अफजल की फांसी का कश्मीर पर क्या होगा असर?

अफजल
Image caption कई लोगों ने अफजल गुरू को फांसी दिए जाने की निंदा की है

वर्ष 2001 में संसद पर हुए हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी के बाद सवाल ये है कि सरकार के इस कदम का असर कश्मीर पर क्या होगा?

चार अगस्त 2005 को उच्चतम न्यायालय में पी वेंकटराम रेड्डी और पीपी नाओलेकर की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा था कि संसद पर हमले ने देश को हिलाकर रख दिया है और समाज के सामूहिक विवेक को उसी वक्त संतुष्ट किया जा सकता है जब अपराधी को फांसी की सजा दी जाए.

कश्मीर और कश्मीर के बाहर भी कई हलकों में फांसी के लिए न्यायालय के दिए गए इस कारण की काफी आलोचना हुई है लेकिन दूसरी सोच ये भी थी कि इस फैसले के चुनिंदा पक्षों को उठाकर एक सोच बनाना गलत होगा और फैसले के हर पहलू को देखा जाना चाहिए.

अफजल को लेकर कई लोगों की सोच ये रही कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ और उन्हें फांसी परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर दी गई ना कि मजबूत सुबूतों के आधार पर.

कई हलकों में सोच है कि अफजल गुरू को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया, उन्हें उचित मौकों पर कथित तौर पर वकील मुहैला नहीं कराया गया और पूरे मामले में कई बातें गुप्त रखी गईं जिन्हें छिपाकर रखा गया, जैसे कि अफजल गुरू कथित तौर पर जम्मू-कश्मीर पुलिस के विशेष टास्क फोर्स के साथ ही काम करते थे. साथ ही ये भी आरोप है कि उनके खिलाफ मिले दिल्ली पुलिस की आतंक-विरोधी शाखा स्पेशल सेल ने जो सुबूत पेश किए वो बेहद ढीलेढाले थे.

इन सभी कारणों से आलोचक कह रहे हैं कि अफजल को फांसी दिए जाने से कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों में प्रतिकूल संदेश जाएगा. हालाँकि रेखा के दूसरी तरफ बैठे विशेषज्ञ इन सभी आरोपों को बकवास करार देते हैं और इसे लोगों को उकसाने की कार्रवाई करार देते हैं.

करीब डेढ़ साल पहले भारत सरकार की तरफ़ से नियुक्त किए गए वार्ताकारों ने जम्मू-कश्मीर पर एक रिपोर्ट सरकार को पेश की थी. राधा कुमार उन वार्ताकारों में से एक थीं.

नकारात्मक असर

राधा कुमार के मुताबिक अफजल को फांसी नहीं दी जानी चाहिए थी. उनका मानना है कि फांसी के दूरगामी परिणाम भले ही चाहे कुछ भी हों लेकिन फिलहाल इसका असर नकारात्मक ही होगा.

कश्मीर से जुड़े रहे एक दूसरे वार्ताकार ने बीबीसी से कहा कि उन्हें सरकार के कदम से निराशा हुई है और फांसी जिए जाने के कारण हुर्रियत के विभिन्न धड़े एक दूसरे के नजदीक आ सकते हैं.

उन्होंने कहा, “इस कदम से मुझे निराशा हुई है. राष्ट्रीय पार्टियाँ भी इस कदम से खुश नहीं हैं. हमारी कोशिशें बेकार साबित हुई हैं. कश्मीर कुछ और समय के लिए हमारे लिए समस्या बना रहेगा.”

लेकिन रक्षा मामलों के जानकार अजय साहनी कहते हैं कि कानून लागू करते वक्त उसके असर के बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए.

वो कहते हैं, “आप ये नहीं कह सकते हैं कि हम मुजरिम को तभी सजा देंगे जब तक उसका राजनीतिक असर नहीं होगा. कसाब को सजा देते वक्त भी कहा गया था कि इससे हंगामा होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ.”

अजय साहनी मानते हैं कि इस मुद्दे को पाकिस्तान और अलगाववादियों द्वारा भुनाने की कोशिश की जा सकती है लेकिन उसका बहुत ज्यादा असर कश्मीर में नहीं होगा.

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि सरकार के इस कदम के पीछे क्या सोच थी. क्या ये कदम अगले वर्ष होने वाले आम चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया, जैसा कि संसद पर हुए हमले मामले में बरी किए गए प्रोफेसर एसएआर गिलानी का मानना है, या फिर कश्मीर में हिंसा की स्थिति में सुधार के मद्देनजर ये फैसला हुआ?

