क्या संस्कृत का समय समाप्त हुआ?

संस्कृत विश्वविद्यालय
Image caption संपूर्णनांद संस्कृत विश्वविद्यालय का इतिहास लगभग 225 वर्ष पुराना है

ऐसे समाज में जहाँ संस्कृत पढ़ने वाले लोगों की संख्या में लगातार कमी आ रही है, गुजरात के दो मुसलमानों तैयब शेख और यास्मीन बानू कोठारी ने संस्कृत में मेडल जीतकर सभी को चौंका दिया है.

गुजरात के आदिवासी आर्ट्स और कॉमर्स कॉलेज में संस्कृत में टॉप करके मेडल जीतने वाली 24 वर्षीय यास्मीन बानू कोठारी कहती हैं कि वो इसी भाषा में मास्टर्स की डिग्री हासिल करना चाहती हैं.

वो कहती हैं, “संस्कृत पढ़ने से भी अच्छी नौकरी मिल सकती है. मुझे बचपन से ही संस्कृत का शौक था इसलिए मैने ये भाषा चुनी.”

लेकिन ऐसे माहौल में जब बहुत सारे माँ-बाप अपने बच्चों को बचपन से अंग्रेजी के रंग में ढाल रहे हैं और बाजार हमारी सोच के आयामों को तय कर रहा है, संस्कृत विद्यालयों से जुड़े लोगों की क्या सोच है?

बनारस के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिंदा प्रसाद मिश्रा को भी संस्कृत का भविष्य बहुत अच्छा नहीं दिखाई देता क्योंकि “आज के युवा की रुचि मात्र फ़र्जी डिग्री लेने में है.”

वो कहते हैं, “यहाँ आने वाले मात्र 20 प्रतिशत छात्रों में ही संस्कृत पढ़ने में रुचि होती है. ऐसे हालात में मुझे इस भाषा का भविष्य गौरवपूर्ण नहीं लगता है.”

संपूर्णनांद संस्कृत विश्वविद्यालय का इतिहास लगभग 225 वर्ष पुराना है और प्रोफेसर मिश्रा के अनुसार भारत में इसकी विभिन्न शाखाओं में करीब डेढ़ लाख छात्र पढ़ते हैं.

प्रोफेसर मिश्रा कहते हैं कि संस्कृत में शोध और मौलिकता की कमी है.

यहाँ छात्रों को शास्त्री और आचार्य की डिग्रियों के अलावा पीएचडी और डी लिट भी दिया जाता है. इन डिग्रियों के बाद वो पुजारी बन सकते हैं और स्कूलों में पढ़ा सकते हैं लेकिन आज के माहौल में जब युवा आसमान की उचाइयाँ छूना चाहता है, क्या ये डिग्रियाँ इसमें मदद करती हैं?

प्रोफेसर मिश्रा के मुताबिक संस्कृत को राजनीति से भी नुकसान पहुँचा है और इसे ब्राह्मणों की भाषा के ठप्पे का भी सामना करना पड़ा है लेकिन वो कहते हैं कि “संस्कृत एक उदार भाषा है जिसे कोई भी पढ़ सकता है और जो भी संस्कृत पढ़ेगा, उसके जीवन में सरलता आएगी.”

दौड़

Image caption कॉलेज प्रधानाचार्य डॉक्टर अभय परमार ने बताया कि यास्मीन को संस्कृत में मेडल जीतने के लिए जल्दी ही सम्मानित किया जाएगा

गुजरात के संतरामपुर में आदिवासी आर्ट्स ऐंड कॉमर्स कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉक्टर अभय परमार ने बताया कि वहाँ संस्कृत पढ़ाने वाले एक मात्र अध्यापक मुसलमान हैं.

यास्मीन बानू इसी कॉलेज की छात्रा हैं. कॉलेज यास्मीन बानू को उनकी सफलता के लिए सम्मानित करने की योजना बना रहा है.

आजकल शहरों में बड़ी संख्या में बच्चे अंग्रेजी, चीनी, फ्रेंच जैसी विदेशी भाषाएं सीख रहे हैं. इन्हें रोजगार पाने का साधन माना जाता है. इस दौड़ में संस्कृत कहाँ है?

उत्तर प्रदेश में लंबे समय से संस्कृत शिक्षण संस्थानों में अध्यापकों की भर्ती नहीं हुई है. रिपोर्टों के अनुसार दूसरे कुछ राज्यों में भी ऐसे शिक्षण संस्थानओं को समस्याओं का सामना है.

उधर उज्जैन के महर्षि पाणिनी संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मिथिला प्रसाद त्रिपाठी मानते हैं कि कुछ युवाओं में व्यवसायिकता का असर हुआ है जिससे वो संस्कृत से दूर हुए हैं लेकिन वो मानते हैं कि भाषा की समृद्धता के कारण एक वर्ग संस्कृत से जुड़ा भी है.

लेकिन क्या संस्कृत पर लगा ‘मरणासन्न’ भाषा का तमगा उतर पाए, इस सवाल का तर्क सहित सीधा जवाब देने से सभी कतराते हुए प्रतीत होते हैं.

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