अफजल के बाद उमर अब्दुल्लाह की चुनौतियाँ

अफ़ज़ल गुरू कब्र
Image caption श्रीनगर में अफ़ज़ल गुरू की कब्र तैयार की गई है, और उन्हें शहीद बुलाया गया है.

नौ फ़रवरी को संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू को फांसी दिए जाने के बाद से भारत प्रशासित कश्मीर में ज़बरदस्त तनाव का माहौल है.

फांसी की ख़बर के आम होते ही कश्मीर के पृथकतावादी नेताओं को नज़रबंद कर दिया गया था. घाटी के काफी हिस्सों में लगातार कर्फ्यू जारी है.

हुकूमत ने शुक्रवार को किसी भी गड़बड़ी की आशंका को ध्यान में रखते हुए सख़्ती और कड़ी कर दी थी. ख़बरें थीं कि लगभग 200 लोगों को गिरफ़्तार किया गया है.

एक टेलीविजन चैनल को दिए साक्षात्कार में राज्य के मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्लाह ने क़बूल किया कि आम लोगों में अफ़ज़ल गुरू की फांसी को लेकर बहुत नाराज़गी है, और उनमें अलगाववाद की भावना गहरी हो गई है.

इस स्थिति में उमर अब्दुल्लाह को हालात में बेहतरी के लिए कौन से क़दम उठाने होंगे?

सख़्ती और कर्फ़्यू को ख़त्म करना होगा

Image caption अफ़ज़ल गुरू की फांसी के बाद कश्मीर और कई जगहों पर प्रदर्शन भी हुए हैं.

नागरिकों को लंबे समय तक दबाकर रखा जाना संभव नहीं है. आप कब तक उनकी सामान्य ज़िंदगी पर रोक लगाकर रखेंगे? इसलिए क़र्फ्यू और लोगों की आवाजाही पर लगी रोक को जल्द से जल्द ख़त्म करने की ज़रूरत है.

हो सकता है कि क़र्फ़्यू हटाए जाने के बाद, प्रदर्शनों और राज्य में हड़तालों का सिलसिला शुरू हो. लेकिन इससे होशियारी से निबटना होगा. उस तरह से नहीं जैसा कि साल 2010 में किया गया था, जिसके बाद हालात और भी ख़राब हो गए थे.

लेकिन इससे लोगों में जो ग़म और ग़ुस्सा है उसे बाहर आने का मौक़ा मिलेगा, और अगर क़ानून व्यवस्था का संचालन ठीक तरीक़े से किया गया तो ये ग़ुस्सा धीरे-धीरे कम हो जाएगा.

भविष्य के लिए भी इस तरह के हालात बन सकते हैं जब बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो सकती है.

अफ़ज़ल गुरू के शव को वापस करना होगा

अफ़ज़ल गुरू के मामले में लोगों को लगता है कि उनके साथ इंसाफ़ नहीं हुआ, ये बात उनके दिल में घर कर गई है कि हर मामले में कश्मीरियों के साथ अन्याय होता है, मुल्क के दूसरे लोगों के मामले में भारत सरकार का रवैया अलग है और उनके मामले में अलग.

मांग ये उठ रही है कि उनके शव को उनके परिवार को वापस दिया जाए, और वो इसे अपने धार्मिक तरीक़े से दफ़न करें.

भारत सरकार को उनके शव को परिवार को देना होगा.

हालांकि ये मानना होगा कि हालात बहुत विकट से हैं, जब इस बात का भी डर है कि कहीं उनके जनाज़े का राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश न की जाए.

लेकिन अगर लोगों में नाइंसाफ़ी और अलगाववाद की स्थिति को कम करना है तो इसके अलावा कोई और रास्ता नहीं है.

बातचीत की प्रक्रिया शुरू करनी होगी

जब हालात थोड़े बेहतर हो जाएं तो बातचीत की प्रक्रिया शुरू करनी होगी. पृथकतावादी नेताओं को इसमें साथ लेना होगा, और उनके जितने धड़े हैं सभी को साथ लेकर चलना होगा.

लेकिन न सिर्फ़ कश्मीर बल्कि पाकिस्तान के साथ भी जो बातचीत का सिलसिला है, उसमें भारत सरकार सख़्त रवैया अपना रही है.

मगर समझने की ज़रूरत है कि हालात जहां तक बेहतर हुए हैं उन्हें जारी रखने की ज़रूरत है, उसमें रूकावट लाने से कोई फ़ायदा नहीं होगा.

फ़िलहाल पाकिस्तान से वार्ता थम तो गई ही है, लेकिन लगता है कि अब वो विपरीत दिशा में जा सकती है.

(कश्मीर मामलों के विश्लेषक वेद भसीन की बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली से बातचीत पर आधारित)

संबंधित समाचार