पीढ़ियों का पिंडदान कर बनीं नागा संन्यासिन

Image caption गुरुवार को 200 महिलाएं अपना पिंडदान कर नागा साधु बन गईं.

प्रयाग के महाकुंभ में नागा संन्यासियों के अदभुत और रहस्यमय संसार को तो लोगों ने क़रीब से देखा, लेकिन एक मौका ऐसा भी आया जब 200 से अधिक महिलाओं को लोगों ने नागा संन्यास धारण करते हुए देखा.

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जूना अखाड़े से जुड़ी इन संन्यासी महिलाओं ने अपने केशों का त्याग और अपना पिंड दान करके अद्भुत नागाओं के संसार से खुद को जोड़ लिया.

खुद को मृत घोषित करते हुए अपना पिंड दान करने वाली ये नागा संन्यासी महिलाएं वसंत पंचमी के अंतिम शाही स्नान में जूना अखाड़े के साथ विधिवत भाग ले रही हैं.

संगम में चल रहे दुनिया के इस सबसे बड़े धार्मिक आयोजन में गुरुवार को इन नई संन्यासिनों का पहला चरण पूरा हुआ.

पीढ़ियों का पिंडदान

Image caption ये संन्यासिनें नागा ज़रूर हैं लेकिन इन्हें वस्त्र का परित्याग करने की इजाज़त नहीं.

इन नागा संन्यासिनों ने त्रिवेणी के किनारे हवन-पूजन के साथ अपना और अपनी इक्कीस पीढ़ियों का पिंड दान करके इस संसार से अपने को अलग कर लिया.

कैसी दिखती है ऊपर से कुंभ नगरी

त्रिवेणी के किनारे इन अनुष्ठानों को पूरा करने के बाद इन सभी महिला संन्यासिनों ने अखाड़े की धर्मध्वजा के नीचे पूरी रात ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप किया.

उसके बाद भोर में चार बजे बजे जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज ने सभी को कान में गुरुमंत्र के अलावा संन्यास की दीक्षा प्रदान की और विजय संस्कार संपन्न किया.

अखाड़े से जुड़ी महिला संन्यासिनें भगवान दत्तात्रेय की मां अनूसुइया को अपनी आराध्य देवी मानकर उनकी पूजा करती हैं.

ये नागा संन्यासिनें अब अखाड़े की जमात में विधिवत शामिल हो गई हैं.

लेकिन अखाड़े इन को पूरी तरह से नग्न रहने की इजाजत नहीं देते, इसलिए ज्यादातर महिला संन्यासी केवल एक गेरुआ वस्त्र पहनती हैं.

आस्था भी नहीं धंधा भी है कुंभ

ऐसा माना जाता है कि महिलाओं का नग्न रहना भारतीय संस्कृति का खुला उल्लंघन है.

इस बार के महाकुंभ में महिला संन्यासियों को अखाड़ों ने खासा महत्त्व दिया है.

इन महिला संन्यासियों ने अपनी धर्म ध्वजा स्थापित की है और माई बाडे की जगह उनका नाम भी बदल कर संन्यासिनी अखाड़े में परिवर्तित कर दिया गया है.

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