ओलांड की यात्रा के बीच जैतापुर से विरोध के स्वर

विरोध
Image caption जैतापुर परमाणु संयंत्र को लेकर अब राजनीति भी शुरु हो गई है.

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांड की भारत यात्रा के दौरान महराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में स्थित जैतापुर के किसान वहां दोनों देशों के बीच परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने पर हुई सहमति को खत्म करने की मांग कर रहे हैं.

ओलांड दो दिन की यात्रा पर भारत आए हुए हैं.

दिसंबर 2010 में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सारकोजी भारत आए थे. वो उस अवसर पर जैतापुर परमाणु संयंत्र के निर्माण के लिए 10 अरब डॉलर का सौदा करके ख़ुशी-ख़ुशी वापस अपने देश लौटे थे.

लेकिन इस बार नए राष्ट्रपति फ्रांसवा ओलांड को जैतापुर के किसानों का पैगाम है कि वो इस समझौते को वापस लें. इस परमाणु बिजली घर का विरोध करने के लिए जैतापुर के किसान दो सालों से आंदोलन चला रहे हैं.

इस आंदोलन में शामिल किसानों के एक नेता सत्यजीत चौहान कहते हैं, "मैं फ्रांस के राष्ट्रपति से कहना चाहता हूँ कि आप अपने देश में परमाणु ऊर्जा प्लांट बंद कर रहे हैं लेकिन आप यहां क्यों खोल रहे हैं. आप को भारत सरकार के साथ किया हुआ समझौता वापस ले लेना चाहिए."

बिजली

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र पूरी तरह से तैयार होने के बाद लगभग 10,000 मेगावाट बिजली पैदा करेगा.

भारत की प्रगतिशील अर्थव्यवस्था को ऊर्जा और बिजली की बेहद ज़रूरत है. 2010 में हुए समझौते के अंतर्गत फ्रांस की कंपनी अरीवा को जैतापुर में दो रिएक्टर के निर्माण का ठेका मिला है जिसकी लागत 10 अरब डॉलर के करीब है.

जैतापुर में कुल छह रिएक्टर लगाए जाने हैं. फ्रांस के राष्ट्रपति प्रयास कर रहे हैं कि बाक़ी चार के लिए भी ठेका अरीवा को मिले. लेकिन जैतापुर के किसानों का कहना है कि वो इसका कडा विरोध करेंगे.

सत्यजीत चौहन के अनुसार अरीवा कंपनी घाटे में चल रही है. उनका कहना है, "मैं फ्रांस के राष्ट्रपति को बताना चाहता हूँ कि जैतापुर में बिजली घर लगाने में उन्हें काफी घाटा होगा क्योंकि हम वहां अरीवा को इसका निर्माण कभी नहीं करने देंगे."

किसान कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर्यावरण के लिए हानिकारक है और इससे उनके गांव में प्रदूषण फैलने का खतरा है. सरकार कहती है पूरी जांच पड़ताल के बाद जैतापुर को चुना गया है. इस परियोजना के लिए सरकार ने 2010 में जैतापुर और इसके आस पास के गांव के किसानों की ज़मीने हासिल कर ली थीं.

इस बीच ओलांड और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में हुई बातचीत के दौरान दोनों देशों के बीच कम दूरी की जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल के 600 करोड़ डॉलर के समझौते पर सहमति बन गई है.

दोनों देशों के प्रतिनिधियों ने बातचीत के बाद कहा कि कई द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई, जिनमें क्षेत्रीय, रक्षा, परमाणु ऊर्जा सहयोग, आतंकवाद निरोध और माली जैसे विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई.

विरोध

लेकिन 2100 से अधिक किसानों में से केवल 33 किसानों ने मुआवजा स्वीकार किया है.

दिलचस्प बात ये है कि फ्रांस के राष्ट्रपति के दौरे से तीन दिन पहले महाराष्ट्र सरकार ने किसानो को उनकी ज़मीन के बदले मुआवज़े की रक़म बढ़ा दी। मगर सत्यजीत चौहान कहते हैं किसानों को मुआवजों में कोई दिलचस्पी नहीं। "सवाल मुआवजों का नहीं है. सवाल है पर्यावरण का."

किसान कहते हैं कि सवाल पूर्वजों की ज़मीनों का भी है.

जैतापुर के नज़दीक मधबन गांव के एक किसान प्रवीण ने कहा, "हम यहां सदियों से रहते चले आ रहे हैं. हजारों मछुआरे अरब महासागर की मछलियां बेच कर गुज़र बसर कर रहे हैं. हम सदियों से यहां खेती कर रहे हैं. सरकार समझ नहीं रही है. हमें पैसा नहीं चाहिए. ये हमारे पूर्वजों की ज़मीने हैं. हम अपने घरों से, अपनी ज़मीनों से नहीं निकलेंगे."

ये मुद्दा अब राजनीतिक हो गया है. किसानों के समर्थन में शिव सेना और सीपीएम जैसी पार्टियां मैदान में कूद गई हैं. लेकिन सरकार से इस तरह के संकेत साफ़ तौर पर मिल रहे हैं कि जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र देर से सही पर बनाया ज़रूर जाएगा.

संबंधित समाचार