क्यों आई है अचानक फांसी के फैसलों पर तेज़ी?

  • 15 फरवरी 2013
फांसी
पहले अजमल कसाब और फिर अफज़ल गुरु दोनो को फांसी दी गई है

पहले अजमल कसाब और फिर अफज़ल गुरु. तीन महीनों में दो फांसी. खबरों की माने तो कुछ और लोगों को भी फांसी जल्दी दी जा सकती है.

फांसी को लेकर अचानक भारत सरकार के इतनी जल्दी कदम उठाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं.

खास तौर पर इसलिए कि नवंबर के महीने में जब कसाब को फांसी दी गई तो वो आठ सालों में दी जाने वाली पहली फांसी थी. इसके बाद पिछले सप्ताह अफज़ल को भी फांसी दे दी गई.

कई अटकलें लगाई जा रही हैं. क्या सरकार 2014 में होने वाले लोक सभा चुनाव को देखते हुए यह कर रही है? या फिर इसके पीछे कोई और राजनीति है? क्या सरकार अपनी नरम छवि को बदलने का प्रयास कर रही है.

या फिर इसका कारण केवल यह है कि किसी भी फांसी के मामले में अहम भूमिका निभाने वाले राष्ट्रपति और गृह मंत्री दोनो ही नए हैं जिन्होंने पिछले साल जुलाई में ही अपना पद संभाला है.

नए राष्ट्रपति, नए गृह मंत्री

प्रणब मुखर्जी ने जुलाई 2012 में अपना कार्यभार संभाला था जबकि उसी महीने में ही सुशील कुमार शिंदे ने भी अपना पद संभाला था. मुखर्जी के बारे में कहा जाता है कि वो फैसला लेने में देरी नहीं करते.

इस मामले पर करीबी नज़र रखने वाले इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार प्रणब ढल सामंता का मानना है, ''फाँसी दिए जाने वाले लोगों की सूची लंबी होती जा रही थी. इसलिए इसके पीछे राजनीतिक कारण होने ही थे. वैसे ही किसी की फांसी का फैसला न होने के पीछे भी राजनीतिक कारण था. प्रतिभा पाटिल ने अपने कार्यकाल में दो ही दया याचिकाओं को ठुकराया था.''

वे कहते हैं, ''कांग्रेस सरकार के बारे में कहा जा रहा था कि वो एक नरम छवि वाली सरकार है और कड़े फैसले लेने से कतराती है खास तौर पर चरमपंथ के मुद्दे पर. इसका विपक्ष फायदा उठा रही थी. इसलिए यह अपनी छवि को बदलने की कोशिश हो सकती है.''

हालांकि उनका कहना है कि वे इसे 2014 के चुनाव से इसलिए जोड़कर नहीं देखते क्योंकि उसमें अभी काफी समय रहता है. ''मुझे यह भी लगता है कि किसी एक व्यक्ति की वजह से यह फैसले नहीं लिए गए, बल्कि कांग्रेस की सोच में परिवर्तन आया है.''

कौन लेता है फैसला?

गृह मंत्रालय के एक अधिकारी बताते हैं कि फांसी के फैसले के पीछे मंत्रिमंडल, गृह मंत्रालय और राष्ट्रपति सभी शामिल होते हैं.

वे कहते हैं, ''हर दया याचिका पर गृह मंत्रालय कागज़ी कार्यवाही करता है. फिर मंत्रिमंडल की सलाह पर मंत्रालय की राय राष्ट्रपति को भेजी जाती है जो इस पर अंतिम फैसला लेते हैं.''

फांसी की मामले में तेज़ी का कारण कोई भी या कुछ भी रहा हो, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी काफी आलोचना हो रही है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी इसकी आलोचना करते हुए कहा है, ''भारत में मौत की सज़ा को दोबारा शुरू करने वाला यह कदम चिंताजनक है और पीछे कदम बढ़ाने वाला है.''

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