नक्सलियों का अगला ठिकाना उड़ीसा है?

  • 11 फरवरी 2013
नक्सली

दंडकारण्य के नक्सली इलाक़े पर लिखी गई शुभ्रांशु चौधरी की किताब 'उसका नाम वासु नहीं' इस समय चर्चा में है.

शुभ्रांशु चौधरी ने सात वर्षों के लंबे शोध के बाद ये किताब लिखी है.

अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में प्रकाशित इस किताब का एक अंश हम अपने पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं.

पुस्तक अंश

समय जैसे उड़ गया. फिर विदा लेने का समय हो गया. कैंप में सभी कतार बांध कर हाथ मिलाने और लाल सलाम कहने को खड़े हो गए. इस बार उन्होंने ‘‘जाने वाले साथियों को लाल सलाम लाल सलाम’’ गाया.

गणपति मुझे गले लगाने के लिए आगे आए. पहले किसी माओवादी नेता में ऐसा नहीं किया था और मुझे कुछ संकोच हुआ, एक पत्रकार की हैसियत से यह सही नहीं लगा, लेकिन मना करना भी ठीक नहीं था. उन्होंने दोबारा मिलने का वादा किया. संभव था कि किसी बातचीत के दौरान, या प्रेस कॉन्फ्रेंस में हम मिलें, या जंगल में फिर मिलें या कि कभी नहीं. मुझे खेद था कि उनके साथ मेरा साक्षात्कार बहुत अर्थपूर्ण नहीं रहा.

हमने प्रस्थान किया, और सूरज ढलने पर वेंकिटेश ने भी विदा ली. उन्हें किसी काम से जाना था. उनने मुझे साथी कॉमरेड्स को सौंप दिया जो मुझे अगली सुबह सड़क तक पहुंचाने वाले थे. हमने रात जंगल में बिताने का निर्णय लिया क्योंकि सड़क के इतने पास किसी गांव में जाना असुरक्षित होता.

मैं अब आंदोलन के सबसे छोटे सैनिकों के साथ था. वे पांचों 18 वर्ष के आसपास के ही थे. थोड़ी देर बाद एक छोटा लड़का हमारे लिए गांव से भोजन ले आया. हम अंधेरे में ही खा रहे थे, कि वह बढ़िया हिंदी में बात करने लगा. ‘‘हम आदिवासियों को लड़ना होगा, और कोई विकल्प नहीं. आज हमारे पास पर्याप्त भोजन भी नहीं तो हम जनताना सरकार के साथ खेतों की उत्पादकता बढाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन यह लड़ाई केवल भूख की नहीं. यह बदलाव के लिए लड़ाई है, और यह जल्दी नहीं होने वाला. जब तक जनता का समर्थन है, हम लड़ेंगे. अगर लड़ाई यहां खत्म हो भी गई तो नए इलाके में शुरू हो जाएगी.’’

‘‘तुम कौन हो’’ मैंने पूछा. ‘‘मुझे तुम्हारा चेहरा भी नहीं दिखाई दे रहा.’’

‘‘यह महत्वपूर्ण नहीं,’’ उसने कहा और जैसे ही हमने खाना खा लिया, वह चला गया.

बाद में सर्दी से बचने के लिए हम आग के चारों ओर बैठ गए. वेट्टी ने अपने पर्स में से एक लड़की की फोटो निकाली. उसने बताया कि वह उसकी दोस्त कड़ती पेंटी थी. ‘‘मुझे वह अच्छी लगती थी,’’ उसने बताया. ‘‘मेरे गांव में जनताना सरकार की प्रमुख थी वह. दोरनापाल कैंप के सोयम एर्रा के नेतृत्व में सलवा जुडूम के गुंडों ने उसे उठा लिया. मैं उन्हें मार डालूंगा. उन्होंने उसके साथ बलात्कार करके उसके टुकड़े कर दिए, और बोरे में ठूंस कर शबरी नदी में फेंक दिया. बोरा बाद में एक मछुआरे को मोल्किसोली गांव में मिला.’’

वेट्टी चुप हुआ तो सभी शांत थे. मैं कैंप में सोयम एर्रा से मिला था लेकिन मैं भी चुप रहा. क्या ये लोग अपने व्यक्तिगत दुःख बांटते हैं?

