मुलायम सिंह की पांच उलटबांसियां

मुलायम सिंह यादव

समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने काँग्रेस को धोखेबाज़ और चालाक पार्टी बताया है, लेकिन ऐसे कई उदाहरण हैं जब ख़ुद उन्होंने अपने अगले राजनीतिक क़दम की हवा नहीं लगने दी है और बदलती हवा का रुख़ भाँपकर दोस्तों को दुश्मन और दुश्मनों को दोस्तों की जमात में डाल दिया.

चौधरी चरण सिंह

मुलायम सिंह यादव यूँ तो बचपन से पहलवानी करते रहे हैं पर राजनीति के अखाड़े में कई दाँव-पेंच उन्होंने राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह से सीखे. उन्हीं के साथ मुलायम ने काँग्रेस-विरोधी राजनीति की धार को और तीखा किया.

चौधरी चरण सिंह ने उनको उत्तर प्रदेश की राजनीति में जड़ें जमाने में काफ़ी मदद की. मुलायम सन 1967 में पहली बार राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) के टिकट पर विधायक चुने गए. पर लोहिया की मृत्यु के तुरंत बाद 1968 में वो चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाली भारतीय क्रांति दल में शामिल हो गए.

बाद में संसोपा और भारतीय क्रांति दल का विलय करके भारतीय लोकदल बनाया गया. मुलायम सिंह ने इस पार्टी पर अपनी पकड़ मज़बूत की और 1977 में जब बीएलडी का जनता पार्टी में विलय हुआ तो मुलायम सिंह मंत्री बन गए.

पर उन्होंने चरण सिंह की मृत्यु के बाद उनके बेटे अजित सिंह का नेतृत्व स्वीकार करने से साफ़ इनकार कर दिया और भारतीय लोकदल को तोड़ दिया.

चंद्रशेखर

सन 1989 के चुनावों में राजीव गाँधी का करिश्मा उतार पर था और ये माना जा रहा था कि वो चुनाव नहीं जीत पाएँगे. बोफ़ोर्स कांड के आरोपों ने उनकी स्थिति और ख़राब कर दी थी.

ऐसे में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने काँग्रेस से बग़ावत कर दी. चुनाव के बाद जनता दल की सरकार बनाने की क़वायद शुरू हुई. लेकिन चुनौती तब पैदा हुई जब चंद्रशेखर ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के लिए जोड़-तोड़ करने लगे.

उस वक़्त के दूसरे खुर्राट नेता देवीलाल उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ थे. तब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के उभरते राजनेता थे और चंद्रशेखर के साथ खड़े थे.

मगर ऐन वक़्त पर मुलायम पलटे और देवीलाल के साथ चले गए. चंद्रशेखर टापते रह गए और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बन गए. वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़निस उस दिन को अब भी याद करती हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “चंद्रशेखर बहुत ग़ुस्से में थे और उन्होंने सेंट्रल हॉल से निकलते हुए पत्रकारों से कहा कि अपने ही सबसे ज़ोर से हमला करते हैं."

वामपंथी

Image caption वामपंथी पार्टियाँ मुलायम सिंह यादव को भरोसे का राजनेता नहीं मानतीं.

बाबरी मस्जिद ध्वंस से पहले और उसके बाद मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी को मुसलमानों की ख़ैरख़्वाह पार्टी के तौर पर पैर जमाने में मदद की.

उस दौर में, और एक मायने में अब भी, बहुतेरे मुसलमान मुलायम को अपने नेता के तौर पर देखते हैं. संघ परिवार के ख़िलाफ़ मुलायम के कड़े रुख़ के कारण वामपंथी भी उन्हें अपने मित्र के तौर पर देखते थे.

लेकिन अमरीका से नागरिक परमाणु समझौते के मुद्दे पर जब वामपंथियों ने मनमोहन सिंह की जान सांसत में डाली और समर्थन वापिस ले लिया तो विचारधारा जैसी बातों से पल्ला झाड़कर मुलायम सिंह यादव ने मनमोहन सिंह की सरकार को गिरने से बचा लिया.

पत्रकार अदिति फड़निस कहती हैं कि इसी कारण वामपंथी मुलायम सिंह को विश्वसनीय नहीं मानते. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सोनिया गाँधी भी मायावती को मुलायम सिंह के मुक़ाबले ज़्यादा विश्वसनीय मानती है.

ममता बनर्जी

हाल ही में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान मुलायम सिंह यादव ने ऐतिहासिक पलटी मारी.

जब ममता बनर्जी तीखे तेवर दिखा रही थीं, तब मुलायम सिंह यादव ने यूपीए सरकार की कँपकँपी को बढ़ाते हुए ममता के साथ संयुक्त प्रेस कॉनफ़्रेंस की और इस तरह के संकेत दिए कि यूपीए के लिए राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करना आसान नहीं होगा.

उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के नाम राष्ट्रपति पद के लिए प्रस्तावित किए थे.

लेकिन दो दिन बाद ही मुलायम सिंह यादव इस बात को भूल गए और ममता बनर्जी को ग़च्चा देकर यूपीए के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को समर्थन करने की घोषणा कर दी.

Image caption मुलायम सिंह के दाँवपेंच का स्वाद ममता बनर्जी भी चख चुकी हैं.

बाद में जब उनसे पूछा गया कि दो दिन पहले ही उन्होंने तीन अलग नाम सुझाए थे जिनमें मनमोहन भी शामिल थे, तो मुलायम सिंह ने ये कहकर किनारा कर लिया कि वो सिर्फ़ सुझाव था.

और अब यूपीए

ऐसा नहीं है कि यूपीए के मैनेजर मुलायम सिंह यादव पर किसी भी तरह से भरोसा करते हों. ये बात ठीक है कि समाजवादी पार्टी ने मनमोहन सिंह की डाँवाडोल सरकार को गिरने से बचाया था, लेकिन बहुत कम लोग ये मानते हैं कि इस सहारे की मुलायम सिंह ने कोई (राजनीतिक) क़ीमत वसूल नहीं की होगी.

मुलायम सिंह का साथ छोड़कर काँग्रेस में शामिल हुए बेनी प्रसाद वर्मा से बेहतर इस बात को कोई नहीं जानता कि मुलायम सिंह ने अपनी राजनीतिक पार्टी के हित को किस तरह विचारधारा और सिद्धांत से हमेशा ऊपर रखा है.

दोनों भारतीय लोकदल के ज़माने से ही साथ में थे और दोनों ने ही मिलकर चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह को किनारे कर दिया था. लेकिन बेनी प्रसाद वर्मा को पिछले दशक के बीच में एहसास हो गया कि मुलायम नामक वटवृक्ष के साए में वो पनप नहीं पाएँगे.

इसीलिए वो समाजवादी पार्टी से निकल आए.

पत्रकार अदिति फड़निस कहती हैं कि ये बात माननी पड़ेगी कि मुलायम सिंह यादव लोगों की नब्ज़ को जानते हैं और वो हमेशा धरती से जुड़े रहते हैं.

इसीलिए एक बार उन्होंने मुस्लिम वोट बैंक के ख़जांची समझे जाने वाले मौलाना अब्दुल्ला बुख़ारी को नपे तुले शब्दों में जवाब दे दिया था कि आपका काम मस्जिद के अंदर है, बाहर राजनीति का काम हमारा है और हम उसे करेंगे.

इस बयान के बावजूद मुसलमानों का समर्थन और वोट मुलायम सिंह यादव को मिला और वो जीते.

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