इंदिरा गांधी या टैगोर पर फिल्म बनाना मुमकिन है?

  • 6 मार्च 2013
Image caption फिल्म आंधी को लेकर खासा बवाल हुआ था

सत्तर के दशक में आई गुलज़ार की फिल्म 'आंधी' वाकई किसी आंधी से कम नहीं थी.

इंदिरा गांधी से मिलते-जुलते किरदार वाली इस फिल्म को लेकर खासा बवाल हुआ था. उसी समय बनी फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' तो कभी रिलीज़ ही नहीं हो पाई.

आपातकाल के उस दौर को 35 साल से भी ज्यादा समय बीत चुका है.

पर आज भी जवाहर लाल नेहरू, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, जेआरडी टाटा, सुभाष चंद्र बोस जैसी किसी भी बड़ी हस्ती की निजी ज़िंदगी को टटोलती या फिर राजनीतिक फिल्म बनाना बहुत अच्छा आइडिया नहीं समझा जाता.

विरोध प्रदर्शन, सिनेमाघरों में तोड़ फोड़, जलते पुतले.. ऐसी फिल्में बनने से पहले कुछ ऐसे ही दृश्य होते हैं.

कुछ दिन पहले ही क्षेत्रीय सेंसर बोर्ड ने एक बंगाली फिल्म को सर्टिफिकेट नहीं दिया.

आरोप है कि सर्टिफिकेट इसलिए नहीं मिला क्योंकि फिल्म में ममता बनर्जी के रोल को कथित तौर पर नकारात्मक तरीके से दिखाया गया है.

पश्चिमी देशों मार्ग्रेट थैचर, अब्राहम लिंकन और महारानी एलिज़ाबेथ जैसी हस्तियों की ज़िंदगी को छूती बेहतरीन फिल्में बनीं हैं. फिर क्यों भारतीय ऐसी फिल्में बनाने से परहेज़ करते हैं.

युवा फिल्म निर्देशक इम्तियाज़ से कुछ समय पहले अपनी मुलाकात में मैने यही सवाल पूछा था. उनका मानना था कि भारतीय समाज फिल्मकार को ये सुरक्षा और आज़ादी नहीं देता कि वो अपने नज़रिए से किसी बड़ी हस्ती को दिखा सके.

वो कहते हैं, "अगर हम इंदिरा गांधी पर कोई फिल्म बनाएंगे तो किसी न किसी को कोई न कोई आपत्ति ज़रूर हो जाएगी. वैसे भी हम भारतीय हर चीज़ को बड़े ही निजी तौर पर ले लेते हैं.''

'निजी ज़िंदगी टटोलना हमारी परंपरा नहीं'

वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नय्यर कई दशकों से देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृष्य को देखते आए हैं.

Image caption पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री थैचर की जिंदगी पर्दे पर पेश की जा चुकी है

कुलदीप नैय्यर उन लोगों में हैं जो आयकन समझी जाने वाली हस्तियों की निजी ज़िंदगियों पर कुछ लिखे जाने या फिल्म बनाए जाने से असहज महसूस करते हैं.

वे कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि सरकार की मनाही होती है या कोई नियम है. बस हमारी नैतिकता ही ऐसी है कि निजी बातों को दिखाना अच्छा नहीं समझा जाता. यही हमारी परपंरा है. मैं भी निजी जीवन उछालने के हक में नहीं हूं. पर मैं ये ज़रूर मानता हूं कि बड़ी हस्तियों के बारे में राजनीतिक फिल्में बननी चाहिए. लेकिन ऐसी फिल्में कम बनाई जाती हैं. शायद लोग राजनीतिक पार्टियों से डरते हैं. आखिर फिल्म पर बहुत पैसा लगता है और कोई नहीं चाहता कि उसकी फिल्म विवादों में फंस जाए और पैसे का नुकसान हो.”

'बवंडर' जैसी फिल्म बनाने वाले जगमोहन मूंदडा सोनिया गांधी पर फिल्म बनाना चाहते थे. तमाम कोशिशों के बाद भी वे ऐसा न कर पाए...इसके लिए उनकी ये ज़िंदगी कम पड़ गई. 2011 में उनकी मौत हो गई.

'इतिहास से भागते हैं लोग'

श्याम बेनेगल उन चुनिंदा निर्देशकों में से हैं जो सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी पर फिल्में बना चुके हैं. श्याम बेनेगल दोष समाज की उस मानसिकता को देते हैं जहां इतिहास में कोई रुचि नहीं है.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमारे यहां इतिहास को सहेजने की न तो परंपरा है और न ही दिलचस्पी. हमारे दर्शकों को इतिहास में कम ही रुचि रहती है, माइथोलॉजी नुमा मनोरंजन हमारे दर्शकों को ज़्यादा पसंद आता है. यही समस्या की जड़ है.”

2007 में फिल्म 'गांधी माई फादर' आई थी जिसमें महात्मा गांधी और उनके बेटे के जटिल संबंध को दर्शाया गया था. राष्ट्रपिता को जब अपने ही बेटे के नज़रिए से दिखाया गया तो ये कई गांधी समर्थकों के गले नहीं उतरा था और फिल्म पर पाबंदी तक की मांग उठी थी.

हाल ही में जब अभिनेता और नाटककार गिरीश कर्नाड ने रवींद्रनाथ टैगोर को दोयम दर्जे का नाटककार कह दिया था तो उन्हें तीखी आलोचना झेलनी पड़ी थी.

सवाल ये है कि क्या गांधी या टैगोर जैसी हस्तियों पर ऐसी सोच वाली फिल्म बनाने की आज़ादी नहीं है जो सोच आम जनमानस से मेल न खाती हों ?

'द आयरन लेडी' में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मार्ग्रेट थैचर को ढलती उम्र में अपने निजी और राजनीतिक फैसलों से जूझते हुए दिखाया गया है. अपने समकक्षों पर हावी होती एक राजनेता, परिवार और राजनीति में तालमेल बिठाने से जूझती एक मां. शायद थोड़ी हकीकत और थोड़ा अफसाना..

लेकिन भारत हो या पाकिस्तान हाल ये है कि इन मु्द्दों और हस्तियों पर हकीकत दिखाना तो दूर अफसाना बनाना भी कल्पना से परे लगता है.

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