जितरू ने अपने परिवार के बारे में बताया, कैसे गांव जले थे, कैसे परिवार के सदस्यों को सलवा जुडूम द्वारा मार दिया गया. उसने बताया कि वह सातवीं कक्षा तक पुस्बाका के उस आश्रम स्कूल में पढ़ा जहां मैंने रात बिताई थी. जब उसने वह सब हिंसा देखी तो पढ़ाई से उसका मन उठ गया. कैंप में जितरू ने मुझसे बहुत से प्रश्न पूछे थे. विषय के बारे में समझ बनाने की इच्छा उसके चेहरे की चमक से समझ में आती थी. वह फिलिस्तीन और कश्मीर की राजनीति के बारे में सब कुछ जानना चाहता था. चांद पर भेजे गए मिशन, वहां मिले पानी के बारे में उसने रेडियो पर सुना था. वह मुझे दुनिया के किसी बच्चे से अलग नहीं लगा. काश वह अपनी पढ़ाई जारी रख पाता लेकिन उसे तो विश्वास था कि युद्ध के अलावा कोई विकल्प नहीं.

आकाश महाराष्ट्र से है. उसे मालूम है कि वह इस युद्ध में अपने ही लोगों से लड़ रहा होगा.परिवार के सदस्य और मित्रा एक दूसरे की हत्या करेंगे. उसकी कक्षा का एक लड़का और दो लड़कियां पार्टी में शामिल हो गई. रिश्ते के दो भाई पुलिस में भर्ती हो गए हैं.

वह कहता है कि गड़चिरोली में पुलिस विभाग में नौकरी पाना आदिवासियों के लिए बहुत आसान हो गया है. किसी को घूस नहीं देनी पड़ती. दसवीं की जगह सातवीं पास होना ही पर्याप्त है. लेकिन आकाश सोचता है कि यह सब करके लोग फंस रहे हैं और उसके दोस्त जो पुलिस में भर्ती हो गए हैं, उन्हें यह दिखाई नहीं देता.

उस रात आकाश ने रेडियो पर सुना था कि छत्तीसगढ़ में रायगढ़ के लोगों ने सरकार को पत्र दिया है कि वे अपनी ज़मीन उद्योगों के लिए नहीं देना चाहते. लेकिन उसे डर था कि इन लोगों पर पुलिस का दमन बढ़ेगा.

‘‘वन विभाग की जगह अब सरकार का चेहरा पुलिस हो गई है,’’ उसने कहा, इस विश्वास के साथ कि पुलिस के साथ न हो कर वह सही का साथ दे रहा है. ‘‘आदिवासी और किसानों की रैलियों को कठोरता से दबाया जा रहा है. अगर हम बंदूक न उठाएं तो सरकार हमारी नहीं सुनेगी.’’

सरियम इरमा पालमाड्गू से है. उसे अपने गुरु जी रामबरन पटेल से बहुत प्रेम था. सरियम गुरु जी की आंखों का तारा था. क्योंकि वह पढ़ने में तेज था. सरियम बड़ा होकर शिक्षक बनना चाहता था. लेकिन जब सलवा जुडूम का हमला हुआ तो उन्होंने रामबरन से जबरदस्ती सरियम को पिटवाया और उसका घर जलवा दिया. सरियम ने पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया. ‘‘मैं भी इंसान हूं, मैं भी लड़ सकता हूं. मैं अन्याय का मुकाबला करूंगा. जो लड़के एसपीओ बन गए वे जानते हैं कि उनका जीवन बहुत छोटा है. उनका कोई भविष्य नहीं तो वे वहशी हो गए हैं. वे मेरे गांव आते हैं जो चाहे लूट कर साथ ले जाते हैं. बाद में गांव की औरतें एक रैली निकाल कर पुलिस स्टेशन से गिरफ्श्तार लोगों को मुक्त करा लाती हैं. यही होता है बार बार. लोग नर्क में रह रहे हैं. यह बदलना होगा.’’

Image caption बस्तर में भारी संख्या में सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं

फिर कॉमरेड सोनी की बोलने की बारी थी. उस रात वह अकेली लड़की हमारे साथ थी. मैं उससे पहले की यात्रा में मिला था, वह शहीदी दिवस की रैली में बुलंद आवाज़ में नारे लगा रही थी. मैंने उस दुबली सी ज़ोरदार स्वर वाली लड़की के बहुत से फोटो खींचे थे. जब वह बोलने को खड़ी हुई तो सारी भीड़ चुप्पी साध कर पूरे आधा घंटे उसकी बातें सुनती रही. मुझे उसके शब्द भले समझ में न आए हों, लेकिन मुझे दिख रहा था कि सोनी बोलती थी तो सभी सुनते थे.

