अदालत से कैसे बरी हुए वरुण गाँधी?

वरुण गाँधी
Image caption वरुण गाँधी ने ख़ुद पर लगे आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया था.

हिंदुओं की तरफ़ उठे हाथ को काट देने और मुसलमानों को बीमारी बताने के आरोपों के कारण भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गाँधी को जेल जाना पड़ा था.

सन 2009 के आम चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश के पीलीभीत क्षेत्र में कथित तौर पर दिए वरुण गाँधी के उस भाषण को सबने टेलीविज़न पर देखा और सुना पर आख़िरकार तीन साल तक मुकद्दमा चलने के बाद वो अदालत से बरी कर दिए गए.

तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने कहा वरुण गाँधी के भाषणों के टेप देखने के बाद कहा था, “हमें ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमें जो टेप मिला है, उसमें कोई छेड़छाड़ हुई है.” उन्हीं के आदेश पर वरुण गाँधी के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज हुआ.

अदालती दस्तावेज़ों के मुताबिक़ वरुण ने पीलीभीत की चुनाव सभाओं में कहा था, “हिंदू पर हाथ उठा या कार्यकर्ता को डराने धमकाने एवं हक छीनने के लिए सिकायत मिलती है तो वरुण गाँधी हाथ काट देगा. कमल *** (मुसलमानों के लिए अपमानजनक शब्द) के गले काट देगा. मुस्लिम एक बीमारी है, चुनाव के बाद ख़त्म हो जाएगी.”

इसके बावजूद 5 मार्च 2013 को पीलीभीत के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अब्दुल कैयूम ने वरुण गाँधी को बाइज़्ज़त बरी कर दिया. उत्तर प्रदेश का एक संगठन आवामी काउंसिल अब इस फ़ैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने पर विचार कर रहा है.

पुलिस ने वरुण गाँधी पर लगे आरोपों को सिद्ध करने के लिए कुल 34 गवाह पेश किए. लेकिन फ़ैसले के मुताबिक़ सभी गवाह अपने बयान से पलट गए और “किसी साक्षी ने घटना का समर्थन नहीं किया है.” अदालत के फ़ैसले पर नज़र डालने पर कई तरह के सवाल उभरते हैं:

गवाहों के बयानों का विरोधाभास

Image caption अदालत ने कहा अभियोजन पक्ष अपना केस सिद्ध नहीं कर पाया.

गवाह नंबर दो बालक राम ने अदालत को बताया कि 8 मार्च, 2009 को पीलीभीत के बरखेड़ा क़स्बे में “न कोई रैली हुई...न ही वह किसी रैली में गया था. न ही किसी रैली के बारे में मुझे बताया गया था, न ही वरुण गाँधी ने कोई भड़काऊ भाषण दिया और न ही कोई चुनावी रैली हुई.”

लेकिन गवाह नंबर दस, पुलिस कांस्टेबल रामेंद्र पाल ने अदालत से कहा कि 8 मार्च, 2009 को कस्बा बरखेड़ा में उनकी शांति व्यवस्था में ड्यूटी लगी थी. आने जाने वाले लोग चर्चा कर रहे थे कि वरुण गाँधी ने अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया पर क्या कहा ये मैंने नहीं सुना.

एक गवाह कहता है कि कोई रैली नहीं हुई, दूसरा गवाह कहता है कि शांति व्यवस्था में उसकी ड्यूटी उसी जगह पर लगी थी और लोग वरुण गाँधी के बारे में बातें कर रहे थे.

पर दोनों गवाहों के इन विरोधाभासी बयानों पर अदालत के फ़ैसले में सवाल नहीं उठाए हैं.

गवाह नंबर 13, कांस्टेबल किशोर पुरी ने ये तो स्वीकार किया कि 8 मार्च को उनकी ड्यूटी क़स्बा बरखेड़ा में सुरक्षा के लिए लगी थी, पर “उस दिन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई थी. किसी रैली आदि की जानकारी नहीं है.”

कांस्टेबल रामेंद्र पाल ने “आने जाने वालों” से वरुण गाँधी के अपने कार्यकर्ताओं को संबोधित करने वाली बात सुनी. पर उसी थाने के दूसरे पुलिसकर्मी किशोर पुरी को किसी रैली की जानकारी नहीं थी. ऐसा क्यों?

अदालत के फ़ैसले में भी इस विरोधाभास का भी कोई जवाब नहीं मिलता.

गवाह नंबर 20, पुलिसकर्मी शिवकुमार मिश्रा ने स्वीकार किया है कि 3 अप्रैल 2009 को उन्होंने इंस्पेक्टर मनीराम राव के साथ जाकर मोहम्मद तारीक का एक हैंडीकैम कब्ज़े में लिया, जिसमें कथित तौर पर वरुण गाँधी के भाषण की रिकॉर्डिंग थी.

गवाह नंबर 31 के तौर पर पेश हुए मोहम्मद तारीक ने स्वीकार किया कि वीडियो कैमरा लेकर वो बरखेड़ा गए थे और उसी की रिकॉर्डिंग चिप पुलिस को सौंपी गई. पर उन्होंने कहा कि उन्होंने वरुण गाँधी का भाषण नहीं सुना.

जाँच अधिकारी इंस्पेक्टर मनीराम राव ने अदालत में स्वीकार किया कि “वीडियो कैमरा वरुण गाँधी के मुकद्दमे से संबंधित है.” पर उस कैमरे में किसकी फ़िल्म थी? क्या ये सवाल इंस्पेक्टर मनीराम से पूछा गया? अदालत के फ़ैसले में इसका कोई ज़िक्र नहीं है. अलबत्ता, इंस्पेक्टर मनीराम के साथ कैमरा कब्ज़े में लेने गए शिवकुमार मिश्र ने कह दिया कि उन्हें ये मालूम नहीं कि कैमरे में किसकी फ़िल्म थी.

पुलिस के एक और सब इंस्पेक्टर ललित हरीशचंद्र ने अदालत से कहा कि क़स्बे में लोगों ने उन्हें बताया कि वरुण गाँधी ने “मुसलमानों के विरुद्ध कुछ कटु शब्द भी कहे”. पर अदालत ने उनकी गवाही को ये कहते हुए नहीं माना कि वो “घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं हैं और यह लोगों द्वारा कही गई बात बता रहे हैं.”

वरुण गाँधी की आवाज़

जाँच अधिकारी के बयान के मुताबिक़ वो ऐटा जेल गए और जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा की अनुमति से वरुण गाँधी की आवाज़ का नमूना लेने पहुँचे. लेकिन वरुण ने आवाज़ का नमूना देने से इंकार कर दिया.

पर जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने अदालत में दिए अपने बयान में कहा कि इंस्पेक्टर मनीराम राव ने वरुण गाँधी से आवाज़ का नमूना उनके सामने नहीं माँगा.

आवामी काउंसिल के के महासचिव असद हयात ने बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में कहा, “हमने अदालत में अर्ज़ी दी थी कि वरुण गाँधी से पूछे कि वो अपनी आवाज़ देते हैं या नहीं. अगर नहीं तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए.”

लेकिन ये अर्ज़ी ख़ारिज कर दी गई.

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