चुनाव से पहले बोल्ड फ़ैसले ले पाएंगे चिदंबरम?

Image caption बजट पेश करने के दौरान पी चिदंबरम पर लोकलुभावने फ़ैसले का दबाव

केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम जब इस साल का बजट पेश करेंगे तो ये आम चुनाव से ठीक पहले पेश होने वाला अंतिम बजट होगा. इस बजट में उनके सामने दोहरी मुश्किल है.

एक ओर तो उद्योग जगत उनसे सुधारवादी कदम की उम्मीद कर रहा है वहीं दूसरी ओर आम चुनाव को देखते हुए लोकलुभावन घोषणाओं का भी दबाव होगा.

भारत के कपडा़ उद्योग को वित्त मंत्री के बजट से खासी उम्मीदें हैं. भारत के कपड़ा उत्पादों का सबसे बड़ा खरीददार यूरोपियन यूनियन के देश और अमरीका है. वहां इन दिनों मांग कम होने के चलते यहां के निर्माताओं के सामने संकट बढ़ा है.

उद्योग जगत की मांग

कपड़ा उद्योग में वैसा क्षेत्र है जो भारत में सबसे ज़्यादा लोगों को रोजगार देता है. करीब 3.5 करोड़ लोग आजीविका के लिए सीधे इस क्षेत्र पर आश्रित हैं जबकि इससे संबंधित क्षेत्रों में करीब 5.5 करोड़ लोग काम कर रहे हैं.

इंडिया फ़ैशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गीता कालरा ने कहा, “हम चाहते हैं कि वित्त मंत्री हमें भी निर्यातकों जैसा दर्जा दें. हमें भी सस्ती दर पर ब्याज मिलना चाहिए. सर्विस टैक्स पर भी हमें छूट मिलनी चाहिए. ग्लोबल आर्थिक मंदी ने हम पर काफी असर डाला है. अगर कोई हमारे उत्पादों को नहीं खरीदेगा तो फिर हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को काम कैसे देंगे.”

यानि उद्योग जगत यह महसूस कर रहा है कि देश में एक ओर निर्यात को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है वहीं दूसरी ओर बढ़ता हुआ आयात भी वित्त मंत्री के लिए बड़ी चिंता का विषय है. पेट्रोलियम पदार्थ और सोने का बढ़ता आयात चिंताजनक स्तर तक बढ़ गया है.

Image caption क्या सुधारवादी कदम उठा पाएंगे पी. चिदंबरम?

इन असंतुलनों के बीच बढ़ता हुआ राजकोषीय घाटा वित्त मंत्री पी चिदंबरम के लिए मुश्किल का सबब है.

आमदनी बढ़ाने का दबाव

उन पर खर्च घटाने के साथ साथ आमदनी बढ़ाने का दबाव भी होगा. इसके लिए वे टैक्स नीतियों में सुधार कर सकते हैं. टैक्स नीतियों में गुड्स और सर्विस टैक्स शामिल हो सकता है.

अभी देश के अंदर गुड्स और सर्विस टैक्स अलग अलग राज्यों की नीतियों पर निर्भर हैं. मसलन दिल्ली से मुंबई जाने वाला कपड़ों से भरे ट्रक को कम से कम तीन राज्यों से गुजरना होता है और इस दौरान उन्हें अलग अलग टैक्स चुकाने होते हैं.

सरकार की कोशिश होगी कि वे सभी टैक्सों को एक दायरे में ले आए. इससे भारत को एक बाजार के तौर पर उभरने में काफी मदद मिलेगी. साथ ही सरकार के राजकोष की आमदनी भी बढ़ेगी. मोटा मोटी अनुमान है कि इससे देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद में कम से कम 2 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज होगी.

टैक्स नीतियों में सुधार संभव

इससे टैक्स संबंधी ढांचागत नीतियां भी सरल होंगी. लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि उपभोक्ताओं के लिए उत्पादों की कीमतें कम होंगी. गुड्स एंड सर्विस टैक्स के तहत पहले साल करीब 15 फ़ीसदी कर चुकाने होंगे. इसके बाद हर साल 12 फ़ीसदी का कर चुकाना होगा.

जबकि मौजूदा समय में उपभोक्ताओं को अलग अलग टैक्सों को मिलाकर करीब 20 फ़ीसदी टैक्स चुकाना होता है.

भारतीय ख़जाने को भरने के लिए सरकार सार्वजनिक उपक्रम की ईकाईयों में हिस्सेदारी बेच सकती है. इस वित्तीय वर्ष में 5.5 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य रखा गया है. सार्वजनिक ईकाईयों की हिस्सेदारी बेचने से लक्ष्य से ज़्यादा रकम जुटाई जा सकती है.

हालांकि इस बजट में चिदंबरम खर्चे कम करने पर जोर दे सकते हैं.

सरकार के कई विभागों के बजट में कटौती की जा सकती है. इसमें रक्षा विभाग भी शामिल है. यही वजह है कि फ्रांसीसी कंपनी डेसाल्ट से 126 रफायल विमान की ख़रीददारी को टाला जा रहा है.

लोकलुभावन होगा बजट?

वैसे बजट पेश करने के दौरान वित्तमंत्री चिदंबरम आम चुनाव का भी ख्याल रखेंगे.

इसके लिए आम मतदाताओं को लुभाने के लिए खाद्य सुरक्षा नीति पर घोषणा हो सकती है. सरकार की योजना है कि करीब डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम के तहत 58 बिलियन डॉलर की रकम खर्च किए जाएं.

इससे यह आशंका भी जताई जा रही है कि आर्थिक सुधार पर वित्त मंत्री ज्यादा ध्यान नहीं दे पाएंगे.

केपीएमजी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिचर्ड रेकी कहते हैं, “जब से चिदंबरम वित्त मंत्री बने हैं तब से उन्होंने कई सकारात्मक संकेत दिए हैं. उनकी मंशा हो सकती है लेकिन देखना होगा कि वे कितना कर पाते हैं. उनकी कोशिश राजकोषीय घाटे को दूर करने की होगी. वे सुधारों की बात करते हैं रहे हैं. पहली बार रिजर्व बैंक ने भी ब्याजा दर घटाए हैं. ये सब सकारात्मक कदम है. ऐसे में उनके सामने सुधारवादी बजट पेश करने का मौका है.”

भारत की आर्थिक विकास की रफ़्तार इन दिनों धीमी है और उसे पटरी पर लाना ही वित्त मंत्री की प्राथमिकता होगी.

कुछ लोग उन्हें 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार भी मान रहे हैं. ऐसे में उनपर जनलुभावन फ़ैसले लेने का दबाव भी होगा.

देखना है कि चिदंबरम साहब इन दोनों के बीच किस तरह और कितना तालमेल बिठा पाते हैं.

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