'माँ को कैंसर हुआ तो बेटी को भी छोड़ गए'

Image caption सुखमन पांच साल की थी जब उसकी मां की कैंसर से मौत हो गई. अब वो मौसी के साथ रहती है.

पंजाब के फरीदकोट ज़िले के कोटकपूरा शहर में रहने वाली सुखमनप्रीत कुछ दिन पहले ही आठ बरस की हुई है. पांच साल की थी जब उसकी मां की कैंसर से मौत हो गई थी. लेकिन तीन साल की उम्र से ही उसके पिता और भाई उससे अलग रहते हैं.

इसकी वजह है उसकी मां को कैंसर होना. सुखमनप्रीत के पिता को इस बात का पता चलने के कुछ देर बाद ही उसके पिता अपने बेटे को लेकर अलग रहने लगे थे.

सुखमन की मौसी रजिंदर कौर बताती हैं, ''इसके पिता की थोड़ी बहुत ज़मीन है और वे दिहाड़ी करके गुज़ारा करते हैं. मेरी बहन की बीमारी का पता लगने पर पहले तो उसने इलाज कराया लेकिन बाद में कहने लगे कि उनके बस का नहीं है.''

बिखरते रिश्ते

रजिंदर कौर के मुताबिक़, ''फिर मेरी बहन मेरे पास ही रहने लगी और सुखमन भी. इसके पिता का कहना था कि बच्ची को अनाथाश्रम भेज देते हैं लेकिन मैंने और मेरे भाई ने कहा कि इसे हम संभाल लेंगे. कभी-कभी सुखमन की बात करा देते हैं इसके पिता और भाई से. मुलाकात तो नहीं हो पाती.''

रजिंदर अपनी बहन के पति को ज़िम्मेदार नहीं ठहराती. ''वो क्या करे? लड़के को साथ रखना आसान है. दोनों एक कमरे में रह लेते हैं. बेटी के साथ कई और ज़िम्मेदारियां बढ़ जाती हैं.''

पंजाब के कैंसर प्रभावित गांवों में कहीं पति ने पत्नी को छोड़ा है, कहीं बच्चों को मां-बाप ने तो कहीं मां-बाप को बच्चों ने.

एक तरफ कैंसर के कारण जहां रिश्ते टूट रहे हैं वहीं कैंसर ने घरों को उजाड़ा भी है. कई लोगों की ज़मीन, गहने सब बिक गए और फिर भी जान नहीं बच पाई. कई लोग सालों पहले लिया उधार चुका रहे हैं और अगले कई साल भी चुकाते रहेंगे.

कैंसर का प्रकोप

राज्य में कैंसर का ऐसा फैलाव है कि छोटे बच्चे भी इसके प्रकोप से नहीं बच पा रहे हैं. कहीं बच्चे खुद कैंसर का शिकार हैं तो कहीं उनके मां या पिता को कैंसर के कारण उनके बच्चों को सज़ा भुगतनी पड़ रही है.

मुक्तसर के रहने वाले 11 वर्षीय सुनील पिछले दो सालों से गले के कैंसर से पीड़ित है.

उसकी मां आशा रानी कहती हैं कि न सरकार ने, न किसी रिश्तेदार ने उसकी कोई सहायता की है.

तीन साल पहले उनके 28 वर्षीय पति की मौत दिल का दौरा पड़ने से हो गई जिससे तीनों बच्चों की ज़िम्मेदारी उस पर आ गई.

वे कहती हैं कि पहले तो पता ही नहीं चला कि उसके बड़े बेटे को कैंसर है. ''छह महीन तो टीबी का इलाज चलता रहा फिर जब उसके गले की गांठ और बड़ी हो गई तो कैंसर के टेस्ट में यह बात सामने आई कि उसे कैंसर है.''

''जो कुछ था सब बिक गया. सिलाई करके गुज़ारा कर रही थी. किसी का कोई सहारा नहीं मिला. गली वालों से पैसे इकट्ठे करके इलाज करा रही हूँ.''

मदद नहीं पंहुचती

वैसे तो पंजाब सरकार और केंद्र सरकार की ओर से कैंसर के पीड़ितों के लिए डेढ़ लाख रुपए का प्रावधान है लेकिन देखने में आ रहा है कि या तो लोगों को इसकी जानकारी नहीं है या फिर कई कारणों के चलते यह पैसा उन तक नहीं पहुंच पा रहा.

जैसे आशा रानी का मामला है. वो कहती हैं, ''मुझे बताया गया है कि डेढ़ लाख रुपए का चेक आया हुआ है लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि मुक्तसर अस्पताल से ही इलाज कराना होगा. लेकिन क्योंकि मैं कहीं और से इलाज करा रही हूँ और यह ठीक भी हो रहा है तो वहां हम क्यों जाएंगे.''

बठिंडा की कुलवंत कौर (45) का मामला अलग है. उसे स्तन कैंसर होने की जानकारी तो कब से है लेकिन यह जानकर झटका लगा कि वो इलाज नहीं करा रही.

कारण जानने पर उसने कहा, ''हमारे पास इतने पैसे नहीं है. दो बेटे हैं जो बाहर ड्राईवर हैं. दोनो को लगभग पांच हज़ार रुपए मिलते हैं. जो बचा पाते हैं यहां भेज देते हैं.''

लेकिन क्या उसे नहीं सरकार की सहायता का नहीं मालूम? उसने कहा नहीं, ''अभी तक तो जिससे भी बात की उन्होंने कहा कि बेटे कमाते हैं वो कराएंगे इलाज.''

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