ऑपरेशन ब्लू स्टार: पहले और बाद का मंजर

भिंडरांवाले को सुनते हुए पत्रकार-लेखक खुशवंत सिंह
Image caption भिंडरांवाले सिखों की सर्वोच्च संस्था अकाल तख्त से लोगों के बीच अपने विचार रखने लगे

वर्ष 1983 की बात है. चंडीगढ़ में, शाम के समय कुछ मित्र गप्पे लड़ा रहे थे कि यकायक एक मित्र ने हँस कर पूछा - 'अरे भाई, आज का स्कोर क्या है?' ये सुनते ही सन्नाटा छा गया. क्योंकि, ये सवाल आए दिन चरमपंथियों की ओर से हो रही हिंसा पर था, जिसका निशाना हिंदू और उदारवादी सिख बन रहे थे. एक हिंदू दोस्त ने तल्ख अंदाज में एतराज जताया और बात हाथापाई तक पहुँच गई.

कुछ ऐसा ही उस दिन भी घटा जब ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान छह जून, 1984 को जरनैल सिंह भिंडरांवाले की मौत की खबर आई. पूरे पंजाब और चंडीगढ़ में कर्फ्यू लगा हुआ था और पूरा क्षेत्र सेना के हवाले थे. लेकिन चंडीगढ़ के सैक्टरों के भीतर, गली-महोल्ले में यार-दोस्त एकत्र हो जाते थे और मोटरसाईकिल पर गश्त लगा रहे सुरक्षाकर्मी इसे नजरअंदाज कर देते थे.

जब कुछ दोस्तों ने सैन्य ऑपरेशन पर खुशी का इजहार किया तो एक सिख मित्र पहले तो भौचक्का रह गया, फिर बहुत नाराज हुआ और फिर सभी के सामने बिलख-बिलख कर रोने लगा.

उसे भिंडरावाले से खास लगाव नहीं था, वो तो उसकी खूब आलोचना किया करता था. वो इस बात से आहत था कि सिखों के सबसे पावन धार्मिक स्थल हरिमंदिर साहब में फौज दाखिल हुई थी और अब वहाँ फौज का कब्जा था. हिंदू-सिख दोस्तों ने उसे गले लगाकर बहुत देर तक दिलासा दिया पर उसे शांत करना असंभव था.

पंजाब में उस समय दो-तीन साल से चल रहे घटनाक्रम ने समाज को लगभग पूरी तरह से विभाजित कर दिया था. पीढ़ियों और दशकों से चली आ रही सिखों और हिंदुओं की दोस्तियाँ खत्म तो नहीं हुई थीं, लेकिन कहीं न कहीं इन रिश्तों में दरार आने लगी थी. पारिवारिक रिश्ते भी इस तनाव से प्रभावित हुए थे और सिख-हिंदू बुजुर्ग तो आसपास जो घट रहा था, उसके बारे में एक दूसरे से ज्यादा बात करने तक से कतराते थे.

भिंडरांवाले: निरंकारी टकराव से ही सक्रिय

तनाव की शुरुआत तो प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली अकाली-जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के दौरान 13 अप्रैल 1978 को ही हो गई थी. अमृतसर में निरंकारी पंथ का एक सम्मेलन हो रहा था जिसके दौरान अकाली कार्यकर्ताओं और निरंकारियों के बीच झड़प हुई थी जिसमें 13 अकाली कार्यकर्ता मारे गए थे. इसके बाद रोष दिवस के दौरान सिखों के विरोध प्रदर्शन में धर्म प्रचार संस्था के प्रमुख जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.

Image caption अकालियों की उठाई पंजाब की मांगों और इसके साथ सिखों के साथ हो रहे कथित भेदभाद के मिश्रण से भरे भाषणों से भिंडरांवाले की लोकप्रियता बढ़ती चली गई

अकाली दल 1973 में ही आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पारित कर चुका था जिसके तहत पार्टी चाहती थी कि केंद्र सरकार रक्षा, विदेश नीति, संचार और मुद्रा पर नियंत्रण रखकर अन्य विषयों पर पंजाब को स्वायत्ता दे.

इस प्रस्ताव में - 'सिखी का बोलबाला' के जुमले को अनेक टीकाकारों ने 'अलगाववाद' के शंखनाद की संज्ञा दी थी. जब केंद्र में कांग्रेस के सत्ता में लौटने के बाद पंजाब में बादल सरकार को कई अन्य राज्य सरकारों सहित बर्खास्त किया गया तो उन्हें पंजाब संबंधी मांगे उठाने का फिस से मौका मिल गया. जब इन मांगों को, पंजाब और सिखों के साथ कथित भेदभाव के मिश्रण के साथ जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने पेश किया तो उसकी सिखों में लोकप्रियता बढ़ती चली गई.

मोटरसाईकिल पर सवार अज्ञात बंदूकधारियों ने पहले छिटपुट और फिर कई बड़ी हत्या की वारदातों को अंजाम देना शुरु किया. सितंबर 1981 में हिंद समाचार-पंजाब केसरी समूह के संपादक लाला जगत नारायण की हत्या हो गई. माहौल बिगड़ता चला गया और इसी के साथ सिख-हिंदू रिश्तों में तल्खी भी बढ़ती गई. जालंधर, तरन तारन, अमृतसर, गुरदासपुर, फरीदकोट और कई अन्य जगहों पर हिंसा हुई.

