क्यों पिछड़े हैं भारत के मुसलमान?

नरेंद्र मोदी
Image caption नरेंद्र मोदी को भाजपा में प्रधानमंत्री पद का सबसे प्रबल दावेदार कहा जा रहा है

कुछ समय से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम सुनते ही तैश में आ जाते हैं.

नीतीश कुमार यूं तो भारतीय जनता पार्टी के सहयोगी हैं लेकिन वो संकेत देते रहे हैं कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर उन्हें मोदी पसंद नहीं हैं.

नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाटेड अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल से भाजपा की सबसे अहम सहयोगी रही है.

गोधरा रेलवे स्टेशन के पास 2002 में जब ट्रेन की एक बोगी में 59 कारसेवकों की जल कर मौत हो गई थी, उस वक्त नीतीश कुमार वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री थे.

तब उन्होंने गोधरा की घटना की अलग से जांच करानी भी जरूरी नहीं समझी थी. यही नहीं दंगों के बाद भी वो मंत्रालय में बने रहे और उनकी पार्टी ने कभी मोदी के किरदार या उनकी नीतियों पर कभी कोई ऊंगली नहीं उठाई.

भारत में इसे वोट बैंक की राजनीति कहते हैं.

किसने क्या किया

अब मोदी और नीतीश द्वंद्व का कारण क्या ये है कि एक तरफ भाजपा में मोदी का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रही है और दूसरी तरफ कई पर्यवेक्षकों का अनुमान है कि बिहार में नीतीश कुमार की लोकप्रियता घट रही है?

अब नीतीश को मुसलमानों के वोट की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा है और यही उनकी नाराजगी की वजह तो नहीं?

बदलते हुए हालात में वोट बैंक की उनकी ये राजनीति उन्हें राजनीतिक तौर पर काफी महंगी पड़ सकती है.

Image caption भारत में ज्यादातर पार्टियां मुसमलानों को लुभाती हैं

भारत में सभी राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करती रही हैं.

देश में सबसे धर्मनिरपेक्ष मानी जाने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों के तीस वर्ष के शासनकाल में पश्चिम बंगाल के मुसलमान भारत के सबसे गरीब मुसलमान बन कर उभरे हैं.

वामपंथियों ने मुसलमानों के इलाकों में स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और आधुनिक संस्थान कायम करने के बजाय तीस सालों में सिर्फ़ मदरसों को बढ़ावा दिया.

मुसलमानों के समर्थन में सत्ता में आने वाली ममता बनर्जी मस्जिदों के इमामों को वेतन देने, मदरसों को सहायता मुहैया करने और बांग्ला भाषी राज्य में ऊर्दू पढ़ाए जाने जैसे कदमों को राज्य के करोड़ों मुसलमानों के शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक पिछड़नेपन के खात्मे का आधार बता रही हैं.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने राज्य में मुसलमानों की तमाम समस्याओं को हल करने के लिए चंद सौ ऊर्दू टीचर नियुक्त कर दिए हैं.

ये अलग बात है कि उनके पिता मुलायम सिंह यादव या खुद उन्होंने मुस्लिम इलाकों में शायद ही कोई यूनिवर्सिटी, कॉलेज या स्कूल खोले हों.

मुसलमानों के मसीहा समझे जाने वाले लालू प्रसाद यादव का प्रदर्शन ही इन सभी पार्टियों में सबसे अच्छा रहा है क्योंकि उन्होंने मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि किसी के लिए भी कुछ नहीं किया है.

धार्मिक संगठनों का लेखा जोखा

मुसलमानों के कुछ अपने धार्मिक और स्वनिर्मित किस्म के संगठन हैं जो बीते साठ वर्षों से मुसलमानों की नुमांइदगी का दावा करते रहे हैं.

ये संगठन और संस्थाएं भारत के मुसलमानों की कितनी हमदर्द हैं, इसका अंदाजा सिर्फ इस हकीकत से लगाया जा सकता है कि धार्मिक संस्थाएं कॉलेज और विश्वविद्यालयों में मुसलमानों के शिक्षा ग्रहण करने का ये कह कर विरोध करती हैं कि ये गैर इस्लामी शिक्षा है.

Image caption भारत में शिक्षा और सरकारी नौकरियों को मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या से हिसाब से काफी कम माना जाता है

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड 50 वर्षों में चाहे शादी के लिए एक मॉडल निकाहनामा भी तैयार न कर सका हो लेकिन वो हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपनी राय से जरूर नवाजता है.

पर्सनल लॉ बोर्ड तमाम बच्चों के लिए शिक्षा को बुनियादी अधिकार में शामिल करने, शादी के लिए कम से कम उम्र तय करने और शादी का सरकारी पंजीकरण करने जैसे अहम सरकारी कदमों का धर्म के नाम पर विरोध कर चुका है.

ये इन छद्म राजनीतिक पार्टियों का प्रदर्शन हैं या इन धार्मिक संगठनों के घिसे पिटे ख्यालात का नतीजा कि आज भी भारत का मुसलमान देश की सबसे पिछड़ी बिरादरी बन कर खड़ा हुआ है.

आज के दौर में अपने पिछड़ेपन से निकलने के लिए मुसलमानों को सबसे पहले इन छद्म सियासी पार्टियों और घिसे पिटे धार्मिक संगठनों के शिकंजे से निकलना होगा.

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