे हैं.

पहले पत्रकार पक्का कर लिया करता था कि हुआ क्या. पूरी बहस हो गई है लेकिन ये किसी को नहीं मालूम कि जयपुर लिटररी फेस्टीवल में आशीष नंदी ने दलित और पिछड़ों के बारे में किस संदर्भ में बात कही. लोगों को नहीं मालूम कि विश्वरूपम फिल्म में क्या है, लोगों को नहीं मालूम की हुसैन की पेंटिंग्स में क्या है. पर प्रतिक्रिया हर जगह है.

आशीष नंदी जिस स्तर पर बात करना चाह रहे थे वो पूरी तरह से तोड़-मरोड़ दी गई. उधर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता और विपक्षी नेता करुणानिधि के झगड़ों के बीच में एक कलाकार फँस गया है.

शोर शराबा

हमारी भारतीय संस्कृति में सरस्वती और लक्ष्मी में एक संतुलन रखा जाता था. अब सिर्फ़ बाज़ार हावी है, उसका असर हर जगह हावी है. मीडिया में भी है. एक ज़माने में डिस्कशन होता था कि दो लोग बातचीत करें. अब स्क्रीन से छह लोग शोर करते हैं.

बीबीसी की बात दूसरी है. कम से कम दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही उसका पुराना कल्चर रहा है कि शोर को बढ़ावा नहीं दिया जाए. बात भोंडी न मालूम हो. हमारे यहाँ नए मीडिया में ये संस्कृति नहीं बन पाई है. प्रोग्राम की क्वालिटी से ज़्यादा उसकी ऊँची आवाज़ पर ज़ोर दिया जाता है और हम उस प्रोग्राम को ऐसे ही देखते हैं कि जैसे गली की लड़ाई देख रहे हों.

एक शब्द होता था नज़रअंदाज़ करना. अब वो बेमानी हो गया है. समाज में पचास तरह के लोग हैं. इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि हम कैसे बात कहें जिससे कोई ग़लत तबका खड़ा न होने पाए.

आहिस्ता, ज़रा आहिस्ता ले चल कारवान-ए-कैफ़ो मस्ती को

कि सतह-ए-ज़हन-ए- आलम सख़्त ना-हमवार है साक़ी.

नाव को सँभालकर ले चलने की ज़रूरत है. पानी में ठहराव को बढ़ाने की बजाए उसमें पत्थर फेकें जाएँ तो क्या होगा?

संबंधित समाचार