'जलियाँवाला बाग़ पर माफ़ी माँगते भी तो ये महज़ पाखंड होता'

वर्ष 1919, अमृतसर का एक छोटा सा बाग.....जलियाँवाला बाग जहाँ गुलाम भारत के हज़ारों नागरिक इकट्ठा हुए थे..निहत्थे, हाथ में केवल तख्तियाँ थीं.

लेकिन वहाँ गए बहुत से लोग ज़िंदा न लौट सके. स्वर्ण मंदिर के पास बने इस छोटे से बगीचे में 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फ़ौज ने गोलियां चलाईं और सैकड़ों निहत्थे भारतीय मारे गए.

इस घटना को 94 साल बीतने को आए लेकिन आज तक ब्रिटेन ने कभी इस घटना के लिए माफी नहीं माँगी. इन दिनों ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन भारत आए हुए हैं.

जालियाँवाला बाग़ के लिए कैमरन मांगेंगे माफ़ी?

बुधवार को कैमरन जलियाँवाला बाग गए और वहाँ जाकर कहा कि ये ब्रितानी इतिहास की एक शर्मनाक घटना है पर उन्होंने माफी नहीं माँगी. सवाल ये है कि क्या उन्हें जलियाँवाला बाग के लिए माफी माँगनी चाहिए थी?

भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले भगत सिंह के परिवार का जलियाँवाला बाग की घटना से गहरा नाता है. भगत सिंह के वशंजों का मानना है कि ब्रिटेन की माफी उनके जैसे परिवारों के लिए निजी तौर पर बहुत मायने रखती है.

भगत सिंह के भतीजे किरनजीत सिंह संधू कहते हैं, “जलियाँवाला नरसंहार पूरे देश को हिला देने वाली घटना थी. भगत सिंह जी को उसी घटना ने प्रेरित किया था कि वो आज़ादी की लड़ाई के लिए लड़ें. भगत सिंह जी स्कूल में पढ़ते थे और काफी छोटे थे. जलियांवाला बाग की घटना के कुछ दिन बाद ही वे चुपचाप अमृतसर गए और वहाँ से शहीदों के खून से रंगी मिट्टी लेकर आए थे.”

किरनजीत सिंह संधू बताते हैं, “भगत सिंह जी ने जलियाँवाला बाग की मिट्टी एक शीशे में भर कर रखी थी और अपने भाई बहनों से कहते थे कि इससे प्रेरणा लो. ब्रितानी प्रधानमंत्री की माफी मेरे लिए निजी तौर पर बहुत मायने रखती.”

'माफी नहीं पाखंड होगा'

किरनजीत सिंह उस वक़्त को भी याद करते हैं जब 1997 में ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ अमृतसर गई थीं और जलियांवाला बाग के लिए माफ़ी माँगने को लेकर ज़बरदस्त प्रदर्शन आयोजित हुए थे.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमारा पूरा परिवार इन विरोध प्रदर्शनों के आयोजन से जुड़ा हुआ था. जब महारानी अमृतसर आई थीं तो हमारे घर के लोगों ने तो जलियांवाला बाग जाकर गिरफ्तारी भी दी थी. ये भारत की अस्मिता से जुड़ा सवाल है. जापान भी युद्ध अपराधों के लिए माफी माँग चुका है.”

हालांकि बहुत से लोग ये सवाल भी पूछ रहे हैं कि अगर 94 साल पहले घटी घटना के लिए ब्रिटेन माफी माँग भी लेता तो क्या माफी माँगने के वाकई कोई मायने होते?

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चमन लाल का मानना है कि अगर ब्रिटेन माफ़ी माँगता भी तो 'ये महज़ एक पाखंड और वोट की राजनीति' के अलावा कुछ नहीं होता.

वे कहते हैं, “जलियाँवाला बाग दुनिया के सबसे बड़े जनसंहारों में से एक है. अगर ब्रिटेन को अपने लोकतंत्र पर इतना नाज़ है तो उसे बहुत पहले ही ब्रितानी संसद में जलियाँवाला बाग के लिए माफी माँग लेनी चाहिए थी. अगर ब्रिटेन वाकई गंभीर है तो उसे अपने संसद में माफी माँगनी चाहिए.”

वे इसके लिए भारत सरकार को भी कटघरे में लेते हैं. उनका कहना है कि माफी की माँग भारतीय संसद में उठनी चाहिए थी.

'ब्रिटेन अपनी भूल सुधारे'

पिछली बार जब महारानी एलिज़ाबेथ भारत आई थीं तो जलियाँवाला बाग के लिए माफी माँगने का मुद्दा काफी गर्म था. लेकिन इस बार ब्रितानी प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ऐसी माँग के स्वर कम ही सुनाई दिए.

प्रोफेसर चमन लाल का कहना है कि मीडिया ने भी इस दौरे को सुर्खियों से दूर रखा और जनतांत्रिक संगठनों को मौका तक नहीं मिला कि वो इस पर संगठित हो सकें.

भगत सिंह के भतीजे किरनजीत संधू जहाँ मानते हैं कि देर से ही सही ब्रिटेन अपनी भूल को सुधारे जबकि प्रोफेसर चमनलाल जैसे लोगों का कहना है कि अगर कैमरन दो लफ्ज़ बोल भी देते तो उसमें कोई ईमानदारी नहीं होगी.

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