उसने बताया कि वह किस्टाराम के पास चंद्रगुडा गांव की थी, घर में तीन बहनों में बड़ी. उसकी मां उसके बचपन में ही गुजर गईं. पिता ने ही बेटियों को पाला. ‘‘मैं जानती हूं कि उन्हें मेरी दो छोटी बहनों की देखभाल में मुश्किल होती होगी. मैंने देखा कि मेरे गांव में और आस पास सब परेशान थे. और मैं समझ गई कि समस्या हर एक से बड़ी थी. मुझे सब की मदद करने के लिए कुछ करना होगा. इसी लिए मैं यहां हूं और मैं आखिरी सांस तक लडूंगी.’’ सोनी अब भी बहुत भावुक बातें करती है, दिल की गहराई से.

इनमें से कुछ तो वयस्क भी नहीं हैं. और कितने बोझ उठाए चल रहे हैं जिन्हें वह किसी से बांट भी नहीं सकते. जिसने इतना सहा हो उससे क्या शांति की बात की जा सकती है? ये उन आदिवासियों से अलग हैं जिनसे मैं पहले बीबीसी की रिपोर्टों के लिए मिला था. ये बलिदान की बात करते हैं. और उन्हें समझ है कि लंबे युद्ध में ऊंच नीच को सहने का क्या अर्थ होता है. वे देख रहे हैं कि उनके लिए कोई दूसरा रास्ता नहीं है. उन्होंने भारत के दूसरे हिस्सों की उन के जैसी कहानियां सुनी हैं. सिंगूर और नंदीग्राम नाम इनके लिए नए नहीं, हालांकि उन्होंने जगदलपुर भी नहीं देखा. यह कोई विद्रोह नहीं युद्ध है. ये पहले आदिवासी माओवादी हैं जिनसे मैं मिला हूं. आंध्र के कॉमरेड्स ने बहुत मेहनत की है, और यहां सिद्धांत गहरे पैठ गए हैं.

सतीश और उनका दल हमारे साथ आग के चारों ओर बैठ गया. वे वहां से गुजर रहे थे और पास ही कैंप भी डाला था. हम पहले मिल चुके थे. लेकिन उस दिन मैं सतीश से आंध्र के युवा नेतृत्व का प्रतिनिधित्व कर रहे व्यक्ति की तरह बात करना चाहता था.

सतीश की उम्र 30 के आस पास होगी, आंध्र के अन्य नेताओं से वह काफी छोटा था. उसने बताया कि वह आंध्र से आने वाले लोगों में आखिरी था. ‘‘मेरे पिता जी ठेकेदार थे और तेलुगु देसम पार्टी के साथ थे. लेकिन उन्होंने वह राजनीति छोड़ दी, जब उन्हें पता चला कि मेरी राजनीति क्या है. मेरे जीवन का कोई ठिकाना नहीं. पिछली बार जब मेरा घर में संपर्क हुआ तब मेरा भाई इंजीनियरिंग कॉलेज में था. आज यूं ही मैं अपनी पत्नी से थोड़ी देर के लिए मिल पाया. छः महीने बाद. कभी तो हम सालों नहीं मिल पाते.’’

‘‘आप थकते नहीं? क्या है जो आपको प्रेरित रखता है? मैं तो थोड़े समय के लिए ही आया हूं और मुझे यह बहुत मुश्किल लगता है, और मैं तो अब घर पहुंचने की राह देख रहा हूं.’’

सतीश ने मेरी ओर देखा, ‘‘हां सरेंडर कर देना बहुत आसान हैं. आंध्र से आए सैकड़ों लीडर्स ने सरेंडर कर दिया. आज तो आपको जेल भी नहीं भेजेंगे. बस पुलिस को थोड़ी जानकारी दे दो तो पैसा भी मिलता है. लेकिन आप उन दोनों छोटे लड़कों को देख रहे हैं?’’ उसने पास ही एक और आग जला कर बैठे लोगों की ओर इशारा किया.

मुझे उनके चेहरे दिखाई नहीं दे रहे थे क्योंकि वे हमसे दूर थे.

