त्रिपुरा में लगातार पांचवी बार माणिक की सरकार

  • 1 मार्च 2013
माणिक सरकार, त्रिपुरा, मुख्यमंत्री
Image caption त्रिपुरा में माणिक सरकार की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है.

त्रिपुरा में माणिक सरकार की अगुवाई वाली सत्तारूढ़ वाम मोर्चे ने लगातार पांचवीं बार राज्य का किला फतह कर लिया है.

कम्यूनिस्ट पार्टियों का गढ़ माने जाने वाली राज्य जैसे केरल और पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकारों के हारने के बाद फिलहाल त्रिपुरा में ही लेफ्ट पार्टियों की सरकार बनी है

माणिक सरकार ने 2013 के विधानसभा चुनावों में ईमानदारी को एक प्रमुख मुद्दा बताया और जीत के साथ वामपंथी पार्टियों का झंडा भी बुलंद रखा है.

नागालैंड में एक ओर जहां नगा पीपल्स फ्रंट (एनपीएफ) को लोगों ने सत्ता की चाभी सौंपी हैं. वहीं दूसरी ओर दोनो ही राज्यों में खराब प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस मेघालय मेंसबसे बड़ी पार्टीबनकर उभरी है.

हालांकि पूर्वोत्तर के इस राज्य में कांग्रेस पूर्ण बहुमत से केवल दो सीटों से चूक गई. तीनों निवर्तमान मुख्यमंत्रियों माणिक सरकार, नेइफु रियो और मुकुल संगमा अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव जीत गए हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक त्रिपुरा में वाम मोर्चे को तीन चौथाई बहुमत मिला है. माणिक सरकार के गठबंधन ने राज्य की 60 में से 30 सीटें जीती हैं.

कम पैसे वाले

चुनाव से पहले माणिक सरकार ने निर्वाचन अधिकारी को जो हलफनामा दिया था वो बताता है कि वो सभी मुख्यमंत्रियों में सबसे कम पैसे वाले हैं.

उन्होंने हलफनामें में दिखाया था कि उनके खाते में 10,800 रूपये हैं. मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सरकार अपनी पार्टी की नीति के मुताबिक अपनी तन्ख्वाह पार्टी को ही दे देते हैं और पार्टी की तरफ से उन्हें हर महीने 5000 रुपये का भत्ता मिलता है.

मुख्यमंत्री माणिक की पत्नी केंद्र सरकार की सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं और माणिक कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद उनका घर पत्नी के पेंशन के पैसों से चलेगा.

सीटों का लेखा जोखा

नागालैंड में एनपीएफ पूर्ण बहुमत के साथ लगातार तीसरी बार सत्ता में वापस आई है. एएनपीएफ को राज्य की 59 में से 38 सीटें मिली हैं.

एक उम्मीदवार की मृत्यु हो जाने की वजह से नागालैंड की एक सीट का चुनाव स्थगित कर दिया गया था. कांग्रेस के खराब प्रदर्शन का यह आलम था कि उसे त्रिपुरा में महज 10 और नागालैंड में 18 सीटें ही मिल पाई.

मेघालय की 60 विधानसभा सीटों में कांग्रेस का आंकड़ा 29 पर ही ठहर गया. हालांकि साल 2008 के प्रदर्शन की तुलना में कांग्रेस इस बार चार सीटें अधिक जीती हैं.

मुकुल संगमा की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार को राज्य के पुराने कद्दावर नेता पीए संगमा की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा. पीए संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी के खाते में केवल दो ही सीटें जुड़ पाई.

त्रिपुरा में वाम मोर्चे ने पिछले दोनो चुनावों में अपने प्रदर्शन में सुधार किया है. साल 2008 में जहां उसे 49 सीटें मिली थीं, वहीं वर्ष 2003 में उसके खाते में त्रिपुरा विधानसभा की 42 सीटें थीं.

संबंधित समाचार