सरकारी योजना पर अमर्त्य सेन ने उठाए सवाल

  • 16 फरवरी 2013
अमर्त्य सेन
Image caption अमर्त्य सेन ने अर्थशास्त्र और विकास से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन किया है.

राशन की जगह पैसे देने की सरकार की योजना पर सवाल उठाते हुए नोबल पुरस्कार से नवाज़े गए विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा है कि ये आसान तो होगा पर ग़रीबों के पोषण के हित में नहीं.

राजधानी दिल्ली में आईआईटी के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “पैसे को खाने पर खर्च किया जाए या अन्य कामों के लिए इस पर नियंत्रण रखना मुश्किल है, लेकिन भोजन आएगा तो परिवार के पोषण में ही इस्तेमाल होगा.”

साथ ही उन्होंने बताया कि दुनियाभर में किए कई शोध के मुताबिक परिवार में पैसे के इस्तेमाल की ज़िम्मेदारी और आज़ादी अगर महिलाओं को दी जाए तो वो पैसों को परिवार के पालन-पोषण पर ही खर्च करेंगी, लेकिन सरकार की स्कीम में ये सुनियोजित नहीं किया जा सकता कि घर में पहुंच रहे पैसे किसके हाथ में जाएंगे. ऐसे में राशन की जगह पैसे देने से परिवार के पोषण पर बुरा असर पड़ सकता है.

हालांकि सेन ने ये भी कहा कि पैसे देने की योजना अगर सही तरीके से लागू की जाए तो इससे राशन के वितरण में होने वाले भ्रष्टाचार की समस्या से कुछ हद तक निपटा जा सकेगा.

यूपीए सरकार ने इस वर्ष जनवरी में जनवितरण प्रणाली के तहत दिए जाने वाले राशन की जगह धन राशि देने की योजना को, छह राज्यों और तीन केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू की.

खाद्य सुरक्षा विधेयक

सरकार इस योजना को खाद्य सुरक्षा विधेयक का हिस्सा भी बनाना चाहती है.

हालांकि गुरूवार को राज्य सरकारों के साथ विधेयक पर हुई चर्चा में कई सरकारों ने इस योजना पर अपनी शंकाएं ज़ाहिर की.

खाद्य सुरक्षा विधेयक को दिसंबर 2011 में लोकसभा में पेश किया गया था, जिसके बाद इसे स्टैंडिंग कमिटी के पास विचार के लिए भेज दिया गया.

इससे पहले कई स्वंयसेवी संस्थाओं ने भी राशन की जगह धन राशि दिए जाने का विरोध किया है.

सरकार पर दबाव बनने के बाद जनवरी में लागू की गई योजना को 16 राज्यों की जगह छह राज्यों में ही लागू किया गया.

यूपीए सरकार ने राशन की जगह धन राशि दिए जाने की योजना को ‘गेम-चेन्जर’ कहा था और संभावना है कि संसद के बजट सत्र में खाद्य सुरक्षा विधेयक को पेश किया जाए.

संबंधित समाचार