'आर्ट गैलरियों का दबदबा खतरनाक'

Image caption चिंतन उपाध्याय की कृति. चिंतन ने कई गैलरियों के साथ काम किया लेकिन उनकी रचनात्मकता में कोई बाधा कम ही दिखती है.

कलाकार और कला दीर्घाएं. जैसे पत्रकार और अख़बार समूह. जैसे लेखक और पब्लिशर.

कुछ ऐसा ही संबंध होता है कलाकार और कला दीर्घाओं का. इसे मानें तो इंडिया आर्ट फेयर कला दीर्घाओं का मेला है कलाकारों का नहीं.

इसके फायदे तो बहुत हैं लेकिन नुकसान भी कुछ कम नहीं. एक बड़ा फायदा तो यही है कि इंडिया आर्ट फेयर जैसी जगहों में 23 देशों से 100 से अधिक कला दीर्घाएं आती हैं और कई कलाकारों का काम दिखता है.

कला के जानकार अशोक वाजपेयी फरमाते हैं कि ऐसे मेले में इतना कुछ देखने को और इतना अलग देखने को है कि आंखें ठहरती ही नहीं.

उनके शब्दों में ‘‘पदार्थों से, चीज़ों से और तरह तरह की चीज़ों से, हिकमतों से जो नया करने का अनुभव है वो विश्व परिदृश्य की एक बड़ी घटना है.’’

ट्रेंड

गैलरियां न होती तो कलाकारों को आजीविका का साधन न मिलता, इसमें भी कोई दोराय नहीं हो सकती लेकिन ये भी बात गलत नहीं है कि कई बार गैलरियां कुछ तय कर देती हैं और फिर सब उसके पीछे भागने लगते हैं.

जाने माने कलाविद् और एक समय में इंडिया आर्ट फेयर से जुड़े रहे जॉनी एमएल कहते हैं कि किसी भी और क्षेत्र की तरह कला क्षेत्र में भी दस बारह बड़ी गैलरियां एक ट्रेंड तय कर देती हैं और फिर गड़बड़ी शुरु हो जाती है.

Image caption यादें..बचपन की ...मां की..बुनाई की..अब ये कला का नमूना भी है.

गड़बड़ी मतलब कैसी गड़बड़ी. जॉनी एम एल के शब्दों को दोहराया जाए तो, ‘‘जैसे ही कुछ दस बारह गैलरियां एक ट्रेंड बनाती हैं कि अगले एक दो साल में इस तरह की चीज़ें बिकेंगी तो फिर सारे नए कलाकार उसके पीछे भागते हैं. वैसा ही बनाते हैं. फिर छोटी गैलरियां भी उसी तरह की चीज़ों को खरीदती हैं.’’

यानी एक भेड़चाल बनी और भेडचाल से होता ये है कि ‘‘भारतीय कला की दुनिया में जो विविधता है या किसी भी कला क्षेत्र की, वो ख़त्म होती चली जाती है.’’

ज़ाहिर सी बात है. अगर ये बात जटिल लगे तो यह भी सोचा जा सकता है कि कभी कभी एक ही तरह के विषयों पर कई सारी किताबें कैसे छपती हैं.

यानी पब्लिशर या कला दीर्घाएं तय करती हैं कि लोग क्या पढ़ें. क्या देखें.

संवाद की जरूरत

कला की बात करें तो समस्या थोड़ी और गंभीर है क्योंकि भारत में कला को आम लोगों से दूर की ही चीज़ समझा जाता है. जब मैंने डरते डरते एक जानी मानी कलाकार नलिनी मलानी से पूछा कि क्या ये भावना सच्ची है तो वो मुस्कुराईं और सहज़ता से बोली कि गलती कलाकारों की है.

मतलब.... मैं समझा नहीं.

नलिनी कला की दुनिया में बड़ा नाम है. उन्होंने उस समय वीडियो के इंस्टॉलेशन शुरु किए जब लोग इस बारे में सोच ही रहे थे.

नलिनी की बात कहूं तो ये कहना गलत नहीं होगा कि ‘‘कलाकारों और आम जनता के बीच संवाद होना चाहिए. संवाद कम हुआ है. यूरोप में ये संवाद है. पब्लिक आर्ट की एक जगह है जो भारत में नहीं है. मैंने कुछ प्रयोग किए थे. बच्चों के साथ. उसका असर पड़ता है. अगर आर्ट एजुकेशन होता तो कई सारी घटनाएं रुक सकती थीं जो हुई हैं.’’

Image caption नलिनी अपने प्रयोगों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं.

यानी कि दिल्ली गैंग रेप या फिर कमल हासन की फिल्म का विरोध जैसी घटनाएं.... नलिनी मुस्कुराती हैं और कहती हैं कि कुछ लोगों के जज्बात बहुत कमज़ोर होते हैं जो जल्दी आहत हो जाते हैं. संवाद की ज़रूरत है कई लेबल पर.

मैं कोई कला का जानकार नहीं हूं लेकिन देखना और जानना अच्छा लगता है. अशोक वाजपेयी के अनुसार कलाकार को जितना कौशल बनाने में लगता है उतना ही दर्शक को देखने में भी लगाना पड़ता है तभी असल आनंद आता है.

ख़ैर ये दूर की बात है..लोग साक्षर नहीं जब शिक्षित होंगे तो कला को समझेंगे..फिर समाज में बदलाव भी होगा और कला में कोई ट्रेंड सेट करने के लिए कला दीर्घा नहीं आम लोगों का भी हाथ होगा तब तक इस बात से खुशी मनाई जाए कि इंडिया आर्ट फेयर जैसी जगहों पर ही बड़े कलाकारों के चित्र देखे जा सकते हैं और कभी कभी उनसे बात भी की जा सकती है.

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