सतीश ने बताया, ‘‘वे दोनों गिरफ्तार होकर जेल गए. उन्हें बहुत यंत्राणा भी दी गईं लेकिन उन्होंने भूल से भी मेरा नाम अपनी जुबान पर न आने दिया. उस पूछताछ के दौरान उनमें से एक कॉमरेड मारा भी गया, लेकिन उसने मुंह नहीं खोला. मेरे जैसे नेताओं को अक्सर ऐसे अनुभव होते हैं. लोग हम पर विश्वास करते हैं. वे इस आंदोलन को अपनी जान पर खेल कर चलता रखना चाहते हैं. ये दोनों लड़के जेल से छूटते ही पार्टी के पास आ गए. इससे मुझे ऊर्जा मिलती है.’’

मैं जल्दी सो जाना चाहता था कि आराम कर के सुबह उठ पाऊं, लेकिन मन में इतने प्रश्न थे. क्या यह युद्ध भी भविष्य में छोटे-छोटे समूहों की अर्थ निर्देशित लड़ाई ही बन कर रह जाएगा? क्या वेंकिटेश जैसे नवयुवक वह कठोर अनुशासन बना कर रख पाएंगे जो कि पुराने आंदोलन का आधार रहा? क्या यह आदिवासी नेतृत्व आंदोलन को किसी अर्थपूर्ण लक्ष्य तक पहुंचा पाएगा?

मैं देख रहा था कि न वासु न वेंकिटेश को किसी बाहरी मदद के आने की आशा थी. वे न्याय के लिए ग्रामीण स्तर की सरकार से ही आशा रखते थे. उन्हें वर्ग भेद की बड़ी सही समझ है.और पुलिस स्टेशन में चलता बिजली का कनेक्शन जो उनकी झोंपड़ी तक नहीं आता, इस भेद से उनका ध्यान हटने नहीं देता. वे मात्रा सैद्धांतिक चर्चा नहीं कर रहे. संसाधनों को नियंत्रित करने वाली इस व्यवस्था में सलवा जुडूम पर रोक लगाने का जो तरीका उन्होंने अपनाया वह व्यवस्था के अनुरूप तो नहीं, पर उन्होंने सलवा जुडूम को रोक दिया.

पास के गांव से नाचने गाने की आवाज़ें सुबह साढ़े तीन बजे तक आती रहीं, और मैं सोचता रहा कि कितने दिन तक ये पारंपरिक गीत नई सभ्यता के हमले में जीवित रह पाएंगे.

सुबह चार बजे मैं सड़क पकड़ने निकला, जहां से मुझे बस लेनी थी. सीट मिली तो चैन से सो गया. अचानक ब्रेक के झटके से नींद खुली तो पता चला कि ड्राइवर को लाल झंडा दिखाई दिया था. उतर कर उसने पेड़ पर चिपका पोस्टर देखा और वापस जाने का निर्णय लिया क्योंकि माओवादियों ने हड़ताल घोषित की थी. क्या बताता कि वे पोस्टर झूठे हैं. अगर हड़ताल माओवादियों ने घोषित की होती तो क्या वे मुझे बस में बिठाते? लेकिन किसी को यह भी नहीं कह सकता था कि मैं वहीं से आ रहा था. वहीं बियाबान में हमें छोड़ कर बस वापस चली गई.

Image caption पिछले एक दशक में बस्तर में बड़ी संख्या में आदिवासी मारे गए हैं

भीड़ में से किसी के सुझाव के अनुसार मैं पैदल अगले पुलिस स्टेशन पहुंचा, जहां अधिकारियों ने पोस्टर की सच्चाई पता लगाने के लिए किसी को भेजने से इन्कार कर दिया, उन्हें डर था कि यह कोई चाल होगी. बस वे सैटलाईट फोन पर उच्च अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश करते रहे. सड़क पर ट्रैफिक पूरे दिन के लिए रुक गया.

टीवीएस फिफ्टी पर एक बूढ़े आदमी को लिफ्ट के लिए पैसे का लालच देते हुए मुझे जल्दी ही आभास हुआ कि मैं फिर भारत पहुंच गया था. वह चालीस किलोमीटर दूर के कस्बे तक मुझे छोड़ने के लिए राजी हो गया. लेकिन अस्सी के दशक की गाड़ी इस्तेमाल तो की जा रही हैं, पर चलती नहीं, यह तब समझ आया जब आधे रास्ते में उसकी गाड़ी रुक गई. पैसे का उपयोग भी इस इलाके में सीमित ही है.

