संसद हमले पर क्या कहा था अफ़ज़ल ने

Image caption अफ़ज़ल गुरू का एक पत्र प्रकाशित हुआ

अफ़ज़ल गुरू की मौत के एक पखवाड़े बाद कश्मीर के एक उर्दू साप्ताहिक क़ौमी वक़ार ने उनके द्वारा हिज़बुल मुजाहिदीन के प्रमुख सैयद सलाउद्दीन को लिखे गए पत्र को प्रकाशित किया है.

इस पत्र में अफ़ज़ल गुरू ने ज़ोर दे कर कहा है कि भारतीय संसद पर हुए हमलों के लिए उन्हें शर्मसार होने की ज़रूरत नहीं है.

अफ़ज़ल के भाई यासीन ने इस बात की पुष्टि की है कि उनके भाई द्वारा लिखा पत्र असली है.

क़ौमी वक़ार के संपादक शबनम क़य्यूम ने बीबीसी को बताया कि यह पत्र उन्हें साधारण डाक से तीन साल पहले मिला था लेकिन उन्होंने उसे सार्वजनिक करने का फ़ैसला अब किया है.

इस पत्र में अफ़ज़ल गुरू ने लिखा है, "जब भारत मासूम कश्मीरियों का खून बहाने में नहीं हिचक रहा तो हम 13 दिसंबर के हमले के लिए क्यों शर्मसार हों. अगर आप मुझे प्यार करते हैं और मेरी चिंता करते हैं तो आप मेरी शहादत के लिए प्रार्थना कीजिए."

शबनम क़य्यूम का आकलन है कि जब अफ़ज़ल पर इल्ज़ाम लगा कि वह भारतीय संसद पर हमले के लिए ज़िम्मेदार हैं तो उनकी छवि खराब हो गई जबकि वह इस हमले में शामिल ही नहीं थे. उन्होंने अपनी छवि सुधारने के लिए इस पत्र का सहारा लिया.

सैयद सलाउद्दीन ने भारतीय संसद पर हुए हमले को साज़िश करार दिया था.

हमले में शामिल नहीं

उनका मानना है कि जब उन पर हमले का आरोप लग ही गया और इसके लिए उन्हें फांसी की सज़ा दे दी गई तो उन्होंने यह तय किया कि इस आरोप को अपने सिर पर ले लिया जाए. हालांकि यह वास्तविकता नहीं थी और यही वजह थी कि उन्होंने उस समय वह पत्र छापा नहीं था.

शबनम कहते हैं कि अफ़ज़ल ने उन्हें पांच छह पत्र लिखे. बीबीसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने अब ही उन पत्रों को सार्वजनिक करने का फैसला क्यों किया. उनका कहना था कि अब अफ़ज़ल गुरू इस दुनिया में नहीं रहे. यह पत्र उनके पास उनकी अमानत थे और उनको गोपनीय रखने में कोई उद्देश्य पूरा नहीं होगा.

शबनम कहते हैं कि अगर यह पत्र उन्होंने उस समय छाप दिए होते तो अफ़ज़ल गुरू पर लगे इल्ज़ामों की एक तरह से पुष्टि हो जाती. वह उस समय भारतीय जेल में थे और इस क़बूलनामे की वजह से उन्हें सज़ा हो सकती थी.

लेकिन अब उनके इस दुनिया से जाने के बाद इन पत्रों को खुफिया रखने का कोई औचित्य नहीं है. शबनम का मानना है कि अगर अफ़ज़ल इस पूरे मामले में शामिल होते तो उन्हें उस समय उस पत्र को छापने में कोई आपत्ति नहीं होती.

इस पत्र पर पृथकतावादी संगठनों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है लेकिन मानवादिकार संगठनों के समूह कोआलेशन ऑफ़ सिविल सोसाइटीज़ का कहना है कि इस पत्र से अफ़ज़ल गुरू को उनकी मौत के बाद भी बदनाम करने की कोशिश की जा रही है.

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