सिखों में भिंडरांवाले की लोकप्रियता बढ़ती गई और वे चौक महता गुरुद्वारे को छोड़, पहले हरिमंदिर साहब में गुरु नानक निवास और फिर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था अकाल तख्त से प्रचार करने लगे.

जहाँ कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार पर भिंडरांवाले के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बढ़ता गया वहीं पुलिस ने सबूतों को अपर्याप्त बताकर उन्हें हरिमंदिर साहब परिसर को अपना गढ़ बनाने दिया. जुलाई 1982 में अकालियों ने सतलुज-यमुना लिंक नहर के खिलाफ अपना मोर्चा छेड़ा और साथ ही भिंडरांवाले के समर्थन में भी बयान देने शुरु कर दिए. पूरे पंजाब में राजनीतिक माहौल गर्माने लगा.

डीआईजी की दिन-दहाड़े हत्या

अप्रैल 1983 में डीआईजी पुलिस एएस अटवाल की दिन-दहाड़े हरिमंदिर साहब परिसर में हमला करके हत्या कर दी गई. उसी साल जालंधर के पास बंदूकधारियों ने पंजाब रोडवेज से हिंदुओं को उतार कर उनकी हत्या कर दी. पुलिस का मनोबल गिरता चला गया. ये आम कहा जाने लगा कि यदि किसी नाके की ओर पुलिसकर्मी मोटरसाईकिल (बुलेट) आता देखते हैं तो वे इधर-उधर हो जाते हैं कि कहीं एक-47 से लैस चरमपंथी न आ रहे हों.

गाँव देहात, कस्बों और छोटे नगरों में तो लोगों ने सूर्यास्त के बाद घर से बाहर निकलना बंद कर दिया. बसों में रात का सफर बंद हो गया. अखबारों के दफ्तरों में धमकी भरे पत्र और पूरा बयान छापने की 'हिदायतें' आने लगीं.

हरिमंदिर साहब परिसर में भिंडरांवाले और उसके साथियों की मोर्चाबंदी और परिसर के बाहर सुरक्षाबलों की मोर्चाबंदी ने अमृतसर के उस इलाके को छावनी की शक्ल दे दी.

Image caption ऑपरेशन ब्लू स्टार अब भी सिखों के बीच संवेदनशील मुद्दा है और इस पर विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं

तीन जून 1984 से ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जो हुआ और उससे जुड़े विवादों पर तो अब 29 साल बाद भी चर्चा होती रहती है. हालाँकि, 1985 में अकालियों का सुरजीत सिंह बरनाला के नेतृत्व वाला गुट सत्ता में आया पर हालात बदतर ही होते चले गए.

सुरक्षाबलों का पलटवार

कई युवा सिखों में ऑपरेशन ब्लू स्टार के खिलाफ रोष व्याप्त था और इससे कई चरमपंथी गुट पैदा हुए. अलगाववाद और खालिस्तान इनका नारा था. पहले जुलियो रोबेरो और फिर केपीएस गिल के पुलिस प्रमुख बनने के बाद ही पुलिस के गिरते मनोबल में कुछ सुधार हुआ. लेकिन इसी के साथ पुलिस की कथित ज्यादतियों का दौर भी शुरु हुआ.

वर्ष 1988 से सैना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के संयुक्त अभियान के तहत अनेक युवाओं की धरपकड़ तेज हो गई. युवा चरमपंथियों की ओर से डकैती, अपहण, फिरौती मांगने के मामले जब बढ़े तो उन्होंने हिंदुओं और सिखों में कोई फर्क नहीं किया.

हिंदुओं के साथ-साथ अनेक सिख परिवार भी देहात और नगरों से पलायन कर या तो चंडीगढ़ या फिर पंजाब से बाहर जाने को मजबूर हो गए. इससे तथाकथित खालिस्तान की लहर को बड़ा धक्का लगा और धीरे-धीरे लोग पुलिस और सुरक्षाबलों को सुराग और जानकारी देने लगे.

पुलिस की बढ़ती धरपकड़ से परेशान सैकड़ों सिख युवा, जिनमें से कई का खालिस्तान की लहर से कोई खास वास्ता न था, देश छोड़कर यूरोप और अमरीका-कनाडा चले गए.

पुलिस प्रमुख और फिर सरकार के सुरक्षा सलाहकार रहे केपीएस गिल के नेतृत्व में 1991-1995 के बीच खालिस्तानी लड़ाकों के खिलाफ चलाया गया अभियान अपने चरम पर था. इसी दौरान मुठभेड़ों का दौर चला और कई खालिस्तानी गुटों के बड़े-बड़े नेता कथित मुठभेड़ों में मारे गए और चरमपंथी लहर ठंडी पड़ गई.

हालाँकि वस्सन सिंह जफरवाल जैसे कई खालिस्तानी विदेशों से भारत लौट आए और सबूतों के अभाव में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं हुई. लेकिन अनेक लोग हिंसक या फिर भारत-विरोधी प्रचार के आरोप में भारत सरकार की ब्लैकलिस्ट में हैं और उन्हें भारत आने की इजाजत नहीं है.

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