हैदराबाद विस्फोट के बाद डर में जकड़े लोग

  • 22 फरवरी 2013
हैदराबाद में 21 फरवरी 2013 को विस्फोट हुआ जिसमें कई लोग मारे गए

हैदराबाद में गुरुवार को हुए बम विस्फोटों के बाद से रईस अहमद को भय ने जकड़ लिया है.

मई 2007 में शहर की मक्का मस्जिद में हुए विस्फोट के बाद जिन सौ मुसलमान युवकों को पुलिस ने पकड़ा, रईस अहमद उनमें शामिल थे.

पर अदालत ने बाद में रईस सहित ज़्यादातर लोगों को बेक़सूर मानते हुए बरी कर दिया. इसके बावजूद शहर में विस्फोट की घटना के बाद रईस अहमद को फिर से वही यातनापूर्ण दिन याद आने लगे हैं.

रईस ने बीबीसी से कहा, "विस्फोट के बाद से मैं और मेरा परिवार बहुत परेशान हैं और यह स्वाभाविक है. आप जानते हैं उस समय हमारे साथ क्या हुआ था लेकिन मैं उम्मीद कर रहा हूँ कि अब की बार निर्दोषों को नहीं सताया जाएगा."

मक्का मस्जिद में विस्फोट के बाद गिरफ्तारी के कारण होने वाले नुकसान से वो अब तक संभल नहीं सके हैं .

उनकी न केवल नौकरी चली गई थी बल्कि जहाँ उनका विवाह तय हुआ था उस परिवार ने भी संबंध तोड़ लिए थे.

रईस अहमद के अलावा डॉक्टर इब्राहीम जुनैद भी उन युवाओं में शामिल थे जिन्हें मक्का मस्जिद विस्फोट के बाद पकड़ कर यातनाएं दी गईं और लगभग डेढ़ वर्ष तक जेल में रखा गया.

उत्पीड़न

मक्का मस्जिद में 2007 में धमाका हुआ था

अदालत की ओर से निर्दोष ठहराने के बाद भी काफी लंबे समय तक उन्हें उत्पीड़न सहना पड़ा.

इब्राहीम जुनैद का कहना था, "जब मैंने टीवी पर दिलसुखनगर में विस्फोट के समाचार देखे तो मुझे बहुत दुःख हुआ कि निर्दोष लोगों की जानें चली गईं और इतने सारे लोग घायल हो गए. इसके बाद मुझे बहुत डर भी लगा क्योंकि पहले पुलिस ने मुझे केवल इसलिए पकड़ लिया था कि विस्फोट के दिन मैंने मक्का मस्जिद में नमाज़ पढ़ी थी और घायलों को अस्पताल पहुँचाने में मदद की थी".

इस बार सबसे बड़ा अंतर यही दिखाई दे रहा है की पुलिस और दूसरी सरकारी एजेंसियों ने किसी संगठन को चिन्हित करने या आरोप लगाने में जल्दबाजी नहीं की है.

मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी और पुलिस महानिदेशक दिनेश रेड्डी ने खुल कर कहा है की वो इन विस्फोटों के ज़िम्मेवारों को लेकर कोई अटकलें लगना नहीं चाहते और छान बीन पूरी होने के बाद ही कुछ कहेंगे.

यह 2007 की घटनाओं के बिलकुल विपरीत है.

मई 2007 में मक्का मस्जिद में विस्फोट के तुरंत बाद ही पुलिस और मीडिया ने स्थानीय मुस्लिम समुदाय से लेकर लश्कर-ए -तैबा और हरकतुल मुजाहिदीन जैसी पाकिस्तान स्थित संगठनों तक सभी पर आरोप लगाना शुरू कर दिया था.

पुलिस ने 100 से ज्यादा स्थानीय मुस्लिम युवाओं को गिरफ्तार कर लिया था. इनमें से 26 पर आतंकवाद से जुड़े संबंधित आरोप लगाए गए जबकि बाक़ी लोगों को यातनाएं देने के बाद छोड़ दिया गया.

इसके लिए पुलिस और आंध्र प्रदेश की काँग्रेस सरकार की ज़बरदस्त आलोचना हुई थी.

गिरफ़्तारियों का ऐसा ही सिलसिला तब भी शुरू हुआ जब 25 अगस्त, 2007 को हैदराबाद के लुंबिनी पार्क और कोठी इलाके में दो धमाके हुए थे और 42 लोगों की मृत्यु हो गई थी.

यही कारण था कि जैसे ही गुरूवार के विस्फोटों की खबर फैली उन परिवारों में भय की लहर दौड़ गई जिनके सदस्यों को पहले पकड़ा जा चुका था.

'मीडिया ट्रायल'

इन युवाओं की न्यायिक लड़ाई लड़ने वाले आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज मॉनिटरिंग समिति के सचिव लतीफ़ मुहम्मद खान कहते हैं, "यह कहना जल्द बाज़ी होगा कि स्थानीय लोगों को परेशान नहीं किया जाएगा. मैं मानता हूँ की पुलिस ने अब तक ऐसी कोई बात नहीं कही है या किसी को पकड़ा नहीं है लेकिन मीडिया लगातार पुलिस पर दबाव बढ़ा रहा है. मीडिया में मुस्लिम समुदाय का ट्रायल शुरू हो गया है".

अगर स्थानीय पुलिस ने ताज़ा विस्फोटों के बाद अंधाधुंध गिरफ्तारियां शुरू नहीं की हैं तो इस के दो कारण हैं.

मक्का मस्जिद विस्फोट में सीबीआई की छान-बीन से जब यह बात सामने आई थी कि इसमें आरएसएस से जुड़े कुछ हिन्दू चरमपंथियों का हाथ था तो राज्य सरकार को बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.

बाद में उसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की सिफारिश पर निर्दोष पाए गए मुस्लिम युवाओं को लाखों रूपए का मुआवज़ा अदा करना पड़ा और यह सर्टिफिकेट देना पड़ा कि इन युवाओं का 'आतंकवाद' से कोई संबंध नहीं है.

इब्रहीन जुनैद को तीन लाख रूपए मिल चुके हैं जबकि रईस अहमद को मुआवज़ा देने की प्रकिया जारी है.

ताज़ा विस्फोटों की छान- बीन केवल हैदराबाद पुलिस तक सिमित नहीं है बल्कि यह काम अब नेशनल इन्वेस्टीगेशन एजेंसी सहित दूसरी केन्द्रीय एजेंसियां कर रही हैं .

पहली बार इसमें मिलिट्री इंटेलिजेंस को भी शामिल किया गया है.

लतीफ़ खान का कहना है, "अगर पिछली घटनाओं की छान- बीन भी इमानदारी और न्यायपूर्ण अंदाज़ से होती और असल दोषी पकड़े जाते तो शायद यह घटना नहीं घटती".

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