युवा भारतीयों की चाहत है ब्रितानी डिग्री

Image caption तुषार ने ब्रिटने के तीन कॉलेजों में दाखिला पा लिया है, हालांकि उन्हें आईआईटी के नतीजों का इंतज़ार है.

भारत में 12वीं के बाद कॉलेजों में लगती कतारें तो आपने देखी ही होंगी. दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ नामी कॉलेजों में तो एडमिशन के लिए आपको 95 प्रतिशत से ज्यादा नम्बरों की ज़रुरत पड़ सकती है.

अब भारतीय छात्र 12वीं के बाद अंडरग्रैजुएट कोर्स के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं.

इस साल भारत से ब्रिटेन के कॉलेजों में पहुंची दाखिले की अर्जिंयों में 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि अर्जिंयां दाखिल करने की अंतिम तरीख अभी बाकी है.

गुडगांव में रहने वाले तुषार कालरा ने 2012 में 12वीं पास की थी लेकिन आईआईटी में दाखिला नहीं पा सके.

अबकी बार तुषार ने फिर से आईआईटी का इम्तिहान देने की सोची है लेकिन अबकी बार उनके पास एक और योजना है.

तुषार ने अबकी बार ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी में भी दाखिले के लिए अर्ज़ी दी है.

तुषार कहते हैं, “अगर मेरा आईआईटी में एडमिशन हो गया तो ठीक है वर्ना में ब्रिटेन से इंजीनियरिंग करुंगा.”

ब्रिटेन से डिग्री लेना सस्ता नहीं पड़ता लेकिन तुषार के पिता पंकज कालरा खर्च करने के लिए तैयार हैं.

पंकज कालरा कहते हैं,“भारत में अगर चोटी की संस्थाओं को छोड़ दें तो बाकी की शिक्षा का स्तर बहुत अच्छा नहीं है. ब्रिटेन में बच्चों को पढ़ाने में खर्च तो अच्छा खासा है लेकिन बैंक लोग लेने की सोची है.”

महानगरों के अमीर और उच्च मध्यवर्गीय किशोर पढ़ाई के लिए ब्रिटेन का रुख़ कर रहे हैं. 2011-12 में मलेशिया और इटली से आने वाले छात्रों में सबसे अधिक बढ़ोतरी हुई है जबकि भारत का नंबर तीसरा है.

पीडीके ग्लोबल एजुकेशन की सपना कपूर कहती हैं, “अंडरग्रैजुएट डिग्री के लिए विदेश जाने वाले बच्चे उच्च मध्यम और उच्च वर्ग के होते हैं क्योंकि अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम्स काफी मंहगे पड़ते हैं.”

सपना कपूर कहती हैं कि अंडरग्रैजुएट प्रोग्राम्स के लिए स्कॉलर्शिप कम हैं और उसके बाद नौकरी मिले इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है.

सबसे ज्यादा संख्या चीन से

इसके बावजूद भी युवा छात्रों का क्रेज़ अब भी बरकरार है. ब्रिटेन में विदेशी छात्रों मे सबसे बड़ी संख्या चीन से आती है.

भारत से जो छात्र ब्रिटेन आते हैं उनमें बड़ी तादाद पोस्ट-ग्रैजुएट स्टूडेंट्स की है मगर उनकी तादाद में पिछले साल कमी देखी गई.

जानकार मानते हैं कि भारत में शीर्ष संस्थानों और दूसरी श्रेणी के संस्थानों में ज़मीन आसमान का अंतर है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे पुष्पेश पंत कहते हैं, “विदेश में पढ़ाना भारतीयों के लिए नई बात नहीं है. जिनका पहले भी साम रहा था वो विदेशों में बच्चों को पढ़ाते थे. सबसे बड़ा उदहारण तो खुद जवाह लाल नेहरु थे.”

पुष्पेश पंत कहते हैं कि भारतीय छात्र वैश्विक स्तर पर मुकाबला करना चाहते हैं, “आईआईटी जैसे संस्थानों में आरक्षण के बाद आम छात्रों के लिए दाखिला असंभव सा लगता है, तो जो लोग खर्च उठा सकते हैं वो सोचते हैं कि चलो विदेश से ही पढ़ लिया जाए.”

संबंधित समाचार