क्यों दम तोड़ रहे हैं दादी नानी के क़िस्से

  • 24 मार्च 2013
पारंपरिक कहानियों में घटती दिलचस्पी
Image caption पारंपरिक कहानियों में घटती दिलचस्पी

भारत में सदियों से घर के बड़े बुज़ुर्ग कहानियों के ज़रिए बच्चों को अपने प्राचीन क़िस्से-कहानी, परंपराएं और संस्कार देते रहे हैं. हालांकि अब बढ़ते वैश्वीकरण और मीडिया के अंधाधुंध असर के कारण कहानी सुनाने की ये परंपरा शायद तम तोड़ रही है.

तमिलनाडु के तंजावुर क़स्बे के पनायाकोट्टी गांव में कुछ गृहणियां एक बरगद के नीचे बैठी हुई हैं.

ये महिलाएं अपने गांव की लोककथाएं सुना रही हैं और बीच-बीच में उनमें गीत भी जोड़ देती है.

चेन्नई से इस गांव में पहुंचे लोककथा, कहावतों और कहानी सुनाने की विधा में दिलचस्पी रखने वाले कई विशेषज्ञ इन महिलाओं को बड़े ध्यान से सुन रहे हैं.

ये लोग गीतों के साथ कहानी कहने की इस शैली यानी कथैयुम पाट्टुपम का अध्ययन करने आए हैं.

घटती दिलचस्पी

51 वर्ष की इलानजियम कहती हैं, “शायद ही अब कोई इन कहानियों को सुनाता है. इन्हें सुनने में दिलचस्पी रखने वाले लोगों की संख्या भी बहुत कम बची है. असल में तो इन्हें सुनाने के लिए अब हमें भी दिमाग़ी तौर पर ख़ासी माथापच्ची करनी पड़ती है क्योंकि बहुत समय हो गया है जब हम इन्हें सुनाते थे.”

कहानियां सुनाना पीढ़ियों से भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा रहा है, भले ही उन्हें अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग ढंग से सुनाया जाता हो.

तमिलनाडु में गीतों के साथ कहानी सुनाने की और भी शैलियां है जैसे कथा कलक्षेपम. लेकिन विशेषक्ष कहते हैं कि कथैयुम पाट्टुपम कहानी को कहने का कहीं ज्यादा अनौपचारिक तरीक़ा है.

चेन्नई के लोककथा विशेषज्ञ एरिक मिलर कहते हैं, “इस तरह की कहानियां पारंपरिक तौर पर पहले गांवों में सुनाई जाती थीं. इनका मक़सद घर पर बच्चों को कई तरह की नैतिक शिक्षाएं देना होता था.”

टीवी का दबदबा

35 वर्षीय भानुमती को याद है कि जब वो बच्ची थी तो कैसे उनके पिता उन्हें कहानियां सुनाया करते थे. ये कहानियां ज्यादातर या तो धार्मिक हुआ करती थीं या फिर स्थानीय ग्रामीण क़िस्से.

वो बताती हैं, “जो कहानियां और गीत मैंने बचपन में सीखे, वो बड़े होने पर भी मुझे याद हैं. जब मैं खेत में काम करने जाती थी तो उन्हें गाती थी. यहां तक कि आज भी मैं वक़्त बिताने के लिए अपने दोस्त को उन्हें बताती हूं.”

लेकिन वो इन कहानियों को अपने घर पर नहीं सुनाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इसका कोई फ़ायदा नहीं है.

Image caption बहुत सी कहानियां पौराणिक कथाओं पर आधारित होती हैं

उनका कहना है, “मेरे बच्चे इनका मज़ाक़ उड़ाते हैं. वो कहते हैं कि ये कहानियां बेसिर पैर की हैं और बहुत ऊबाऊ हैं. इनकी बजाए वो टीवी देखना पसंद करते हैं. तो इन कहानियों को मैं अपने आप तक ही रखती हूं.”

अब उपग्रह टीवी चैनल दूर दराज़ के गांवों में भी पहुंच रहे हैं तो पारंपरिक तौर पर कहानी सुनाने के चलन की जगह अब टीवी चैनल लेते जा रहे हैं.

लोककथा विशेषज्ञ अरु रामानाथन कहते हैं, “अब गांव के बच्चे भी कार्टून और टीवी शो देखते हैं. अपनी सांस्कृतिक पहचान को जानने की बजाय वो ऐसी दुनिया में जीते हैं जहां की कहानियों का उनके परिवेश से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है.”

'ज्यादा प्रासंगिकता'

शहरों में जहां बच्चों के पास मनोरंजन के लिए टीवी के अलावा इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन और अन्य गैजेट्स हैं, वहां कहानी कहने के चलन को बनाए रखना और चुनौतीपूर्ण है.

लेकिन मिलर मानते हैं कि कहानी सुनाने के पारंपरिक तरीक़ों की प्रासंगिकता और महत्व अब पहले से कहीं ज्यादा है.

वो कहते हैं, “आज शहरों में बहुत से बच्चे इलाज कराने को मजबूर हैं क्योंकि वो चीज़ों पर उचित तरह से ध्यान न दे पाने की विकृति का शिकार हैं. कहानी सुनाने की विधा उनके बैठने और किसी चीज को सुनने की क्षमता को बेहतर बना सकती है, ख़ास कर अगर वो दिलचस्प तरीक़े से कही जाए और उनमें दिलचस्प गीत भी हों.”

भारत में बढ़ते शहरीकरण और संयुक्त परिवारों के विघटन के मद्देनज़र बच्चों अपने दादा-दादी या दूसरे रिश्तेदारों के साथ ज्यादा समय बिताने को नहीं मिलता है.

पनायाकोट्टी में 52 वर्षीय दनयानसुंदरी का कहना है कि वो अपने नाती के साथ बहुत ही कम समय बिता पाती हैं जो पास ही तंजावुर में अपने मातापिता के साथ रहता है.

वो कहती हैं, “मैं अपनी बेटी से लगातार कहती हूं कि वो कहानी सुनाने के चलन को बनाए रखे. अगर आप कोशिश करें तो इसमें बच्चों की दिलचस्पी होगी. हमें उन्हें इस तरह कहानी सुनानी होगी कि उन्हें इसमें मज़ा आए.”

दनयानसुंदरी का कहना है कि जितनी कहानियां और गीत उन्हें आते हैं, उन्होंने वो लिख लिए हैं. वो कहती हैं, “मेरी बेटी कहती है कि उसके पास समय नहीं होता है, लेकिन मुझे भरोसा है कि जब मैं चली जाऊंगी तो वो ऐसा करेगी.”

हालांकि अन्य लोगों को कम ही उम्मीद हो लेकिन विशेषज्ञ ऐसे तरीक़े तलाशने में जुटे हैं ताकि बदलते वक़्त में कहानी कहने की परंपरा में नई जान फूंकी जा सके.

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