बलात्कार-विरोधी अध्याधेश: 'चर्चा अभी बाकी है'

Image caption चिदंबरम का कहना है कि जस्टिस वर्मा के सुझावों को खारिज नहीं किया गया है

यौन हिंसा संबंधी अध्यादेश को लेकर आलोचना का सामना कर रही सरकार ने अब अपने बचाव में कहा है कि अध्यादेश में सुझाए गए प्रावधानों पर सर्वसम्मति नहीं बन पाई है और आने वाले संसद सत्र में सभी पार्टियों के साथ इस पर चर्चा की जाएगी.

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा मंज़ूर किए गए इस अध्यादेश पर हाल ही में राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर किए थे.

कई महिला संगठनों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया था कि वे इस अध्यादेश पर हस्ताक्षर न करें क्योंकि इसमें जस्टिस वर्मा आयोग की सिफ़ारिशों को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया है.

सोमवार को एक प्रेस वार्ता में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कहा, “ये कहना ठीक नहीं होगा कि जस्टिस वर्मा के सुझावों को कैबिनेट ने खारिज कर दिया है. अध्यादेश पर सभी राजनीतिक पार्टियों से संसद में चर्चा की जाएगी अभी इस अध्यादेश में बदलाव आएंगे.”

संसद का बजट सत्र 21 फरवरी से शुरू हो रहा है और इन सुझावों को कानून में परिवर्तित करने के लिए संसद को छह सप्ताहों के भीतर इसे पास करना होगा.

दरअसल अध्यादेश में सुझाए गए कई प्रावधानों पर समाज के कई तबकों की राय बंटी हुई है.

शादी के बाद पत्नी की मर्जी के बिना यौन संबंध बनाना, आफसपा यानी आर्मड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट के तहत सेनाकर्मियों का बचाव और नाबालिगों के लिए बनाए गए कानून में संशोधन का मुद्दा विवादों में छाया हुआ है.

बंटा हुआ है मत

पी चिदंबरम ने कहा कि इन सभी मुद्दों पर मत बंटा हुआ है और संसद में चर्चा के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा.

साथ ही उन्होंने कहा कि अध्यादेश को कानून बनाने से पहले सरकार संसद के अलावा पुलिस और सेना का मत भी जानना चाहेगी.

Image caption महिला संगठनों ने इस अध्याधेष में सुझाए गए प्रावधानों की आलोचना की है

जस्टिस वर्मा ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि शादी के बाद अगर पति अपनी पत्नी की मर्जी के बिना यौन संबंध बनाता है, तो उसे बलात्कार माना जाए. लेकिन सरकार ने अपने अध्यादेश में इस सुझाव को ठुकरा दिया था.

बलात्कार के आरोपियों को मौत की सज़ा देने के सुझाव के बारे में पी चिदंबरम ने सफाई देते हुए कहा कि मौत की सज़ा केवल दुर्लभ मामलों में ही दी जा सकती है.

जब उनसे पूछा गया कि सरकार ने इस अध्यादेश को लाने के लिए संसद के आने वाले सत्र का इंतज़ार क्यों नहीं किया तो उन्होंने कहा, “मामले की गंभीरता को देखते हुए ये कदम उठाया गया.”

हालांकि कई महिला संगठनों और आलोचकों का कहना है कि सरकार ने ये कदम केवल जनता को ये दिखाने के लिए उठाया है कि वे बलात्कार के मामले को लेकर गंभीर हैं.

पिछले साल दिसंबर में दिल्ली में एक 23-वर्षीय छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और बर्बर हमले के बाद पूरे देश में आंदोलन हुआ और बलात्कार संबंधी क़ानूनों को सख़्त करने की मांग उठी थी.

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