राजीव के हत्यारों को फांसी देना गलत:केटी थॉमस

Image caption अदालत ने मुरुगन, संथन, पेरारिवलन और नलिनी को मौत की सज़ा सुनाई गई थी

राजीव गाँधी के हत्यारों को मौत की सज़ा सुनाने वाली अदालत की पीठ के अध्यक्ष केटी थॉमस ने कहा है कि अब इस मामले के दोषियों को फांसी नहीं दी जानी चाहिए.

1999 में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायधीशों की पीठ ने मुरुगन, संथन, पेरारिवलन और नलिनी को मौत की सज़ा सुनाई थी.

सज़ा सुनाने वाली पीठ में न्यायाधीश केटी थॉमस, न्यायमूर्ति डीपी वाधवा और न्यायमूर्ति एसएसएम कादरी शामिल थे.

बीबीसी से बात करते हुए केटी थॉमस ने कहा कि राजीव गाँधी हत्या काँड में दोषी मुरुगन, संथन और पेरारिवलन पहले ही जेल में 22 साल बिता चुके हैं, इसलिए उन्हें फांसी देने का मतलब होगा एक ही अपराध के लिए दो बार सज़ा देना.

थॉमस ने कहा, “जेल में 22 साल बिताने के बाद भी यदि अभियुक्तों को मौत की सज़ा दी जाती है, तो यह एक तरह से एक ही अपराध के लिए दो बार सज़ा देने के बराबर होगा. यह संविधान के ख़िलाफ है.”

संविधान के ख़िलाफ

थॉमस ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से इन दोषियों की दया याचिका रद्द करने के निर्णय पर फिर से विचार करने की गुहार लगाई.

थॉमस ने तर्क देते हुए कहा, “राजीव गाँधी की हत्या के मामले में मेरी अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने जब फैसला सुनाया तो हमने आरोपियों के नेचर और कैरक्टर पर विचार नहीं किया था. कई साल बाद जस्टिस एसपी सिन्हा की बेंच ने इस ओर ध्यान दिलाया कि आरोपियों के नेचर और कैरक्टर पर गौर किए बिना उन्हें फांसी की सज़ा सुनाना गलत है.”

थॉमस ने आगे कहा कि मामले के आरोपी करीब 22 साल से जेल में हैं. उन्हें फांसी की सज़ा भी सुनाई गई है. इस दौरान उनकी सज़ा को आजीवन कारावास में भी बदलने पर विचार नहीं किया गया. यह एक तीसरी तरह की सज़ा है.

थॉमस ने नलिनी को मौत की सज़ा सुनाए जाने पर असहमति जताई थी.

बाद में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने नालिनी की दया याचिका मंजूर कर ली थी और उसकी सज़ा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया गया था.

अन्य अभियुक्त पेरारिवलन और मुरुगन भारतीय हैं, जबकि संथन श्रीलंकाई नागरिक है और ये तीनों कैदी तमिलनाडु के वेल्लोर जेल में कैद हैं.

1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या कर दी गई थी.

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