जगंल,जानवर और इंसान, ज़िंदा रहने का हक किसे?

बिनसर अभयारण्य, उत्तराखंड
Image caption वन्य जीवों के संरक्षण और आम लोगों की ज़रूरतों के बीच कशम्कश

वन और पर्यावरण विभाग की नज़र में जल, जंगल और ज़मीन पर बुनियादी इंसानी अधिकारों से बड़ा सवाल है वन्य जीवों का कथित संरक्षण तो आम लोगों की नज़र में जानवर से ज़्यादा ज़रूरी है ज़िंदगी की ज़रूरतों को पूरा करने का सवाल.

आइए नज़र डालते हैं भारत के दो राज्यों पर

उत्तराखंड

देहरादून से शालिनी जोशी के अनुसार उत्तराखंड के कुमांऊ में अलमोड़ा के क़रीब बिनसर वन अभयारण्य में इसी सवाल पर वन विभाग और स्थानीय लोग आमने-सामने हैं.

बिनसर वन अभयारण्य मध्य हिमालय में स्थित एक मशहूर और लोकप्रिय पर्यटक स्थल है.

इस अभयारण्य की सीमा से सटे लगभग 10 किमी वर्ग क्षेत्र को ईको-सेंसिटिव ज़ोन यानी पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किए जाने का प्रस्ताव है जिससे क़रीब 85 गांवों की आबादी और उनकी आजीविका प्रभावित होने की आशंका है.

स्थानीय ग्रामीणों ने इस प्रस्ताव के विरोध में वन अधिकारियों का घेराव और विरोध प्रदर्शन किया है और चेतावनी दी है कि यदि यह निर्णय वापस नहीं हुआ तो आंदोलन और तेज़ किया जाएगा.

अलमोड़ा में रहनेवाले समाजसेवी शमशेर बिष्ट कहते हैं, ''ये पर्यावरण के नाम पर ग्रामीणों के अधिकारों का हनन है और आदमी के बजाए जानवरों को प्राथमिकता देनेवाली बात है. एक ओर तो नेता-अफ़सरों और ठेकेदारो की साठ-गांठ से प्रदेश की सभी नदियों में खनन चल रहा है, ज़मीनें खुर्द-बुर्द की जा रही है, रिज़ॉर्ट और होटल बन रहे हैं और दूसरी ओर ग्रामीणों से उनके हक़ छीने जा रहे हैं.”

हांलाकि उत्तराखंड के ईको-टूरिज़म विभाग के निदेशक राजीव भर्त्तृहरि कहते हैं, ''वास्तव में लोगों को ग़लतफ़हमी है कि ईको-सेंसेटिव ज़ोन बनने से वो वहां कुछ भी नहीं कर पाएंगे. लंबे समय में ये स्थानीय लोगों के ही हित में होगा.''

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में सभी राज्य सरकारों को संरक्षित क्षेत्रों की सीमा पर ईको-सेंसेटिव ज़ोन घोषित करने के आदेश दिए हैं.

1972 के वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत ईको-सेंसेटिव ज़ोन घोषित किया जाता है. इस क्षेत्र में आमतौर पर खनन और उद्योग लगाने पर पाबंदी लग जाती है, बायोगैस और ईको-टूरिज़म को बढ़ावा दिया जाता है और पनबिजली जैसी परियोजनाओं और निर्माण को नियंत्रित किया जाता है.

ग़ौरतलब है कि उत्तराखंड में 66 प्रतिशत भूमि पहले से ही संरक्षित क्षेत्र है. यहां छह नेशनल पार्क, सात अभयारण्य और तीन संरक्षित क्षेत्र हैं.

ईको-सेंसेटिव क्षेत्र सिर्फ़ बिनसर में ही नहीं इन सभी 16 संरक्षित इलाक़ों में घोषित किया जा रहा है. बिनसर की तरह ही कॉर्बेट, नंदादेवी और राजाजी नेशनल पार्क में भी इस प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है.

उधर राजस्थान में भी बाघों की पनाहगाह सरिस्का में ग्रामीणों और वन अधिकारियो के बीच तनाव पैदा हो गया है.

राजस्थान

जयपूर से नारायण बारेठ कहते हैं कि वन क्षेत्र में लगी पाबंदियो को लेकर गांव वाले दो दिन से धरने पर बैठे हैं.

Image caption बिनसर अभयारण्य से सटे सत्री गांव के लोग

लेकिन वन अधिकारियो का कहना है कि वो सिर्फ़ क़ानून का पालना कर रहे है.

जयपुर से 107 किमी दूर सरिस्का अभ्यारण्य में शुक्रवार को दूसरे दिन भी विरोध प्रदर्शन के कारण पर्यटक गतिविधिया बंद रहीं क्योंकि धरने पर बैठे ग्रामीणों ने रास्ते रोक दिए और सैलानियो को जाने नहीं दिया.

सरिस्का के फ़ील्ड निदेशक आर एस शेखावत ने बीबीसी से बातचीत के दौरान कहा, ''दरसल गांववाले वन्य नियमों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किए गए उपायों में छूट चाहते हैं. ये मुमकिन नहीं है. हम उन्हें समझा रहे है. साथ ही कई बार प्रतिबंधित क्षेत्र में पशु चराने से भी विवाद हुआ है. हाल में ही हमारे कर्मचारियो पर हमला किया गया था.''

सरिस्का और उससे सटे वन्य क्षेत्र में ज़मीन की ख़रीद फ़रोख़्त पर पाबन्दी है. गांव वाले इस में ढील की मांग कर रहे है.

सरिस्का क्षेत्र में एक प्राचीन मंदिर भी है और गांव वाले मंदिर तक बिना रोक टोक के आने-जाने की इजाज़त चाहते हैं.

इन ग्रामीणों में से एक जयकिशन कहते है, ''हम वन्य अधिकारियों के ज़रिए थोपी गई पाबंदियों से दुखी हो गए है. हम अपने ही पुश्तैनी गांव घर और खेतों में अपनी मर्ज़ी से आ-जा नही सकते. लिहाज़ा अब हमारा आन्दोलन बेमियादी है.''

सरिस्का में अभी नौ बाघ है. शिकारियों के हाथों कथित तौर पर बाघ विहीन हो चुके सरिस्का में हाल के वर्षो में पड़ोस के रणथम्भोर अभयारण्य से बाघों को लाकर यहाँ फिर से आबाद किया गया है, ताकि ये इलाक़ा बाघों से बाँझ न हो जाए.

अधिकारियो के अनुसार हर साल कोई 60 हज़ार सैलानी सरिस्का आते है.

लिहाज़ा अलवर और सरिस्का के आसपास सैलानियों से जुड़े व्यापार की बहार है. इससे ज़मीन की क़ीमते बढ़ गई हैं.

वन अधिकारियों के अनुसार इस आंदोलन के पीछे कई और भी व्यापारिक शक्तिया काम कर रही हैं.

हालाँकि ग्रामीण इन आरोपों को गलत बता रहे है.

अरावली की ख़ूबसूरत वादियों में आबाद कोई 800 वर्ग किमी में फैले सरिस्का में वर्ष 2004 तक पंद्रह बाघ थे. लेकिन वन अधिकारियों के अनुसार शिकारियो ने एक-एक कर इन बाघों को मौत के घाट उतार दिया.

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