क्या आपका बच्चा साइबर बुलिंग से सुरक्षित है?

  • 22 मार्च 2013
Image caption ध्रुव मनोहर खुद को 'इंटरनेट फ्रीक' बताते हैं

12 साल के ध्रुव मनोहर ने जबसे होश संभाला है, तब से ही वो गैजेट और इंटरनेट की दुनिया से जुड़ा हुआ है.

डेस्कटॉप, लैपटॉप, गैलेक्सी नोट, मोबाईल...ये तमाम चीज़ें इंटरनेट से जुड़ने की उसकी जिज्ञासा को पूरा करने के लिए कम साबित होती हैं.

वो इंटरनेट का इस्तेमाल अपने होमवर्क या प्रॉजेक्ट्स के लिए तो करता ही है, लकिन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से उसे खासा लगाव है.

ऐसे में उनके माता-पिता को इस बात की चिंता सताती है कि उनके बच्चे इंटरनेट पर होने वाली विवादित गतिविधियों का शिकार न हो जाएं.

ध्रुव की मां, यामिनी मनोहर बताती हैं उनके बच्चों ने अब तक इंटरनेट पर किसी समस्या का सामना तो नहीं किया, लेकिन एक घटना ने उन्हें सचेत कर दिया था.

यामिनी ने बीबीसी को बताया, “एक बार मेरे बेटे ने किसी दूसरे बच्चे के फोन का इस्तेमाल कर फेसबुक पर लॉग ऑन किया, लेकिन वो लॉगआउट करना भूल गया. इसका फायदा उठा कर एक शरारती बच्चे ने उसके फेसबुक पेज पर लिख दिया कि वो किसी लड़की को प्यार करता है. इससे मेरे बच्चे के पेज पर बहुत से कमेंट्स आए, जिसकी वजह से उसे शर्मिंदा होना पड़ा.”

इस किस्से के बाद यामिनी को उस लड़की से माफी मांगनी पड़ी जिसके बारे में उनके बेटे के फेसबुक पेज पर लिख दिया गया था.

लेकिन उन्हें गुस्सा इस बात का है कि ऐसी शरारत करने वाले बच्चे के खिलाफ वे कोई कार्रवाई नहीं कर पाई क्योंकि भारत में ऐसी गलतियों को जुर्म नहीं माना जाता.

संवेदनशील हैं भारतीय बच्चे

सोशल नेटवर्किंग आजकल के बच्चों की ज़िंदगियों का एक अभिन्न हिस्सा बन गया है. लेकिन फेसबुक और ट्विटर जैसी बेहद लोकप्रिय वेबसाइट्स पर क्या सही है और गलत, इसका फैसला बच्चे नहीं कर पाते.

यामिनी के बेटे के साथ जो हुआ उसे इंटरनेट के शब्दकोष में ‘साइबर बुलिंग’ कहा जाता है.

साइबर बुलिंग यानि इंटरनेट पर किसी के बारे में आपत्तिजनक बातें लिखना, उन्हें शर्मिंदा करना, धमकाया जाना या फिर यूं ही परेशान किया जाना.

ध्रुव हंसते हुए कहता है, “ फेसबुक पर मेरे 222 ‘फ्रेंड्स’ हैं. मैं उनके साथ बहुत चैट करता हूं, पिक्चर शेयर करता हूं और अपने विचार भी शेयर करता हूं. जब मैं इंटरनेट से दूर होता हूं, तो मुझे बहुत खुजली होती है ये सोच कर कि कहीं फेसबुक पर कोई नया मेसेज तो नहीं आया. इसलिए मैं समय समय पर अपना फेसबुक पेज चैक करता रहता हूं.”

माइक्रोसॉफ्ट के मुताबिक भारत में 50 फीसदी से ज़्यादा बच्चे इंटरनेट पर साइबर बुलिंग का शिकार होते हैं और ज़्यादातर मामलों में उन्हें मालूम नहीं होता कि इसका सामना कैसे किया जाए.

नतीजा डिप्रेशन, अकेलापन या फिर कई मामलों में आत्महत्या.

टेलिनॉर द्वारा की गई एक स्टडी के मुताबिक साल 2012 तक भारत में चार करोड़ बच्चे इंटरनेट पर सक्रिय थे और 2017 में ये आंकड़ा तीगुना होकर 13 करोड़ हो जाएगा. यानि अगले चार सालों में ध्रुव जैसे नौ करोड़ और बच्चे इंटरनेट से जुड़ जाएंगें.

टाइम बम?

ऐसे में सवाल ये उठता है कि इन्हें साइबर बुलिंग से बचाने के लिए भारतीय कानून कितना सक्षम है?

भारत में साइबर क्राइम की चर्चा तो होती है, लेकिन साइबर बुलिंग से बच्चों को बचाने की चर्चा कम ही होती है.

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का मानना है कि भारत साइबर बुलिंग जैसी गंभीर को नज़रअंदाज़ कर रहा है.

उनका कहना है, “आज के संदर्भ में भारतीय कानून बच्चों को साइबर सुरक्षा प्रदान करने में पूरी तरह से अपंग है. बच्चों की सुरक्षा न तो भारतीय कानून का उद्देश्य है, और न ही इस बाबत कोई विशिष्ठ प्रावधान हैं. मुझे लगता है कि भारत के सूचना प्रोद्यौगिकी कानून को तुरंत संशोधित किए जाने की ज़रूरत है. 18 साल से कम के बच्चों की साइबर सुरक्षा के लिए विशिष्ठ प्रावधानों की आवश्यकता है.”

पवन दुग्गल का मानना है कि इंटरनेट पर बच्चों को साइबर बुलिंग का शिकार बनाने वाले बच्चों को कड़ी सज़ा होनी चाहिए ताकि उनमें इस बात का डर पैदा हो कि इसके परिणाम बहुत बुरे हो सकते हैं.

वैसे कई देशों में साइबर बुलिंग से बच्चों को बचाने के लिए हेल्पलाइन की व्यवस्था है, लेकिन भारत में ऐसा भी कोई इंतज़ाम नहीं है.

पवन दुग्गल का कहना है कि भारत एक ऐसी समस्या को नज़रअंदाज़ कर रहा है जो जल्द ही ‘टाइम बम’ बन कर फट सकती है.

उनका मानना है कि अगर भारत इंटरनेट की तेज़ रफ्तार को सही सुरक्षा मानकों के साथ नहीं पकड़ पाया, तो वो साइबर बुलिंग से रेस हार सकता है.

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