मिलिए देश के पहले दृष्टिहीन चार्टर्ड अकाउंटेंट से

  • 8 फरवरी 2013
राजशेखर रेड्डी

राजशेखर रेड्डी चार्टर्ड एकाउंटेंट बन गए हैं. आप पूछ सकते हैं कि इसमें उल्लेख की क्या बात है?

लेकिन 24 वर्ष के राजशेखर का चार्टर्ड एकाउंटेंट बनना उनकी उपलब्धि इसलिए बन गई है क्योंकि वो देख नहीं सकते और वो शायद भारत के पहले व्यक्ति हैं जो दृष्टि बाधा के बावजूद इस मुकाम तक पहुँचे हैं.

चार्टर्ड एकाउंटेंसी की राष्ट्रीय परीक्षा में सफलता प्राप्त करके अब ये नौजवान युवाओं के लिए मिसाल बन गए हैं.

इस व्यवसायिक कोर्स को इतना कठिन माना जाता है कि कई सामान्य युवा भी इसे पूरा नहीं कर पाते.

अब उनकी इच्छा किसी फॉर्चून 500 कंपनी में सीईओ बनने की है.

कमी ने पैदा किया हौसला

राजशेखर पैदाइशी दृष्टिहीन नहीं हैं. सिर में हुई एक रसौली के कारण 11 वर्ष की आयु में उनकी आंखों की रौशनी चली गई थी.

गुंटूर के रहने वाले राजशेखर उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, "जब मैं कुछ भी देखने के काबिल नहीं रहा तो मुझे लगा कि अब मेरे जीवन का अंत हो गया है. मैंने कभी आत्महत्या की बात तो नहीं सोची लेकिन मेरा जीवन निराशा में डूब गया था."

राजशेखर कहते हैं, "मैं एक साल तक घर में किसी पत्थर की तरह पड़ा रहा. मेरे माता पिता मुझे देख कर रोते थे और कहते थे कि काश वे मेरे लिए कुछ कर सकते."

यही आंसू राजशेखर के लिए प्रेरणास्रोत बन गए.

जब राजशेखर की आंखों की रौशनी गई तब वह सिर्फ़ पांचवीं तक ही पढ़ पाए थे. निराशा के अंधकार में उम्मीद की एक किरण उनकी दादी लेकर आईं जब उन्होंने हैदराबाद में दृष्टिहीन बच्चों का स्कूल ढूंढ निकाला.

दादी की ज़बर्दस्ती और राजशेखर की ज़िद के आगे माता पिता को झुकना और उन्हें इस स्कूल में भेजना पड़ा.

हैदराबाद का देवनार फाउंडेशन, जो देश में दृष्टिहीन बच्चों का पहला इंग्लिश मीडियम स्कूल था, राजशेखर का नया घर बन गया.

वह बताते हैं कि "यहाँ आकर मैंने फैसला किया कि मेरा पिछला जीवन ख़त्म हो चुका है. जब तक मेरी आँखें थीं, मुझे पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. अगर कोई मुझे ज़बरदस्ती पढने के लिए बिठाता तब भी मैं पेंसिल, रबर और दूसरी चीज़ों से खेलता रहता. लेकिन आँखें जाने के बाद माता-पिता के दुख ने सब कुछ बदल दिया और मैं पढ़ने को लेकर बहुत गंभीर हो गया".

संकल्प से बने मिसाल

राजशेखर के पिता सत्यनारायण रेड्डी एक इलेक्ट्रिशियन हैं और माँ राज्यलक्ष्मी घरेलू महिला हैं, जबकि उनका छोटा भाई रामकृष्ण अब एम टेक का छात्र है.

देवनार फाउंडेशन के संस्थापक और आँखों के मशहूर डॉक्टर पद्मश्री साईं बाबा गौड़ कहते हैं. "जब राजशेखर रेड्डी हमारे पास आया था तो 11 साल का बच्चा था. लेकिन उसकी योग्यता, कड़ी मेहनत और संकल्प को देख कर हर कोई प्रभावित था".