आखिरकार मैं पैदल ही हेमलकसा पहुंचा जो अबूझमाड़ के दूसरे सिरे पर है. यहां बाबा आमटे के बेटे डॉक्टर प्रकाश आमटे एक स्कूल और अस्पताल चलाते हैं. डॉक्टर आमटे नहीं थे तो मैं उनके सहयोगी विलास मनोहर से मिला. विलास जी इस क्षेत्र में डॉक्टर आमटे के आगमन के एक साल बाद 1975 में आए और यहीं रह गए. उनसे नक्सल समस्या के हल पर चर्चा तो होनी ही थी.

‘‘हमसे कौन पूछेगा, आप नेताओं से पूछिए, वे तो सर्वज्ञ हैं!’’ उनका कुछ तल्ख़ जवाब था.

तो मैंने अपना प्रश्न दूसरी तरह से पूछा क्यों आदिवासी नक्सलियों का समर्थन करते हैं?

विलास जी का जवाब भी एक प्रश्न ही था ‘‘क्यों न करें? अगर मैं उनकी जगह होता तो मैं भी यही करता. आखिर उन्हें सरकार से क्या मिला? इस क्षेत्र में कोई भी सकारात्मक बदलाव नक्सली दबाव के कारण ही हुआ है. जब हम यहां आए थे तेंदू पत्ते के एक बंडल की कीमत तीन रुपए थी. इस साल उनके कारण यह 154 रुपए तक हुई. लेकिन गैर नक्सली क्षेत्रा में मिर्च का भाव छः रुपए किलो से केवल 60 रुपए किलो तक बढ़ा. 35 वर्षों में किसान की कमाई में तो केवल 10 गुना ही बढ़ोतरी हुई. सड़क, बिजली, स्कूल सब केवल माओवादियों के कारण ही यहां आए."

‘‘मैं यह नहीं कहता कि विकास हुआ ही नहीं. आदिवासियों की आर्थिक क्षमता बढ़ी है, मजदूरी भी बढ़ी है, और पहले से कहीं अधिक शालाएं खुली हैं. लेकिन नक्सलियों का इस विकास में 40 प्रतिशत योगदान है. सरकार का भी उतना ही, और बाकी का 20 प्रतिशत आदिवासियों की चेतना में विस्तार का परिणाम है. जब सरकार का योगदान बढ़ेगा तो उनका लोगों पर नियंत्रण भी बढ़ेगा.’’

‘‘आपके अनुसार आपके जैसे काम का क्या योगदान है?’’

‘‘हम बहुत छोटे हैं और हम बहुत छोटे से इलाके में काम करते हैं.’’

मुझे नहीं लगा कि उनकी विनम्रता में कोई आडंबर था.

हमारे स्कूल से पांच डॉक्टर निकले. पहला आदिवासी डॉक्टर कन्ना मडावी यहीं से प्रशिक्षित हुआ. लेकिन उसने यहीं अहिरी में बड़ा सा प्राइवेट हस्पताल खोला है, हालांकि वह खुद सरकारी कर्मचारी है. अब वह भी शोषण करने वालों का हिस्सा बन गया है. कुछ समय पहले सोनू मिलने आए थे. उन्होंने मुझसे यही पूछा कि आखिर हमने क्या पाया, ‘आखिर में डॉक्टर कन्ना भी तो इसी व्यवस्था का हिस्सा बन गए, और आदिवासियों का शोषण करने में क्या कमी छोड़ी?’ मुझे उनकी बात में दम लगा. हमने 40 शिक्षक तैयार लिए तो 40 पुलिसकर्मी भी. हमारे चार विद्यार्थी माओवादी बन गए, दो मारे गए, दो जीवित हैं.’’

फिर उन्होंने कहानी सुनाई. ‘‘जुरू वड्डे और पांडू हमारे स्कूल में एक ही कक्षा में पढ़ते थे, और वे रिश्तेदार भी थे. एक पुलिस बना और एक माओवादी. पहले पांडू ने जुरु को एक एनकाउंटर में मार डाला. फिर उसी साल एक ज़मीनी सुरंग के फटने से पांडू माओवादियों का शिकार हुआ. जुरु की बेटी माओवादियों के साथ हो ली और मारी गई. उसका बेटा दूसरे तरह के शिकारियों के हाथ लग गया, वह क्रिश्चियन पादरी बन गया.’’

