जानलेवा बैक्टीरिया भी हैं 'पवित्र' गंगा जल में

  • 8 फरवरी 2013
Image caption गंगा में ऐसे जीवाणु भी हैं जिन पर अब एंटी बायोटिक दवाओं का असर नहीं होता.

ताज़ा वैज्ञानिक प्रयोग बताते हैं कि ऋषिकेश और गंगोत्री के गंगा जल में रोगाणुओं को मारने की क्षमता बरक़रार है. मगर कानपुर और इलाहाबाद में गंगा के पानी में जानलेवा बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु जीवित हैं.

लखनऊ के भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान यानी आईआईटीआर के वैज्ञानिकों के अनुसार कानपुर में बिठूर से शुक्लागंज तक गंगा के पानी की जाँच में पाया गया कि उसमें डायरिया, खूनी पेचिश और टायफाइड जैसी बीमारियाँ पैदा करने वाले जीवाणु मौजूद हैं.

इनमें से कुछ ऐसे जीवाणु भी हैं जिन पर अब एंटी बायोटिक दवाओं का असर नहीं होता.

ये उस गंगा का पानी है जिसे पवित्र और जीवनदायिनी कहा जाता है और ये उसी भारत में बहती है जहाँ हर साल हज़ारों बच्चे डायरिया से मरते हैं.

ख़तरनाक पानी

आईआईटीआर के वैज्ञानिकों ने गंगा के पानी में बैक्टीरिया को पहचानने का मुश्किल काम किया है.

उनका कहना है कि कानपुर में गंगा के पानी में प्रदूषण की समस्या इसलिए अधिक है क्योंकि शहर की आबादी बहुत अधिक है और रोज़ाना करीब 75 करोड़ लीटर सीवेज या मलजल नदी में गिरता है.

इसमें चमड़ा और दूसरे कारखानों का ज़हरीला केमिकल और अस्पतालों का विषैला पानी शामिल है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी मानता है कि गंगा की पूरी धारा में बहुत अधिक संख्या में कोलिफॉर्म जीवाणु या बैक्टीरिया मौजूद हैं.

कन्नौज से बनारस के बीच समस्या कुछ ज्यादा ही गंभीर है.

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अभी तक सिर्फ़ ये जाँच करता रहा है कि पानी में घुलित ऑक्सीजन, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड और टोटल कोलीफॉर्म या बैक्टीरिया कितना है.

लेकिन वे बीमारी पैदा करने वाले जीवाणुओं की अलग-अलग पहचान के लिए जाँच नहीं करते.

क्यों हो रहा है ऐसा?

अध्ययन इस बात का भी नहीं हुआ कि कानपुर जैसे शहर में गंगा के पानी में जो रोगों के जीवाणु पल रहे हैं उनका लोगों के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है.

डा. ऋषि शंकर की सलाह है कि सरकार को अपने नियमों में बदलाव करके समय समय पर इनकी जाँच करनी चाहिए कि नदी से जो पानी पीने के लिया जा रहा है उसमे कौन कौन से जीवाणु हैं और वे दूर हुए या नहीं.

कई वैज्ञानिकों का कहना कि गंगा के पानी में बैक्टीरिया को खाने वाले बैक्टीरियोफाज वायरस होते हैं.

लेकिन डा. ऋषि शंकर का कहना है कि अब संभवतः प्रदूषण अधिक होने से बैक्टीरिया को खाने वाले वायरस घट गए हैं.

वे कहते हैं, “जो बैक्टीरियोफॉज़ या वायरस होते थे, ये बैक्टीरिया को मारते थे और इनकी कोई गिनती या तादाद होती थी. अब कूड़ा इतना ज्यादा आ रहा है उसके अंदर कि अगर वो वहाँ पर हैं तो वह इतनी कम संख्या में हैं कि उनको नहीं मार पाते. इसलिए पानी स्वच्छ नहीं हो पाता.”

कानपुर में गंगा प्रदूषण रोकने के लिए काम करने वाली संस्था ईको फ्रेंड्स के अध्यक्ष राकेश जायसवाल कहते हैं कि इस धारणा और विश्वास ने गंगा जी का बहुत नुक़सान किया है कि गंगा सारी गंदगी साफ़ करने में सक्षम है.

प्रदूषण से गंगा के अदृश्य पहरेदारों का कम होना, गंगा का स्वयं बीमार होना उसके पानी में रोगाणुओं का ज़िंदा रहना न केवल मानव स्वास्थ्य बल्कि हमारी सभ्यता और संकृति के लिए लिए भी गंभीर खतरे का संकेत है.

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