राधा कुमार के मुताबिक इस फैसले के पीछे चुनावी सोच नहीं हो सकती क्योंकि चुनाव में बहुत समय बाकी है.

सरकार का रुख

Image caption सालों से कई संगठन अफजल गुरू की फांसी की मांग कर रहे थे

श्रीनगर में कश्मीर टाइम्स के संपादक वेद भसीन के मुताबिक सरकार ने शायद ये सोचा हो कि पिछले एक साल से कश्मीर में स्थिति शांतिपूर्ण रही है और लोगों का प्रतिरोध कम हो गया है, लेकिन वो चेतावनी देते हैं कि कश्मीर में स्थिति कभी भी भड़क सकती है.

वेद भसीन मानते हैं कि अफजल को फांसी दिए जाने से आम लोगों में भारत के प्रति विरक्ति बढ़ेगी और जिस तरीक से सरकार मामले से निपट रही है, इसका कश्मीर पर प्रतिकूल असर पड़ेगा.

बीबीसी श्रीनगर संवाददाता रियाज मसरूर बताते हैं कि शनिवार सुबह से सड़कों पर नाकेबंदी थी, घाटी के कई हिस्सों में कर्फ्यू है और केबल टीवी सुबह साढ़े आठ बजे से बंद है.

वेद भसीन के मुताबिक एक तरफ भारत सरकार कहती है कि कश्मीर भारतीय प्रजातंत्र का हिस्सा है और दूसरी तरफ कश्मीर में लोगों को लगता है कि उनके साथ अलग व्यवहार किया जा रहा है और इसका ग़लत असर होगा.

वो मानते हैं कि सरकार का ताजा कदम इस बात का सूचक है कि कश्मीर और पाकिस्तान के प्रति दिल्ली का रुख कड़ा होता जा रहा है.

कई हलकों में इस फांसी की तुलना 1984 में कश्मीरी चरमपंथी मकबूल भट्ट को दी गई फांसी से की जा रही है जिन्हें तिहाड़ जेल में ही फांसी दी गई थी.

मकबूल भट्ट पर एक हवाई जहाज को अगवा करने के अलावा दूसरी चरमपंथी कार्रवाइयों में हिस्सा लेने का आरोप था. मकबूल भट्ट ने उस वक्त के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के समक्ष दया याचिका पेश की थी. भट्ट का कहना था कि उन्हें अदालत में अपनी बात कहने का मौका नहीं मिला. माना जाता है कि इस फांसी के बाद ही कश्मीर में चरमपंथी कार्रवाइयों ने जोर पकड़ा था.

चुनौती

वेद भसीन कहते हैं कि अगर भारत सरकार ने मकबूल भट्ट की फांसी को सही ढंग से संभाला होता तो स्थिति खराब नहीं होती क्योंकि उस वक्त कश्मीर में भारत के खिलाफ प्रतिरोध इतना ज्यादा नहीं था.

उधर प्रोफेसर गिलानी के मुताबिक कानून के मुताबिक सरकार को अफजल गुरू की पत्नी को दया याचिका की नामंजूरी के बारे में जानकारी देनी चाहिए थी क्योंकि दया याचिका की नामंजूरी को अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

वो कहते हैं, “जब राम जेठमलानी ने दिल्ली हाईकोर्ट में जिरह शुरू की थी तो उन्होंने कहा था कि इस केस में कोई सुबूत नहीं है. इस मामले पर राजनीति की जा रही है.”

शनिवार दोपहर को जब प्रोफेसर गिलानी बीबीसी से बात कर रहे थे, उसके थोड़ी ही देर पहले दिल्ली पुलिस मे स्पेशल सेल के सिपाही उन्हें अपने साथ ले जा रहे थे.

गिलानी के मुताबिक उनकी गाड़ी को अधिकारियों ने रोका और अपने साथ उन्हें आतंकवाद विरोधी स्पेशल सेल कार्यालय ले जा रहे थे.

उधर राधा कुमार कहती हैं कि अफजल की फांसी के पीछे राजनीतिक सोच जरूरी होगी और जो लोग मानते हैं कि अफजल गुरू के साथ न्याय नहीं हुआ है, उनके हाथ मजबूत होंगे.

वो कहते हैं, “डेढ़ साल पहले कश्मीर पर दी गई हमारी रिपोर्ट को जितने धक्के मिलने थे वो पहले ही मिल गए थे. मेरे ख्याल में फांसी नहीं होनी चाहिए थी.”

संबंधित समाचार