'पुरुषों के हाथ 'इधर-उधर भटके' तो खैर नहीं'

  • 21 मार्च 2013
कलकत्ता मेट्रो
Image caption कलकत्ता मेट्रो में रोज़ करीब सवा छह लाख लोग यात्रा करते हैं.

कोलकाता में रहने वाली राधिका (बदला हुआ नाम) इनदिनों मेट्रो में यह देखने के लिए सफ़र करती हैं कि पुरुष वहाँ कैसा व्यवहार करते हैं. कभी राधिका पुलिस की वर्दी में होती है. लेकिन अधिकतर समय वे महिला यात्रियों में घुल-मिल जाने के लिए सलवार-कमीज़ या साड़ी पहनकर सफ़र करती हैं.

जैसे ही उन्हें पता चलता है कि कोई व्यक्ति परेशानी खड़ी करने जा रहा है या जिसके हाथ इधर-उधर भटक रहे हैं, वह उस व्यक्ति के पास जाती है और उससे शांतिपूर्वक ट्रेन से उतर जाने को कहती हैं.

कुछ लोग तो इसका मासूमियत से विरोध करते हैं. लेकिन अधिकांश लोग शर्मिंदा होकर ट्रेन से उतर जाते हैं.

नई दिल्ली में चलती बस में 23 साल की एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उसकी मौत के बाद देशभर में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई ज़रूरी क़दम उठाए जा रहे हैं.कोलकाता मेट्रो में भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए ख़ास क़दम उठाए गए हैं.

देश की सबसे पुरानी कलकत्ता मेट्रो में पुलिस अधिकारियों (10 पुरुष और 10 महिला) का एक दल यह सुनिश्चित करने के लिए गश्त लगाता है कि पुरुष अपना हाथ अपने पास ही रखें.

महिलाओं की सुरक्षा

अपने आसपास हो रही गतिविधियों पर नज़र रखते हुए वह मुझसे कहती हैं, "यह केवल नौकरी नहीं है, मुझे लगता है कि यह उन बदलावों को हिस्सा है जो भारत को आगे ले जाएंगे."

राधिका कहती हैं,''पुरुष अब ट्रेन में महिलाओं को परेशान करने से डरते हैं.क्योंकि उन्हें पता है कि हम सादी वर्दी में यात्रा कर रहे हैं और वे पकड़ लिए जाएंगे.''

कोलकाता मेट्रो से प्रतिदिन क़रीब सवा छह लाख यात्री सफ़र करते हैं. यह शहर में यात्रा करने का सबसे सस्ता साधन है और केवल छह रुपए का खर्च आता है.

इसका मतलब यह हुआ कि गाड़ी के डिब्बे यात्रियों से खचाखच भरे होते हैं और यह असंभव है कि आपका शरीर आसपास के यात्रियों से न टकराए.

Image caption दिल्ली की घटना के बाद देशभर में बलात्कारियों को फांसी की सज़ा देने की मांग की जा रही है.

मेट्रो के उप महाप्रबंधक प्रत्युष कुमार घोष कहते है,''इस भूमिगत ट्रेन में बैठने के लिए एक सीट पा जाना, उतना ही कठिन है जितना लॉटरी निकलना. यह कई पुरुषों को महिलाओं से छेड़छाड़ करने का मौक़ा भी देता है.''

नई दिल्ली में युवती के बलात्कार के बाद हुई मौत की घटना के बाद से देशभर में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बहस चल रही है.

इस घटना के बाद से कलकात्ता मेट्रो में सफ़र का अपना अनुभव बताने के लिए बहुत सी महिलाएं सामने आई हैं.

प्रत्युष कुमार घोष कहते हैं,''शिकायतों की संख्या जैसे ही बढ़ी, हमने भारत की सबसे पुरानी मेट्रो को सुरक्षित बनाने के लिए क़दम उठाए.''

हम सादी वर्दी में पुलिस की योजना लेकर आए. इसका प्रभाव भी पड़ रहा है.

फ़रवरी में महिलाओं से छेड़छाड़ के आरोप में पांच पुरुषों को गिरफ्तार किया गया और इस तरह के 30 मामले सामने आए. यह जनवरी के मुक़ाबले 50 फ़ीसदी कम है.

पुरुषों का भय

घोष कहते हैं,'' परेशानी खड़ी करने वालों को अब पकड़े जाने का भय है और वे अपना व्यवहार बदल रहे हैं.''

जब मैंने उनसे पूछा कि ऐसे डिब्बे में जहां किसी दूसरे यात्री से छुए बिना रहना मुश्किल है, ऐसे में आप कैसे बता पाएंगी कि कौन कैसे छू रहा है,''मैं एक औरत हूं. मैं यह जानती हूं कि जब कोई पुरुष किसी महिला को दो या तीन बार छू रहा है तो वह संयोगवश नहीं है.''

सृष्टि दास 21 साल की है, वह मेट्रो में रोज़ाना यात्रा करती है.

दास कहती हैं, "काम के बाद जब मैं देर से घर लौटती हूँ तो माता-पिता चिंतित हो जाते हैं. मेट्रो में जिस तरह कुछ पुरुष घूरते हैं या छूने की कोशिश करते हैं, उससे मैं घृणा करती हूँ."

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