संशोधित लोकपाल के समर्थन में किरण बेदी

अन्ना हजारे
Image caption किरण बेदी ने लोकपाल विधेयक में कैबिनेट के संशोधन का समर्थन किया है

अन्ना हजारे की सहयोगी और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने संशोधित लोकपाल विधेयक के मसौदे का समर्थन किया है. हालांकि अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने इस विधेयक को ख़ारिज कर दिया है.

ट्विटर पर किरण बेदी ने लिखा है, “यदि हम प्रस्तावित लोकपाल के मसौदे पर आगे बढ़ते हैं तो कोई नुकसान नहीं होगा और आगे चलकर जरूरत पड़ने पर हम इसे और बेहतर बना सकते हैं.”

इससे पहले, भ्रष्टाचार रोकने के लिए लोकपाल गठन के मुद्दे पर सरकार को मजबूर करने वाले अन्ना हज़ारे ने केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से मंज़ूर किए गए लोकपाल विधेयक के नए मसौदे को ख़ारिज कर दिया.

उन्होंने इस मसौदे को 'झूठा' बताते हुए कहा कि सरकार एक 'कमज़ोर' क़ानून पारित करवाना चाहती है.

अन्ना ने कहा, "भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए सख्त लोकपाल लाने के मसले पर अब प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी पर और भरोसा नहीं किया जा सकता है. अगर इस मुद्दे पर वे ईमानदार होते तो इस सिलसिले में ठोस फैसला लेने में सरकार को दो साल नहीं लगते".

स्पष्टीकरण

अन्ना हजारे ने कहा कि उन्होंने इस संदर्भ में सोनिया गांधी को चिठ्ठी लिखकर स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या प्रस्तावित कानून में सीबीआई और सीवीसी को सरकारी नियंत्रण से बाहर रखा गया है नहीं.

अन्ना के पूर्व सहयोगी और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भी प्रस्तावित मसौदे की आलोचना की है. अरविंद केजरीवाल ने सवाल किया है कि सरकार ऐसा लोकपाल कानून क्यों बनाना चाहती है जो भ्रष्ट लोगों का साथ देता हो.

उनका कहना है, "ये समझ से परे है कि भ्रष्ट लोगों के लिए राजनीतिक दलों के दिल में इतनी जगह क्यों है. ऐसा इसलिए है क्योंकि राजनीतिक दलों में भ्रष्ट लोग हैं."

भाजपा को भी एतराज

राज्य सभा में विपक्ष के नेता अरुण जेतली ने सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि सीबीआई की कमजोरी ही यूपीए की ताकत है और उसका अस्तित्व इसी पर कायम है.

उन्होंने कहा कि संसदीय समिति ने जो सिफारिशें की हैं उनसे सीबीआई को सरकारी अंकुश से थोड़ी आजादी मिलेगी.

उन्होंने कहा कि हमारी लड़ाई इस बात पर ज्यादा है कि किस तरह से सीबीआई को सरकारी प्रभाव से मुक्त कराया जाए.

जेतली ने कहा, "संसद में मतदान के दौरान हमेशा ही मैंने पाया है कि वोटिंग से पहले सीबीआई अपने हलफनामों में अपना रवैया बदलती है और समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी संसद में अपना रवैया बदलते हैं".

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