'निर्भया' के बाद दिल्ली बदली महिलाओं के लिए?

  • 18 मार्च 2013
Image caption दिसंबर में सामूहिक बलात्कार की बर्बर घटना के बाद राजधानी में यौन हिंसा की शिकायतें बढ़ी हैं.

कुछ दिन पहले तक अपने ससुराल, मायके और मालकिन की मर्ज़ी के खिलाफ बहुत हिम्मत कर कानून से मदद मांगने निकली राखी, अब परेशान, हताश और डरी हुई हैं.

दो महीने तक एक आदमी के पीछा करने, अश्लील फोन करने और तेज़ाब फेंकने की धमकियों से तंग आकर राखी जनवरी में पुलिस के पास गईं.

लेकिन राखी के मुताबिक महिलाओं की सुरक्षा के लिए तमाम दावे करने वाली पुलिस ने उनकी शिकायत पर गौर करने के बजाय उनसे ही पूछताछ की.

राखी ने बीबीसी को बताया, “मुझसे पूछा कि मैं उसे कैसे जानती हूं, वो मेरी ही पीछे क्यों था, तो मैंने पुलिस से कहा ये सवाल उससे जाकर पूछिए ना.”

तो क्या दिल्ली में एक छात्रा के सामूहिक बलात्कार के बाद हुए प्रदर्शनों के बावजूद महिलाओं की ओर दिल्ली पुलिस के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है?

क्या अब भी छेड़छाड़ के लिए पीड़ित महिला पर ही शंका की जा रही है और यौन हिंसा की धमकी को ग़ैर-ज़रूरी समझा जा रहा है?

बढ़ी पुलिस तैनाती

जनवरी में महिलाओं से जुड़ी हिंसा के मामलों के लिए सुधीर यादव को दिल्ली पुलिस में स्पेशल कमिश्नर नियुक्त किया गया.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “ये कहना ग़लत होगा कि पुलिस के ग़लत रवैये की वजह से किसी महिला की शिकायत ठीक से ना सुनी गई हो, ये हो सकता है कि महिला के मन मुताबिक कार्रवाई ना की गई हो क्योंकि क़ानूनन उसकी शिकायत के लिए वो ज़रूरी नहीं था.”

सुधीर यादव ने ये भी बताया कि दिसंबर की घटना के बाद पुलिस को खास तौर पर सभी महिलाओं की शिकायतों पर गौर करने के आदेश दिए गए हैं.

महिलाएं आसानी से शिकायत कर सकें, इसके लिए हेल्पलाइन शुरू की गई है और सड़कों पर गश्त लगाने वाले पुलिसकर्मियों की तादाद बढ़ाई गई है.

ज़ाहिर है पिछले तीन महीनों में दिल्ली की सड़कों पर बुलंद हुए नारों का दबाव बना है, लेकिन ये राखी के सवालों का जवाब अब भी नहीं है.

एफ़आईआर दर्ज कराने में परेशानी

राखी का आरोप है कि थाने के तीन चक्कर लगाने पर भी उनकी शिकायत कोरे कागज़ पर ही लिखी गई.

15 दिन बाद आखिरकार एक महिला कार्यकर्ता ने इलाके के डीसीपी से बात की तो एफ़आईआर लिखी गई, आरोपी लड़का गिरफ्तार हुआ और फौरन ही ज़मानत पर रिहा भी.

Image caption दिल्ली पुलिस का दावा है कि पिछले तीन महीनों में राजधानी की सड़कों पर पुलिस की तैनाती बढ़ाई गई है.

राखी के मुताबिक पुलिस थाने के बार-बार चक्कर लगाने से उनकी नौकरी चली गई और पुलिसवालों के उनके घर वर्दी में आने से आस-पड़ोस में बदनामी हुई.

राखी कहती हैं, “उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाई मैं, पुलिस के पास जाने का सारा नुकसान मुझे ही हुआ, अब अपनी बेटियों की फिक्र लगातार लगी रहती है, मेरी सास ने तय कर लिया है कि हम उस इलाके में रहना छोड़ देंगे.”

राखी जैसी आपबीती कई महिलाओं ने मुझे सुनाई. ऐसी नाउम्मीदी है तो इन सभी ने पुलिस का दरवाज़ा खटखटाने का फैसला ही क्यों किया?

यौन हिंसा की शिकायतों में इज़ाफा

पिछले दस सालों से दिल्ली महिला आयोग के एक कार्यक्रम के तहत काम कर रही गरिमा, बलात्कार का शिकार हुई महिलाओं की काउंसलिंग करती हैं.

इसके तहत वो पीड़ित महिलाओं को मानसिक तौर से मज़बूत करना, उनके परिवार से बात करना और उन्हें उनके क़ानूनी हक के बारे में बताने जैसी सहायता देती हैं.

पिछले तीन महीनों में गरिमा के पास आने वाली महिलाओं की तादाद दोगुनी हो गई हैं.

गरिमा कहती हैं, “जिस तरह से लोगों ने प्रदर्शन किया, सार्वजनिक तौर पर यौन हिंसा के अपराधों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई, उससे महिलाओं को बल मिला, अब वो हिंसा सहने की बजाय, हिम्मत कर अपनी शिकायत दर्ज कराना चाहती हैं.”

गरिमा के मुताबिक बलात्कार ही नहीं, यौन हिंसा के सभी मामलों में अब महिलाएं सामने आने लगी हैं.

हाल में संसद में पेश किए गए आंकड़ों से पता चला कि जनवरी में दिल्ली में हर रोज़ बलात्कार की चार घटनाएं हुईं.

इसपर दिल्ली पुलिस का कहना था कि ये कानून व्यवस्था खराब होने की नहीं, बल्कि महिलाओं के आगे आकर शिकायत दर्ज कराने की वजह से है.

यानि पुलिस, सरकार और समाज से संवेदना का हाथ अधमने ढंग से भी बढ़े तब भी महिलाएं अपने कदमों में तेज़ी लाने को तैयार हैं.

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