इन बूढ़ी आंखों ने कई मौतें देखी हैं...

Image caption मुरमाडी गाँव में बच्चियों का घर जहाँ मातम छाया हुआ है.

महाराष्ट्र के भंडारा का मुरमाडी गाँव में शाम ढलते ही गलियां वीरान होनी शुरू हो गयीं हैं. इक्का दुक्का लोग ही सडकों पर नज़र आते हैं. बच्चे सड़कों से नदारद है. गाँव के लोग बताते हैं कि यहाँ पहले ऐसा माहौल नहीं था.

देर रात तक इस इलाके में चहल पहल रहती थी. राष्ट्रीय राजमार्ग पर होने के नाते लोगों का आना जाना लगा रहता था. मगर फरवरी की 14 तारीख ने सबकुछ बदल कर रख दिया.

आज यहाँ चारों तरफ मातम पसरा हुआ है. 14 फरवरी से ग़ायब एक ही घर की तीन नाबालिग लड़कियों के शवों को बरामद हुए अब 15 दिनों से ज्यादा बीत चुके हैं. मगर हत्यारों का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लग पाया है.

अपने घर में बैठे लड़कियों के दादा उस वक़्त को याद कर रहे हैं जब उन्होंने अपनी तीनों पोतियों को आखिरी बार देखा था.

आक्रोश

वो मराठी में बोले, "मुझे क्या पता था कि मैं आखिरी बार उन्हें देख रहा हूँ. सबसे बड़ी बच्ची घर पर ही थी. वो उस दिन स्कूल नहीं गयी थी. बाद में वो अपनी दोनों बहनों को स्कूल से लाने गयी. फिर उनका कोई अता-पता नहीं लगा."

उन्होंने बताया कि स्थानीय लाखनी थाना के अधिकारियों ने उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया था. दोपहर से लेकर रात तक वो पुलिस से मदद मांगते रहे. मगर पुलिस ने मामले को हल्के तौर पर लिया. इसी बात का आक्रोश लाखनी गाँव के लोगों को है.

बच्चियों के पिता का निधन 2008 में ही हो चुका था. एक के बाद एक इस घर ने कई मौतें देखीं हैं. सबसे पहले बच्चियों के चाचा, फिर पिता और अब वो खुद.

चाचा एक सड़क हादसे में मारे गए जबकि पिता ने एक गंभीर बीमारी से जूझते हुए दम तोड़ दिया. बच्चियों की माँ भी गंभीर रूप से बीमार है.

तीन बहनों के दादा की आँखों ने इस घर में सिर्फ मौतें ही देखीं हैं. ये बूढी आँखें आज फिर नम हैं.

मुरमाडी के लोगों को आश्चर्य है कि तीन बच्चियां गाँव से ग़ायब हो जाती हैं और किसी ने उनको जाते नहीं देखा.

पुलिस की भूमिका

यहाँ के सरपंच राजेश खराबे कहते हैं कि इतने दिनों के बाद भी इस मामले में कोई सुबूत नहीं मिलना चिंता वाली बात ज़रूर है. वो कहते हैं, "शायद लोगों को मालूम भी होगा. मगर वो पुलिस के नाम से ही डरते हैं. इस लिए शायद कोई चश्मदीद सामने नहीं आ रहा है."

खराबे का कहना है कि पिछले कई दिनों से इस इलाके में कानून व्यवस्था बहुत ख़राब है. हाल ही में इस गाँव में सात घरों में चोरी की घटना हो चुकी है.

गाँव की ही रहने वाली अश्विनी चोले कहती हैं कि घटना के बाद से महिलाओं में खौफ समा गया है. "घटना ने हम सब को हिला कर रख दिया है. अब कोई अकेले गाँव की सड़क पर जाना नहीं चाहता. बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी हम चिंतित हैं."

चोले कहती हैं कि उनका बेटा दसवीं की बोर्ड परीक्षा दे रहा है. इस घटना के बाद से उसने कहा कि वो गाँव में रहकर पढ़ नहीं पायेगा. इसलिए उन्होंने अपने बेटे को पास ही के कस्बे, भंडारा भेज दिया है.

पुलिस की शुरूआती भूमिका की वजह से लोग काफी नाराज़ हैं.

पिछले कई दिनों से स्थानीय लोग हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर क्रमिक अनशन पर बैठे हुए हैं.

अनशन स्थल राजमार्ग पर है और इसमें शामिल लोग आरोप लगाते हैं कि पुलिस और प्रशासन ने पूरे मामले को काफी हलके तौर पर लिया.

'बच सकती थीं बच्चियां'

धरना स्थल पर मौजूद पूर्व विधायक सेवकभाव वाघाये पाटिल ने आरोप लगाया कि लाखनी और इसके आस-पास के क्षेत्र में महिलाओं के खिलाफ अपराध में काफी वृद्धि हुई है.

वो कहते हैं कि अगर 14 फरवरी को पुलिस हरकत में आ गयी होती तो तीनों बच्चियों को बचाया जा सकता था.

घटना के कई दिनों बाद भी सिर्फ परीक्षण का दौर ही चल रहा है. जहाँ डाक्टर पुलिस पर तथ्यों को छुपाने का आरोप लगा रहे हैं वहीं पुलिस पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों की योग्यता पर ही सवाल खड़े कर रही है.

शुरू में पुलिस का कहना था कि बच्चियों के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं था. फिर प्रारंभिक जांच में अप्राकृतिक यौनाचार की बात सामने आई. अब डाक्टरों का तर्क है कि शवों के पानी में डूबे रहने की वजह से सबूत जुटाना मुश्किल हो गया है.

अब शवों से जुटाए गए सुबूतों की जांच नए सिरे से नागपुर स्थित क्षेत्रीय फोरेंसिक साईंस लेबोरेटरी में की जा रही है.

स्थानीय पुलिस का कहना है कि अब तक दर्जन भर से ज्यादा लोगों से इस मामले में पूछताछ की जा चुकी है. कुछ से पूछताछ चल रही है.

ऐसा पता चलता है कि पुलिस ने गांव से एक किलोमटर की दूरी पर स्थित एक ढाबे में काम कर रहे लोगों से भी पूछताछ की है. ये ढाबा वही है जहाँ कुँए से इन बच्चियों के शवों को बरामद किया गया था.

संबंधित समाचार