आख़िर है कौन ये आम आदमी ?

  • 28 फरवरी 2013

बजट के मौसम में हर राजनीतिक दल आम आदमी झंडा उठा रहा है. सरकार आम आदमी के लिए हर कदम उठाने का दावा करती है. विपक्ष आम आदमी के साथ हुए 'धोखे ' पर लड़ता है.

पर कौन हैं ये आम लोग और बजट पेश करते वक्त सरकार इन आम लोगों का कितना ध्यान रखती है. यही दो सवाल हमने अलग अलग राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधियों से पूछे.

शकील अहमद, प्रवक्ता, कांग्रेस

“मिडिल क्लास और निम्न मध्य वर्ग के लोग हैं जिनकी आमदनी सीमित है. बड़ी आबादी है देश में. आम तौर पर गरीबी रेखा के अंदर हैं, या फिर उससे थोड़ा उपर हैं. यही आम आदमी है.”

“इन आम लोगों को ही ध्यान में रखकर बजट बनाना चाहिए. और सरकार बनाती भी है.”

इम्तियाज़ अहमद, समाजशास्त्री

“आम आदमी समाज की वास्तविकता हैं. वे गरीब है, परेशान है. किसी तरह से जी रहा है. आज जी रहा है, कल का भरोसा नहीं है. उसके पास कोई संसाधन नहीं है. उन्हें कठिनाईयों से निकलने की उम्मीद नहीं है. लेकिन हमारे यहां आम आदमी का मतलब वो नहीं है. ये राजनीतिक स्लोगन बन गया है. मेरे ख्याल से दो तरह के आम आदमी हैं- एक जो सामाजिक स्तर पर वास्तविकताओं का हिस्सा है, और दूसरा वो हिस्सा है जिसे समय समय पर राजनीतिक तौर पर वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल किया जाता है."

"सरकार कभी कभी सिर्फ दिखाने के लिए उसे तवोज्जो देती है. लेकिन आज के परिपेक्ष्य में सरकार जिसे आम आदमी कह रही है वह आम आदमी नहीं है, वह मिडिल क्लास है."

एबी वर्धन,भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी

“आम लोग देश की कुल आबादी के 77 फीसदी से लेकर 80 फीसदी तक हैं. ये वे लोग हैं जो ख़ास नहीं हैं. कामगार, खेती-किसानी करने वाले लोग, छोटे मोटे दुकानदार, गरीब गुरबा लोग यही लोग आम लोग हैं. इसमें मिडिल क्लास का भी एक तबका शामिल है, मैं उपर के स्तर के बात नहीं कर रहा हूं जिनकी मोटी तनख्वाह हैं.”

“ख़ास बात ये है कि इन लोगों को ध्यान में रखते हुए कभी बजट नहीं बनता. जो बजट बनाते हैं उन्हें बड़े बड़े लक्ष्य के साथ इसे बनाते हैं. वे ग्रोथ की बात करते हैं. विदेशी निवेश की बात करते हैं, टैक्स की नीतियां कैसी होनी चाहिए. जो आमतौर पर आमलोगों के ख़िलाफ़ होती हैं.जितनी छूट हैं वह सब बड़े बड़े लोगों को ही दिए जाते हैं.”

प्रकाश जावड़ेकर, प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी

"आम आदमी गरीब है, दिहाड़ी मजदूर है, ठेके पर मजदूरी वाला काम करता है. कांग्रेस पार्टी पहले इन्हें आम आदमी कहती थी, अब उन्हें मैंगो पीपल कहती है."

"यह सरकार एजेंटों और भ्रष्टाचारियों के लिए सत्ता में है. आम आदमी पर महंगाई बोझ बढ़ा है और इस बजट में सरकार उन पर और ज़्यादा बोझ बढ़ाएगी."

कुमार विश्वास, नेता, आम आदमी पार्टी

“आम आदमी वही है जो इस शासकीय व्यवस्था में अंतिम पायदान पर खड़ा है. वह वंचित है, शोषित है, दलित है, आदिवासी है. बहुसंख्यक आबादी है ऐसे लोगों की लेकिन उनकी परवाह सरकार को नहीं है.”

“बजट कारपोरेट तंत्र से बात कर बनाए जाते हैं, आम लोगों से कोई सलाह मशविरा नहीं किया जाता है. आम जनता की भागीदारी से अलग होता है बजट. देश में महज एक फ़ीसदी लोग हैं जो ये तय करते हैं सरकार किस किस तरह से टैक्स वसूलेगी, कितना कितना वसूलेगी और कहां खर्च करेगी.”

ताहिरा हसन, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन एसोसिएशन

“आम आदमी सरकार किसे मानती है, ये मैं नहीं जानती. लेकिन मेरे लिए आम आदमी वही है जो 80 फीसदी लोग है. किसान हैं, खेती किसानी कर रहे हैं. मजदूर हैं, इनमें ग्रामीण महिलाएं शामिल हैं.”

“सरकार ने इन लोगों से पल्ला झाड़ा हुआ है. सरकार का ध्यान मुठ्ठी भर लोगों की ओर होता है, जहां वे लोग अमीर होते जा रहे हैं.कभी कभी बजट में तो आम आदमी के लिए कुछ कर देते हैं. लिखते हैं- जिक्र करते हैं लेकिन वह लोगों तक नहीं पहुंचता है.”

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