बिहार में धान की उपज के विश्व रिकॉर्ड का सच

  • 29 मार्च 2013
सुमंत कुमार
Image caption सुमंत कुमार ने जब श्री विधि से धान बोया तो लोगों ने उनका 'मज़ाक उड़ाया था.'

सकरी नदी के बांई तरफ़ बसे दरवेशपुरा के बड़े-बूढ़े साठ और सत्तर के दशक में भी ‘जब्बरजस्त फसल’ की बात याद करते हैं, ‘जब गांव का आलू बंबई तक जाता था’ और ‘बित्ते-बित्ते भर का मरीच उगता था’, अब गांव की ख़ासियत बखान करने वाली इन कहानियों में दो और इज़ाफ़ा हो गया है.

बिहार के नांलदा ज़िले की इन दोनों घटनाओं पर सरकारी मुहर भी लगी है.

राज्य सरकार ने ‘तीन बार की जांच के बाद’ दावा किया कि गांव के एक नौजवान सुमंत कुमार के खेत में धान की फसल का ‘विश्व रिकॉर्ड ’ बना है.

पिछला ‘विश्व रिकॉर्ड ’ 19.4 टन प्रति हेक्टेयर उपज के साथ चीन के कृषि वैज्ञानिक युआन लॉंगपिंग का था.

बिहार सरकार का कहना है कि दरवेशपुरा के सुमंत कुमार के खेत में प्रति हेक्टेयर 22.4 टन धान पैदा हुआ.

हालांकि छरहरे बदन के सुमंत कुमार कहते हैं कि उन्हें तो मालूम भी नहीं था कि ‘धान और आलू का भी कोई विश्व रिकॉर्ड होता है’, हां उनके ‘खेत बुआई के छब्बीसवें दिन से ही औरों से अलग दिखने लगे थे.’

‘एक पेड़ से धान होता है?’

अपने पक्के घर के सामने की गली में बैठकर हमसे बात करते हुए सुमंत कुमार कहते हैं, ‘नौकरी छोड़कर खेती में आना एक चैलेंज था.’

‘जब अस्टार्टिंग में लगा रहे थे तो सब कह रहे थे, होने वाला नहीं. एक पेड़ से धान होता है? पहले पांच-पांच पौधे साथ बोते थे.’

बुआई के समय धान के एक-एक पौधे को अलग-अलग और ख़ास दूरी पर लगाने की जिस पद्धति को सुमंत कुमार ने अपनाया था उसे ‘सिस्टम ऑफ़ राइस इंटेन्सिफिकेशन’ कहते हैं. इस तरह की खेती में बीज को अलग तरीक़े से तैयार करने के अलावा, सिंचाई भी पारंपरिक तरीक़े से अलग ढंग से की जाती है.

रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड

Image caption नितिश कुमार ने आलू की बंपर पैदावार कर दरवेशपुरा को दोबारा चर्चा में ला दिया.

दरवेशपुरा में सुंमत के कारनामे के छह माह बाद गांव के एक किसान आलू की पैदावार में भी 'विश्व रिकार्ड' बना डाला.

किसान नीतीश कुमार न् बताया, “मेरा बेटा खेत से आलू कबाड़ (उखाड़) के ला रहा था, तो गांव के कुछ लोग उसको देखे, और सात-आठ सौ ग्राम के एक-एक आलू देख उसको पकड़ के पंचायत भवन में ले आए, पंचायत शिविर में एसडीएम साहब भी थे, और बात जिला परसासन तक पहुंच गई.”

वो कहते हैं, दो-तीन दिन बाद ही कृषि विभाग और दूसरे कई जगहों से लोग आए, मेरे खेत में क्रॉप कटिंग की गई, और लोगों ने कहा कि तुम्हारे खेत में 72.9 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार हुई है.

सरकारी प्रचार और सवाल

सिर पर चेक की डिज़ाइन वाल गमछा बांधे नीतीश कुमार कहते हैं कि जब सरकारी कृषि सलाहकार ने उनसे ‘खेती में चेंज की बात की और नई विधि अपनाने को कहा तो वो बहुत डरे हुए थे, और इसलिए सिर्फ़ बीघे भर में ही नए ढंग से धान की रोपनी और खेती की, और सामान्य से ज्यादा ख़ून-पसीना एक किया, लेकिन बाद में रिजल्ट अच्छा रहा.’

