ग्लैमर और चकाचौंध के बीच झुग्गियों का ख्याल

  • 2 फरवरी 2013
झुग्गियों में जिंदगी की खुशियां
Image caption राशि आनंद लक्ष्यम स्कूलों के ज़रिए वंचित बच्चों को बेहतर कल देने में जुटी हैं.

बातचीत, कपड़ों और हाव-भाव में अत्याधुनिक हो जाने की चाह में क्या युवाओं के सामाजिक सरोकार क़मज़ोर पड़ चुके हैं.

मेरे लिए इस सवाल का जवाब नकारात्मक है और इस पर मुहर लगाती हैं दिल्ली की राशि आनंद.

पेशे से विज्ञापन की दुनिया से जुड़ी ये युवा लड़की अपनी इवेंट मैनेजमेंट एजेंसी चलाती है लेकिन ख़्यालों की जड़ें ज़मीन में हैं हवाई बातों में नहीं. ये साबित करता है उनका काम.

राशि आनंद पिछले दो साल से झुग्गी झोपड़ियों में 'लक्ष्यम' नाम के स्कूल चलाने और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए खिलौने जुटाने की मुहिम में लगी हैं.

लक्ष्यम

लक्ष्यम की शुरूआत के बारे में राशि बताती हैं, “मेरी मां ने सक्षम नाम का ग़ैर सरकारी संगठन बनाया और उसके तहत हमने सड़क पर ज़िंदगी बिताने वाले बच्चों और झुग्गी झोपड़ी के बच्चों के लिए पहले खिलौने जुटाने का काम शुरू किया. उसके बाद लक्ष्यम स्कूलों की शुरूआत हुई. आज हम दिल्ली तमिलनाडु और कर्नाटक समेत पांच राज्यों में काम कर रहे हैं और इसे और बढ़ाना है.”

राशि ने दिल्ली के खालसा कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की. हालांकि वो कहती हैं कि वो डिग्री हासिल करना कोई उपलब्धि नहीं था.

Image caption लक्ष्यम स्कूल अब तक भारत के पांच राज्यों में पहुंच चुके हैं.

उसके बाद राशि ने विज्ञापन और इवेंट मैनेजमेंट में डिप्लोमा किया और अपनी एजेंसी खड़ी की जो बख़ूबी चल रही है लेकिन वो ये नहीं भूलीं कि ज़िंदगी का मज़ा मुस्कुराहटें बांटने में है.

ग्लैमर, फ़ैशन और इवेंट मैनेजमेंट की चकाचौंध वाली दुनिया के बीच राशि ने पहचाना कि उनका रास्ता उन बस्तियों से होकर गुज़रता है जिनकी तरफ़ लोग देखना भी पसंद नहीं करते, लेकिन ये डगर काफ़ी मुश्किलें लेकर आई.

चुनौतियां

राशि कहती हैं, "जब हमने सड़क पर रहने वालों बच्चों को जमा कर उनके सुधार के लिए काम करना शुरू किया तो सबसे पहली दिक्कत उनके मां-बाप ने ही पैदा की. उन्होने हमसे कहा कि आप इन्हे तीन घंटे के लिए लेकर जाएं, लेकिन पहले सौ रूपए दीजिए क्योंकि इतनी देर में ये इतना पैसा कमा लाते हैं. वो काफ़ी ज़्यादा मुश्किल दौर था."

राशि आगे बताती हैं, "लड़कियां ऐसे किसी काम के लिए सड़क पर उतरें तो आप समझ सकते हैं कि उन्हे किन नज़रों का सामना करना पड़ेगा. हालांकि अब मुझे आदत हो गई है.’’

बच्चों के लिए काम करने के अलावा लक्ष्यम के ज़रिए महिलाओं को भी स्वावलंबी बनाने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाता है और उनके बनाए सामान को बाज़ार तक पहुंचाने की कोशिश भी होती है.

पिछले दो साल से इस काम को आगे बढ़ाने वाली राशि अपने भविष्य की राह को लेकर भी बिल्कुल स्पष्ट ख्याल रखती हैं. वो कहती हैं, “अभी हम केवल पांच राज्यों में पहुंचे हैं और मेरा लक्ष्य है कि इस साल लक्ष्यम स्कूलों को कम से कम 10 राज्यों तक पहुंचा दिया जाए.’’

राशि जैसे पेशेवर युवाओं को देखकर इस बात पर भरोसा बढ़ता है कि बदलाव की ज़रूरत पर बयानबाज़ी करने की बजाय एक छोटे से प्रयास से कई ज़िंदगियों को बदला जा सकता है.

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