किन फिल्मों से चिढ़ते हैं पाकिस्तानी लोग

  • 3 फरवरी 2013
जीरो डार्क थर्टी
Image caption पाकिस्तान में नहीं रिलीज की गई जीरो डार्क थर्टी

पाकिस्तान में सेंसर बोर्ड और सिनेमा मालिकों को ऐसी फिल्में पसंद नहीं आती हैं जिनमें देश की खुफिया एजेंसी आईएसआई का जिक्र हो.

पिछले साल इसी वजह से पाकिस्तानी सेंसर बोर्ड ने दो भारतीय फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया था.

'एक था टाइगर' को पाकिस्तान में इसलिए रिलीज नहीं होने दिया गया क्योंकि उसमें एक भारतीय जासूस को आईएसआई के लिए काम करने वाली लड़की से प्रेम हो जाता है.

वहीं 'एजेंट विनोद' को इसलिए प्रतिबंधित किया गया क्योंकि उसमें भारतीय जासूस का सामना आईएसआई के कुछ ताकतवर जासूसों से होता है और वो उन्हें हरा देता है.

प्रतिबंध के कारण बहुत से लोग सिनेमाघरों में भले ये फिल्में न देख पाएं हो लेकिन इनकी पाइरेटिड डीवीडी वहां आसानी से उपलब्ध थी और बहुत से लोगों ने ये खरीदीं और फिल्मों को देखा भी.

इसके बाद वे बोले, “देखा इन भारतीयों को, हमेशा हमारी छवि को धूमिल ही करते रहते हैं.”

हालांकि ऐसा ही रवैया हॉलीवुड फिल्म 'जीरो डार्क थर्टी' को लेकर है.

मासूमियत का अपमान

पाकिस्तान में अल कायदा के पूर्व प्रमुख ओसामा बिन लादेन को ढूंढे जाने और फिर अमरीकी सैन्य अभियान में मारे जाने की कहानी पर बनी इस फिल्म में आईएसआई एजेंटों को तो नहीं दिखाया गया है, लेकिन फिर भी फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं कि सेंसर बोर्ड से इसकी रिलीज की अनुमति मांगें.

Image caption एक था टाइगर भी पाकिस्तानी लोगों ने सिर्फ पायरेटिड डीवीडी के सहारे देखी

उन्होंने खुद ही इस फिल्म को पाकिस्तान में डिस्ट्रीब्यूट न करने का फैसला कर लिया है.

वजह: इस फिल्म में ऐसे व्यक्ति को पेश किया गया है जिसकी वजह से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों को दुनिया भर में बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी.

ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में एक सैन्य अकादमी के पास कई वर्ष तक रहे लेकिन देश की किसी भी खुफिया एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी.

और जब आधी रात को अमरीका की विशेष सैन्य टुकड़ी नेवी सील्स दुनिया के सर्वाधिक वांछित को पकड़ने और मारने का अभियान चला रही थी तो पाकिस्तान की ताकतवर सेना नींद में सोई हुई थी.

इसीलिए 'जीरो डार्क थर्टी' को हमारी मासूमियत अपमान की तरह देखा जा रहा है.

लेकिन प्रतिबंध का नतीजा फिर वहीं हुआ. हर कोई पचास रुपये में इसकी पायरेटिड डीवीडी खरीद रहा है.

आपत्ति के आधार

इस फिल्म में दिखाए गए पूछताछ के दमनात्मक तरीकों को लेकर खासा विवाद हो रहा है, लेकिन पाकिस्तान में इन विवादास्पद दृश्यों को लेकर कोई विवाद नहीं है.

Image caption रात के अंधेरे में अमरीकी सैन्य टुकड़ी ने ओसामा बिन लादेन के खिलाफ अभियान को अंजाम दिया

जिन लोगों ने ये फिल्म देखी है, उन्हें अब ये तो पता चल ही गया होगा कि 'वॉटर बोर्डिंग' कोई पानी का खेल नहीं है. वो ये भी जान गए होंगे कि अगर उत्पीड़न करने में माहिर हो गए तो जल्द ही आप अमरीकी सरकार में बड़े अधिकारी बनाए जाए सकते हैं.

इस फिल्म से ये भी सबक मिलता है कि दुनिया की रक्षा के लिए आपको एक बाल्टी पानी, कुछ नकाबपोश लोग और इस्लामाबाद में तैनात एक ऐसी अमरीकी महिला की जरूरत है जो कंप्यूटर चलाना जानती हो.

आपत्तियां तो तभी शुरू होती हैं जब फिल्म यातना केंद्रों से बाहर निकलती है और लोगों को इस बात पर आपत्ति नहीं कि हिंसा करने वाले पेशेवर व्यक्ति अपनी आइसक्रीम बंदरों को खिलाता है.

एक ऐसी फिल्म जिसमें अत्यधिक दमन को रोजमर्रा के दफ्तरी कामकाज का हिस्सा दिखाया गया है, उस पर पाकिस्तान की रोजमर्रा की जिंदगी की गलत तस्वीर पेश करने का आरोप कुछ सही नहीं लगता है.

विदेशी फिल्मों का विरोध करने में माहिर पाकिस्तानियों को जीरो डार्क थर्टी के रूप में एक खजाना हाथ लगा है.

पाकिस्तानी दर्शकों के कुछ बड़ी आपत्तियां इस प्रकार की हैं कि हम तो अरबी भाषा नहीं बोलते हैं और न ही खास अरब व्यंजन हुमुस खाते हैं.

एक आम सोच ये भी है कि हमारे यहां फिल्म में अमरीकी महिला के दावे के विपरीत बहुत ज्यादा एसयूवी गाड़ियां नहीं हैं.

वेवकूफ

'जीरो डार्क थर्टी' का पाकिस्तान उत्पीड़न केंद्र, सीआईए के कंप्यूटरों, अरबी बोलते हुए पश्तून नेताओं और अंग्रेजी बोलते अरबी बोलते हुए अरबी नेताओं पर आधारित है.

Image caption लादेन की वजह से पाकिस्तान को बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी

लेकिन चूंकि उत्पीड़न केंद्रों के विशेषज्ञों को भी आखिरकार अपने केंद्रों से बाहर निकलना होता है, इसलिए आपको पाकिस्तान की असल जिंदगी की झलक भी दिखाई पड़ती है.

जाहिर तौर पर ये ऐसा मुल्क है जहां हमलावर अमरीकी राजनयिकों पर खुले आम फायरिंग करते हैं, कानून लागू करने वाली एजेंसियों के कर्मचारियों को बुजुर्ग अफगान महिलाओं का रूप धरना पड़ता है और एक स्थानीय व्यक्ति को जो वाक्य बोलने की अनुमति है, वो ये है, “हमें गोरे लोगों के चेहरे पसंद नहीं हैं”

ये सब बातें अपनी जगह हैं लेकिन एक फिल्म समीक्षक ने 'जीरो डार्क थर्टी' को सही बताया है.

नोमान अंसारी लिखते हैं कि जहां तक 2 मई 2011 की घटना का सवाल है तो जीरो डार्क थर्टी हमें वेबकूफ और नाकारा साबित करती है, जो कि हम थे भी.

वैसे भी फिल्म में आईएसआई एक मेहमान भूमिका में नजर आती है जब फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाली महिला कहती है कि इसका भांडा फोड़ने की जिम्मेदारी आईएसआई की है.

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