मेरा कुश्ती में पदक जीतने का सपना टूट गया....

  • 14 फरवरी 2013
Image caption युवा पहलवानों को इस फैसले के बाद अपना भविष्य अधर में दिखाई पड़ रहा है

शाम की ढलती धूप में दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में करीब 100 बच्चे पसीने से नहाए दिख रहे हैं.

कोच रामफल ने पांच मिनट में सैंकड़ों दंड बैठक लगाने का निर्देश दिया है और सभी अपना दम-खम लगा रहे हैं.

कुश्ती बरकरार रहने की उम्मीद:योगेश्वर

सभी की सांस फूल रही है लेकिन चेहरे पर एक दृढ़ संकल्प साफ दिखाई दे रहा है.

ओलंपिक के पदक का सपना आंखों में लिए ये युवा पहलवानी में अपने गुर मांजने की कोशिश में लगे हैं.

लेकिन उनके मनोबल में भारी गिरावट आई है अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति यानि आईओसी की उस सिफारिश से, जिसमें कुश्ती को ओलंपिक खेलों से बाहर करने की बात की गई है.

बुधवार को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने स्विट्ज़रलैंड के लुज़ैन में हुई बैठक में ये फ़ैसला लिया.

ज़ाहिर है कि जिस देश में कुश्ती को गर्व से खेला जाता है, वहां के नौजवानों को ये खबर बिलकुल नागवारा गुज़री.

ओलंपिक का उत्साह नहीं रहेगा

वर्जिश कर रहे कुछ पहलवानों से जब बीबीसी ने बात की तो उन्होंने गहन निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि इस फैसले ने उनके सपनों पर मानो ग्रहण सा लगा दिया है.

अमित ने अपना पसीने पोंछते हुए कहा, “इस फैसले से हमें बहुत निराशा हाथ लगी है. जब मैंने टेलिविज़न पर ये खबर देखी तो मैं चौंक गया था. कुश्ती भारत में सबसे पुराने खेले जाने वाले खेलों में से एक है. बहुत ही दुख की बात है कि अब हम बच्चों का मनोबल बहुत गिर जाएगा.”

लंदन में हुए पिछले ओलंपिक में भारतीय पहलवानों ने अच्छा प्रदर्शन किया था. भारत की ओर से सुशील कुमार और योगेश्वर दत्त ने दो पदक जीते थे.

इनकी जीत से प्रोत्साहित होकर भारत के गांवों से बहुत से बच्चों ने कुश्ती को अपने जीवन भर के खेल के रूप में अपनाया.

लेकिन अब इस फैसले से गुस्साए युवा पहलवान सुमित ने कहा, “ओलंपिक खेलों का महाकुंभ होता है और अगर कुश्ती ओलंपिक में नहीं रहेगी तो हमारा उत्साह भी अब वैसा नहीं रहेगा. अब शायद उतनी मेहनत करने का मन नहीं करेगा. सुशील और योगेश्वर ने हमें एक नई दिशा दी लेकिन अब पता नहीं क्या करेंगें?”

जब उनसे पूछा गया कि एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों के लिए क्या उनके बीच उतना उत्साह नहीं है, तो उन्होंने उस खिलाड़ी की तरह प्रतिक्रिया दी जिसे स्वर्ण पदक न मिले, तो उसे रजत पदक से संतुष्ट रहना पड़ता है.

एक युवा पहलवान दीपक ने कहा, “अब क्या करेंगें? यही कि एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों पर अपना ध्यान लगाएं. लेकिन सबसे बड़ा सपना तो ओलंपिक ही था और ओलंपिक ही रहेगा. ओलंपिक समिति ने न जाने ऐसा सुझाव क्यों दिया.”

दीपक की हां में हां मिलाते हुए सुमित ने कहा, “मैं नौ साल से यहां प्रेक्टिस कर रहा हूं. इतने सालों की मेहनत के बाद अगर इस वक्त मैं कोई और खेल चुनता हूं, तो उसके गुर सीखने में फिर से सालों लग जाएंगें. इस मोड़ पर ऐसे फैसले भी नहीं लिए जा सकते. अब यही खेल खेलना है और इस उम्मीद के साथ की एशियाई और राष्ट्रमंडल खेलों में कुछ पदक मिल जाएं.”

इस बीच ओलंपिक चैंपियन पहलवान सुशील कुमार ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति का ये फैसला कुश्ती के लिए एक काला साया साबित होगा.

बहरहाल इन सभी पहलवानों की नज़र सितंबर पर होने वाली आईओसी बैठक पर टिकी हैं जिसमें इस बाबत अंतिम फैसला लिया जाएगा. इन्हें उम्मीद है कि कोई चमत्कार हो और ये फैसला किसी तरह पलट जाए.

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