यूपीए पर कठोर क्यों हुए मुलायम?

  • 25 मार्च 2013
मुलायम सिंह यादव

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल में उनकी डूबती नैया को ऐसे वक़्त में उबारा था जब अमरीका से सहयोग के मामले में वामपंथियों ने समर्थन वापिस ले लिया था.

उत्तर प्रदेश के ये घिसे हुए राजनेता दोबारा यूपीए की मदद के लिए तब आगे आए जब रिटेल में विदेशी निवेश के मुद्दे पर तृणमूल काँग्रेस की ममता बनर्जी ने सरकार को झटका दिया.

और अब जब यूपीए के दूसरे बड़े पार्टनर डीएमके ने अपना हाथ खींच लिया है तो मनमोहन सिंह सरकार मायावती के साथ साथ मुलायम की बैसाखी पर टिक गई है.

यूपीए के वज़न को अपने कंधे पर मुलायम ने उठाया तो ज़रूर है पर उनकी कठोरता ने मनमोहन सिंह सरकार का चैन छीन लिया है.

मुलायम सिंह यादव के मुख से उनके राजनीतिक विरोधी माने जाने वाले बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ़ ने बहुत लोगों को अचरज में डाल दिया.

पिछले हफ़्ते लखनऊ में समाजवादी पार्टी के एक समारोह में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि लालकृष्ण आडवाणी चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार चले. पर उन्होंने कहा है कि राज्य में भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है.

मुलायम का अगला वाक्य दिलचस्प था. उन्होंने कहा, “आडवाणी जी कभी झूठ नहीं बोलते. उन्होंने ऐसा कहा है तो मैं उनसे पूछूँगा.”

नए समीकरण?

Image caption मुलायम सिंह यादव के कुछ बयानों ने यूपीए को सोच में डाल दिया है.

कई विश्लेषकों ने यूपीए सरकार का अहम सहारा बन चुके मुलायम के इस बयान को आडवाणी की तारीफ़ से ज़्यादा नरेंद्र मोदी को ख़ारिज करने की कोशिश के तौर पर देखा है.

लेकिन मुलायम इससे पहले भी संसद में भारतीय जनता पार्टी के प्रति अपनी नई-नई कोमल भावनाओं का इज़हार कर चुके थे.

एक बहस के दौरान उन्होंने हाल ही में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह से कहा था कि अगर कश्मीर जैसे मसलों पर आपकी पार्टी अपनी राय बदल ले तो हममें और आपमें राष्ट्रीय सुरक्षा, भाषा आदि मुद्दों पर कोई मतभेद नहीं है.

क्या इन नज़दीकियों को 2014 के आम चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरणों का संकेत माना जाए?

वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़निस मानती हैं कि अभी 2014 में बहुत देर है और तब के राजनीतिक समीकरणों का अंदाज़ा अभी से नहीं लगाया जा सकता.

पर वो ये ज़ोर देकर कहती हैं कि मुलायम सिंह यादव की राजनीति में एक पहलवान के दाँवपेंच होते हैं.

अदिति फड़निस ने बीबीसी से कहा, “मुलायम सिंह यादव कुश्ती के पारंगत खिलाड़ी रहे हैं. चाहे राजनीति हो या दल परिवर्तन हो या नेतृत्व की बात हो वो हमेशा ऐसा करते रहे हैं. एक ज़माने में मुलायम सिंह ने चंद्रशेखर का साथ दिया था पर फिर तुरंत देवी लाल के साथ चले गए. चौधरी चरण सिंह ने उनकी मदद की मगर फिर उनकी पीठ पर छुरा घोंपने वाले मुलायम ही थे.”

झुकाव किस ओर?

अदिति फड़निस ही नहीं कई और विश्लेषक भी मानते हैं कि मुलायम सिंह के एक-एक शब्द पर इन दिनों सबकी नज़र है.

ख़ास तौर पर राहुल गाँधी और वामपंथी पार्टियाँ उनके बयानों पर काफ़ी ग़ौर कर रही हैं.

लालकृष्ण आडवाणी की तारीफ़ को कई लोग मुलायम सिंह के राजनीतिक दाँव के तौर पर देखते हैं और इसे नरेंद्र मोदी का क़द छोटा करने की कोशिश मानते हैं.

पर अदिति फड़निस कहती हैं कि नरेंद्र मोदी अगर मज़बूत हुए तो उसका चुनावी फ़ायदा मुलायम सिंह यादव को होगा क्योंकि मोदी को बाँटने वाले नेता के तौर पर देखा जाता है और विकल्पहीनता की स्थिति में मुसलमान मुलायम को ही मज़बूत करना चाहेंगे. क्योंकि किसी भी हाल में वो नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना चाहते.

इसीलिए नरेंद्र मोदी के ख़ेमे के लोग इंतज़ार कर रहे हैं कि मुलायम सिंह कुछ ऐसी बात कहें जिससे नेतृत्व पर नरेंद्र मोदी का दावा और पुख़्ता हो जाए.

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