हालांकि मुख्यमंत्री के गृह ज़िले नालंदा में एक के बाद बने दूसरे विश्व रिकॉर्ड और हुकूमत की इसमें दिलचस्पी को लेकर कई हल्क़ों में पूरे मामले को नीतीश कुमार सरकार के प्रोपगंडा के तौर पर भी देखा जा रहा है.

Image caption मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह ज़िले में एक के बाद एक रिकॉर्ड बनने की वजह से सवाल खड़े हो रहे हैं.

अपना रिकार्ड टूटने के बाद चीनी कृषि वैज्ञानिक युआन लॉंगपिंग नए रिकॉर्ड के दावे पर संदेह जताया. उन्होंने कहा कि कम पैदावार देने वाले खेतों में इस पद्धति से फ़सल में 10 से 15 फ़ीसद की बढ़ोतरी की जा सकती है, लेकिन पहले से ही बढ़िया फ़सल दे रही भूमि में ये कारगर नहीं होगा.

कहां हो सकती है ग़लती?

भारत में खेती पर शोध से जुड़ी सबसे बड़ी संस्था, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के कृषि अर्थशास्त्री कृष्ण मोहन सिंह हालांकि विश्व रिकॉर्ड के मामले पर किसी तरह की टिप्ण्णी करने से गुरेज़ करते हैं, लेकिन इतना मानते है कि क्राप कटिंग के लिए जो पूरा फ़ार्मूला है, अगर उसमें दो चार-दाने का फ़र्क़ भी पड़ जाए, तो पूरे अनुमान में भारी अंतर आ सकता है.

बिहार सरकार की दलील है कि राज्य में भूमि की उत्पादकता बहुत नीचे रही है, और जो सामने आ रहा है उसे उपज में बढ़ोतरी की महज़ शुरूआत के तौर पर देखा जाना चाहिए.

हालांकि कृष्ण मोहन सिंह मानते हैं कि श्री विधि के माध्यम से उपज में भारी वृद्धि संभव है, और ये शोध में साबित हो चुका है.

बिहार में फ़िलहाल धान का औसत उत्पादन ढ़ाई टन प्रति हेक्टेयर है. कुछ साल पहले तक ये डेढ़ टन हुआ करता था.

भोजन की सुरक्षा

Image caption सरकार का कहना है कि लोग धान के अलावा श्री विधि को दूसरी फ़सलों में भी अपना रहे हैं.

उन्नीस सौ साठ के दशक में भारत में हुई हरित क्रांति से उत्पादन तो बढ़ा लेकिन खेती बाड़ी की बढ़ती लागत को लेकर इसकी आलोचना भी होती है. ऐसे में किसान कर्ज़ के बोझ के नीचे दबता जा रहा है.

कृष्ण मोहन सिंह ज़ोर देकर कहते हैं, “अगर ये तरीक़ा ज़्यादा बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है तो पूरे भारत की खाद्य की समस्या को देश का पूर्वी क्षेत्र ही मिटा सकता है.”

हाल में नालंदा के दौरे पर गए जाने माने ब्रितानी अख़बार गार्डियन के पर्यावरण संपादक जॉन विडाल ने लिखा है, ऐसे समय में, जब दुनिया भर में सात में से एक शख्स भूख की मार झेल रहा है, और चावल की मांग पैदावार से कहीं अधिक होने की तरफ़ बढ़ रही है, ये उम्मीद की एक नई किरण है.

लेख में कहा गया है कि अगर विश्व भर के छोटे किसान अपनी पैदावार में 30 प्रतिशत का भी इज़ाफ़ा कर पाते हैं तो ये ग़रीबी मिटाने के प्रयास में एक बड़ा क़दम होगा.

(इस पूरे विषय पर विस्तार से चर्चा देखिएगा ईटीवी नेटवर्क पर बीबीसी हिंदी के टीवी कार्यक्रम ग्लोबल इंडिया में.)

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