दसवीं कक्षा के बाद जब राजशेखर ने एक चार्टर्ड एकाउंटेंट बनने की इच्छा जताई तो परिवार और बाहर के लोगों ने कहा कि यह असंभव है लेकिन स्कूल में सबने उसका समर्थन किया.

गौड़ कहते हैं, "मैंने उससे केवल एक बार इस संबंध में बात की. जब उसने यही इरादा जताया तो हमने उसकी पूरी सहायता की. वह इस कोर्स की ट्रेनिंग के लिए छह महीने चेन्नई में भी रहा. "

राजशेखर का कहना था कि इस कोर्स के दौरान सब से बड़ी कठनाई एक जगह से दूसरी जगह जाना था. "हैदराबाद में मेरा कोचिंग सेंटर घर से बहुत दूर था और मुझे सुबह छह बजे से पहले बस पकड़नी होती थी. आज मैं उन सभी हाथों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जो मेरे सहारे के लिए आगे बढ़े, जिन्होंने मुझे सड़क पार करने में मदद की. मेरी सफलता में उन सबका हाथ है".

लेकिन सवाल यह है कि एक दृष्टिहीन कैसे एक चार्टर्ड एकाउंटेंट का कर्तव्य पूरा कर सकेगा.

सपना है, फॉर्चून 500

अपने स्कूल के लड़के-लड़कियों के साथ राजशेखर

राजशेखर का कहना है, "टेक्नोलॉजी और नए सॉफ्टवेर ने हमारे लिए यह काम आसान कर दिया है. अब ऐसे सॉफ्टवेर उपलब्ध हैं कि जो कुछ कंप्यूटर के स्क्रीन पर होता है वह हमें पढ़ कर सुनाता है. हम जान सकते हैं कि एक्सेल शीट पर क्या किया गया है और हमें क्या करना है".

अब राजशेखर को इंतज़ार है किसी अच्छी कंपनी में पसंद की नौकरी का. वो कहते हैं, “मुझे टैक्स के मामलों में दिलचस्पी है और मैं यही काम करना चाहता हूँ. अन्यथा मेरा सपना किसी फार्च्यून 500 कम्पनी का सीईओ बनने का है".

राजशेखर के टीचरों को उसकी सफलता पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ.

500 दृष्टिहीन लड़क-लड़कियों के देवनार स्कूल की प्रिंसिपल लिली एलबर्ट का कहना है, “दृष्टिहीन छात्रों की योग्यता आश्चर्यचकित कर देने वाली होती है. राजशेखर भी ऐसा ही एक छात्र था, जिसने अपने आप को पढ़ाई में झोंक दिया.उसने अपने दृष्टिहीन होने को एक चुनौती के रूप में लिया."

स्कूल के स्वयंसेवी अध्यापकों में से एक रिटायर्ड कर्नल रमाशंकर डोंगे कहते हैं,"मैंने 12 वर्षों में जितना इन बच्चों को पढ़ाया है, उससे ज्यादा उनसे सीखा है. आप कभी इन बच्चों से निराशा की कोई बात नहीं सुनेंगे. वे कभी शिकायत नहीं करेंगे. आम बच्चों का दिल टीवी और खेल में लगता है लेकिन ये बच्चे सिर्फ़ पढ़ाई पर ध्यान देते हैं".

इसी स्कूल में दसवीं कक्षा के छात्र अभिलाष का कहना था, " भैया ने जो कुछ किया है वह हम सब के लिए एक बड़ी प्रेरणा है".

एक और छात्रा रावली कहती हैं, "हमें उन की सफलता पर बहुत ख़ुशी हुई. मैं उनसे प्रेरणा लेकर आईएएस बनना चाहती हूँ".

खुद राजशेखर का कहना है, "मैं दुनिया को बताना चाहता हूँ कि दृष्टिहीन लोग न केवल शिक्षा में सफल हो सकते हैं बल्कि काम के मैदान में भी वह दूसरों से ज्यादा अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं".

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