बंपर उपज बिहार में, बवाल दुनिया में

सुमंत कुमार किसान नांलदा
Image caption प्रशासन ने कहा है कि विश्व रिकॉर्ड का दावा फ़सल की जांच-परख के बाद ही किया गया.

बिहार सरकार ने एक किसान के खेत में धान की इतनी फसल होने का दावा किया है जितनी इससे पहले दुनिया भर में कहीं नहीं हुई. इसके बाद अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, स्वंयसेवी संस्थाओं और मीडिया का रूख़ दरवेशपुरा की तरफ़ हो गया है.

दूसरी हरित क्रांति से जुड़ी ख़बरें ढ़ूंढ़ते-ढ़ूंढ़ते मेरी नज़र ब्रितानी अख़बार गार्डियन में छपे एक लेख पर पड़ी.

लेख में कहा गया था कि बिहार के नांलदा ज़िले के दरवेशपुरा गांव में एक किसान के खेत में उतनी धान पैदा हुई जितनी इससे पहले दुनिया भर में कहीं नहीं हुई थी.

गार्डियन के पर्यावरण संपादक जॉन विडाल ने लिखा है कि किसान सुमंत कुमार के खेत में एक हेक्टयर में 22.4 टन की दर से हुई उपज उन तीन अरब से अधिक लोगों के लिए 'बहुत बड़ी ख़बर है' जिनका मुख्य भोजन चावल है.

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'किसानों को फ़ायदा'

तक़रीबन 190 साल पुराने अख़बार गार्डियन में छपी इस ख़बर के बाद जैनियों के पवित्र स्थली पावापुरी से भी आगे बसा दरवेशपुरा गांव, अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, स्वंयसेवी संस्थाओं और मिडिया का तीर्थ बन गया है - जहां चीन से लेकर, अमरीका और नीदरलैंड्स तक से लोग पहुंच रहे हैं.

हालांकि गेंहुए रंग और, छरहरे क़द-काठी वाले, सुमंत कुमार कहते हैं कि उन्हें तो पता भी नहीं था कि धान और आलू का कोई रिकॉर्ड भी होता हैं.

बीजों की तैयारी, बुआई और सिंचाई में पारंपरिक तरीक़े से अलग तरह की खेती की पद्धित अपनाने वाली इस विधि को - सिस्टम ऑफ राइस इंटेनसीफीकेशन या श्री विधि के नाम से जानते है.

इसे 'सिस्टम ऑफ़ रूट इंटेनसीफीकेशन' भी बुलाया जाता है.

हालांकि अफ्रीक़ा के मेडागास्कर में एक ईसाई पादरी की मदद से विकसित किए गए तरीक़े के समर्थकों का दावा है कि इसे दुनिया भर के तक़रीबन 40 मुल्कों के किसानों ने अपनाया है, जिससे उनकी उपज कई गुना बढ़ी है, और ज़ाहिर है बेहतर आमदनी ने उनकी ज़िंदगी में बेहतरी लाई है.

नांनद गांव के धनंजय सिंह पिछले दो सालों से इसी विधि से खेती कर रहे हैं. इस बार उन्होंने आठ बीघे खेत में गेंहू की खेती भी श्री विधि से ही की है.

वो कहते हैं, “पहले ले-देके सब बराबर हो जाता है, लेकिन अब पहले से ठीक है. बच्चों को स्कूल भेज रहा हूं. घर बनवाने में भी हाथ लगा दिया है.”

भारत के केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के हवाले से कहा गया है कि सरकार के राष्ट्रीय भोजन सुरक्षा मिशन के तहत श्री विधि को 16 राज्यों में बढ़ावा दिया जा रहा है.

वैज्ञानिकों के बीच बहस

दिन ब-दिन बढ़ते ख़र्च और पर्यावरण को हो रहे नुक़सान की वजह से भारत की पहली हरित क्रांति तकनीक की हाल के दिनों में जिस तरह आलोचना होती रही है, समझा जा रहा था कि श्री विधि कृषि में एक विकल्प बनकर उभरेगी.

नोबेल पुरुस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसफ़ स्टिग्लिट्स ने भी दरवेशपुरा का दौरा किया, और कहा है कि वैज्ञानिकों को वहां जाकर किसानों से सीख लेनी चाहिए.

लेकिन वैज्ञानिकों का एक बड़ा वर्ग अभी भी इसे कृषि प्रबंधन से अधिक कुछ मानने को तैयार नहीं.

अंतरराष्ट्रीय चावल रिसर्च संस्थान के डिप्टी डॉयरेक्टर जनरल अचिम डोबरमैन ने गार्डियन में छपे लेख के बारे में कहा है, ''मुझे उम्मीद है लोग इस तरह की बातों से आगे बढ़कर उन चीज़ों पर ध्यान देंगे जिनकी सत्यता प्रमाणित हो चुकी है.''

लेकिन कार्नेल यनिवर्सिटी के नॉर्मन अपहोफ आलोचनाओं के जवाब में कहते हैं कि पिछले लगभग चार दशकों से वैज्ञानिकों का ध्यान महज़ बीज की गुणवत्ता बढ़ाने और कृत्रिम खाद के इस्तेमाल पर रहा है और फ़सल के प्रबंधन की बात ही नहीं की गई है.

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