मूछें नत्थूलाल जैसी, सवारी हो तो बुलेट जैसी

  • 30 मार्च 2013
बुलेट, रॉयल इन्फील्ड
Image caption बुलेट एक खास तबके की पसंदीदा मोटरसाइकिल रही है.

मूंछे हो तो नत्थूलाल जैसी, सवारी हो तो बुलेट जैसी… ये कहावत मोटरसाइकिल प्रेमियों के बीच नई नहीं है. ब्रिटेन के स्मॉल आर्म्स फैक्टरी में जन्मी रॉयल एन्फील्ड मोटरसाइकिल यानी बुलेट आज दुनियाभर में एक प्रतीक के रुप में स्थापित हो चुकी है.

प्रतीक खुलेपन का, आज़ाद ख्याली का और भीड़ से अलग हो जाने का.

सवा सौ साल के इतिहास वाले इस मोटरसाइकिल ब्रांड ने दोनों विश्व युद्ध का घमासान भी देखा है और सैकड़ों उतार चढ़ाव भी.

पुलिस से लेकर फौज़ तक

साल 1970 में रॉयल एन्फील्ड ने ब्रिटेन समेत दुनियाभर में अपना उत्पादन रोक दिया, लेकिन भारत में इसका उत्पादन जारी रहा.

भारत में पुलिस फोर्स से लेकर सेना तक ने अपनी कठिन जीवनशैली में शामिल करने के लिए लोहे से बनी बुलेट को कारगर पाया.

पीढ़ियों से रॉयल एन्फील्ड मोटरसाइकिलों के शौकीन अनुज वशिष्ठ कहते हैं, “मै जब छोटा था तो पिताजी की बुलेट को बर्डी कहता था, आज मेरा बेटा जब बड़ा हो रहा है तो वो उस बुलेट को ग्रैनी कहता है. बुलेट कई वर्षों से हमारे परिवार का हिस्सा है.”

लेकिन कुछ दशक पहले तक बाइक प्रेमियों के बीच बुलेट का जितना नाम था उतना ही ये बदनाम भी था. पुरानी तकनीक से बनी इस बेहद वजनी गाड़ी की आलोचना भी खूब हुई.

'बाइक न होकर लाइफ़स्टाइल'

Image caption बुलेट का बहुत सारा काम हाथों से किया जाता है.

लेकिन बुलेट के दीवाने बुलेट के दीवाने ही रहे.

वक्त के साथ कंपनी ने बुलेट में कई तकनीकी बदलाव भी किए, लेकिन आवाज़ और ताकत से छेड़छाड़ कम ही हुई.

भारत सहित दुनिया के अन्य देशों में आज भी भारत में बनी बुलेट निर्यात की जाती है.

प्रोफ़ेशनल बाइकर सपन अपनी बुलेट ‘क्लासिक’ मोटरसाइकिल को अपना एक हिस्सा मानते है.

वो कहते है, “ये मेरे लिए सिर्फ एक बाइक न होकर मेरी लाइफ़स्टाइल भी है. इस पर सवार होकर लगता है कि मुझ में ही पहिए लग गए हो. मेरे हिस्से जैसा है ये.”

कई दिनों का इंतज़ार

इस हैन्डक्राफ़्टेड बाइक की खुद भारत में इतनी मांग है कि ग्राहकों को इसके लिए कई दिनों का इंतज़ार करना पड़ता है.

भारतीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में कई सस्ते और उन्नत तकनीक के विकल्प मौजूद होने के बाद भी रॉयल एन्फील्ड मोहल्ले के दूधवाले से लेकर प्रोफ़ेशनस बाइक राइडर्स की पसंद बनी हुई है.

भारतीय सड़कों पर बुलेट वर्षों से शान और रुतबे का परिचायक बनकर दौड़ता रहा.

लेकिन खास बात ये है कि जिस कंपनी का नामोनिशान खुद उसके देश से सालों पहले उजड़ गया वो भारत में आज भी कायम है.

संबंधित समाचार