विलास जी ने अपने आश्रम पर नक्सलियों के आने जाने की बात खुल कर की, और मुझसे पूछा कि मैं किनसे मिला. ‘‘वे तो अच्छे लोग लगते हैं. उनके बारे में प्रेस में छपने वाली खबरों पर विश्वास करना मुश्किल होता है.’’ सोनू के विषय पर हमारा मतैक्य था, कि वे अगले जनरल सेक्रेटरी हो सकते हैं.

मैंने उनसे पूछा कि लोग माओवादियों को सच में पसंद करते हैं या डर से उनका साथ देते हैं.

विलास जी ने पलट कर प्रश्न किया, ‘‘आप ने अबूझमाड़ की इतनी लंबी यात्रा की, आपको क्या दिखा?’’

मैंने उन्हें सड़क के किनारे के गांव में अपने स्वागत की कहानी बताई जहां माओवादियों ने मुझे छोड़ा था. लोग हमारे लिए पराठे, चिकन और दूध लाए. डर से कोई आपको खाना खिला सकता है, लेकिन भोज तो नहीं देगा. मैंने इतना बढ़िया भुट्टा तो पहले खाया ही नहीं.

Image caption बस्तर को इस समय नक्सलियों को सबसे मज़बूत गढ़ माना जाता है

विलास जी को मेरा उत्तर अच्छा लगा. ‘‘बिलकुल ठीक! आप एकदम सही समझे.’’

‘‘मैं जानता हूं कि आप जैसे सामाजिक कार्यकर्ता की राय कोई नहीं जानना चाहता, फिर भी, आपने पूरी जिंदगी आदिवासियों के साथ काम किया. इस समस्या का क्या हल हो सकता है?’’

‘‘शिक्षा’’ वे बोले, ‘‘उन्हें शिक्षा दीजिए. आधुनिक शिक्षा आपको कायर, स्वार्थी और लालची बना देती है. अगर सरकार आदिवासियों को शिक्षा दे तो समस्या हल हो सकती है.’’

मैं जंगल में इकट्ठा किए गए माओवादी लिटरेचर के साथ पकड़े जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता था. वासु का अपने बच्चों के लिए लिखा पत्र भी मैंने जला दिया. शायद वह पहले से ही जानता था कि मैं ऐसा करूंगा, क्योंकि उसने मुझसे कहा, ‘‘उनके माथे पर मेरा चुंबन देना, और मेरी ओर से उन्हें गले लगाना.’’ चे ने कहीं कहा है कि क्रांतिकारी सबसे बड़ा प्रेमी है. मैंने वासु में वही प्रेम देखा. उस क्षण मुझे लगा कि वह भावुक है और उसे विश्वास है कि वह जो भी कर रहा है, उसमें लोगों की भलाई है.

वासु की राजनीति लोगों ही हत्या करवाती है, यह मुझे ठीक नहीं लगता. लेकिन उसके पास अपने पक्ष के समर्थन में तथ्य हैं. उसका कहना है कि मुख्यधारा की राजनीति में इससे अधिक लोग मारे जाते हैं, बस यह बहुत धीरे और बहुत पीड़ादायक प्रक्रिया होती है. सभ्य समाज उसे आतंकवादी कहता है, लेकिन मेरी नज़र में वह सफल राजनेता है. और मैंने अपने काम के संदर्भ में बहुत राजनेता देखे. अन्य माओवादी नेताओं के विषय में मेरी राय अलग है.

मैं नहीं जानता कि वासु कभी माओवादी पार्टी का प्रमुख बनेगा, या कि वह अपने बच्चों के साथ साधारण जीवन जी पाएगा. मुझे नहीं पता कि यह जंगल छोड़ने के बाद वह किसी नए इलाके में जाएगा जैसे कि अन्य प्रोफेशनल क्रांतिकारी मंच बदलते रहे हैं, बंगाल से बिहार, आंध्र से छत्तीसगढ़, तो क्या उनका अगला गंतव्य उड़ीसा है?

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उसका नाम वासु नहीं

लेखक: शुभ्रांशु चौधरी

प्रकाशक: पेंगुइन इंडिया

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