संजय दत्त के बहाने, जद्दन बाई के तराने

  • 28 मार्च 2013
Image caption प्रेस कॉन्फ्रेंस में रो पड़े संजय. कहा सज़ा के खिलाफ़ अपील नहीं करेंगे.

मुंबई में 1993 में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के मामले में संजय दत्त को प्रतिबंधित हथियार रखने का दोषी मानते हुए भारत की सर्वोच्च अदालत ने पांच साल की क़ैद की सज़ा सुनाई है. गुरुवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए संजय दत्त फूट पड़े और कहा कि वो अदालत के इस फैसले कि खिलाफ़ अपील नहीं करेंगे.

इस बार होली में जब सारी दुनिया रंग और उल्लास में डूबी थी तो संजय दत्त के घर में मातम पसरा था. उन्होंने ये स्वीकार कर लिया है कि अगले साढ़े तीन साल वो जेल में बिताएंगे. सवाल उठता है कि संजय की जड़ें क्या इस तर्क का समर्थन कर सकती हैं कि वो हिंदू विरोधी या मुस्लिम विरोधी किसी काम को अंजाम दे सकते हैं?

जद्दन बाई

इन्हीं सवालों से उलझता इस बार होली पर मैं एक बार फिर यूट्यूब पर जद्दन बाई की रचना राग दुर्गा में सुन रहा था. सुरों के आरोह-अवरोह से ऐसा महसूस हो रहा था कि उन्होंने इसे 1930 के दशक में गाया होगा. 78आरपीएम के पुराने रिकॉर्ड से निकलनेवाले गीत के बोल थे, “रूप, जोबन, गुण धरे रहते हैं इन भागन के आगे.” अवधी की इस रचना का हिंदी अभिप्राय है कि भाग्य के आगे रूप, यौवन, गुण – ये सब धरे के धरे रह जाते हैं. हैरानी नहीं होनी चाहिए कि कई लोग जो खुद को अयोध्या की विरासत को हिंदू होने से जोड़ते हैं वो अवधी की इन पंक्तियों का अर्थ शायद ही समझते हैं. अवधी वो भाषा है जिसमें तुलसीदास ने हिंदुओं के शोषण के लिए बदनाम किए गए मुग़लकाल में ‘रामचरितमानस’ लिखी थी. मलिक मोहम्मद जायसी और अब्दुल रहीम ख़ानेख़ाना शायद इस पंक्ति का संदेश बेहतर समझते.

न तो जद्दन बाई और न ही राग दुर्गा की पहचान रंगों के त्योहार होली से है. आमतौर पर होली के समय जो राग गाए जाते हैं उनमें खमाज, पीलू, ग़ारा और काफ़ी महत्वपूर्ण हैं जो कि या तो दोपहर के बाद या पहले गाए जानेवाले राग हैं.

लेकिन आज होली के गीतों का मिज़ाज बदल गया है. अब होली मनाने वाले लोग माइकल जैक्सन की भोंडी नकल वाले संगीत थिरकते हैं.

Image caption 1993 में मुंबई में हुए धमाकों के सिलसिले में संजय दत्त को सज़ा सुनाई गई है.

लेकिन होली की कई संगीत रचनाएं भैरवी, तिलक कामोद जैसे रागों में हैं जिनमें मिथकीय देव कृष्ण और राधा की लीलाओं का उत्सव गान किया गया है.

गंगा-जमुनी विरासत

होली के हफ्ते की शुरुआत में मैं कराची से आई अपनी भांजी को लेकर दिल्ली में ठुमरी के एक समारोह में गया जिसमें 80 वर्ष से ज्यादा की हो चली मशहूर शात्रीय गायिका गिरिजा देवी का गायन होना था. वो शायद भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब वाली गायकी की विरासत की कुछ आखिरी स्तंभों में से एक हैं. उनके समकालीन समकक्षों में रसूलन बाई थीं जो जद्दन बाई की तरह ही दरबारी नाचने-गाने की परंपरा से जुड़ी थीं. रसूलन बाई ने अपने विशिष्ट स्वर में राम और कृष्ण की भक्ति के कुछ पद गाए थे. उन्होंने 1970 के दशक में गाना तब छोड़ दिया था जब अहमदाबाद में उनके घर को एक हिंदू भीड़ ने जला दिया था.

ये रोचक जानकारी है कि जिस अहमदाबाद ने नरेंद्र मोदी के धार्मिक असहिष्णुता के ब्रांड को आगे बढ़ाया, वहां बेगम अख्तर और कई अन्य मुसलमान संगीतकारों और कवियों-शायरों को भरपूर प्यार मिला. बेगम अख्तर की मौत अहमदाबाद में ही एक संगीत कार्यक्रम के दौरान हुई थी. जो कि इस बात का प्रतीक सा बन गया है कि अहमदाबाद से उन्हें इतना प्रेम था कि प्राण भी वहीं त्यागा.

मोदी के राज में

हाल ही में मोदी के समर्थकों ने 17वीं सदी के शायर वली दक्कनी की क़ब्र का अनादर किया. ये वही वली दक्कनी हैं जिन्होंने हिंदुओं के मक्का कहलानेवाले वाराणसी के बारे में कभी लिखा था, “कुचा ए यार ऐन कासी है, जोगिया दिल वहीं का बासी है.”

मोदी समर्थकों ने बड़ौदा में फ़य्याज़ ख़ान की कब्र का भी अनादर किया. वो एक ऐसे गायक थे जिन्होंने अपनी कई रचनाएं कृष्ण और उनकी लीला को समर्पित कीं. गोपियों के साथ कृष्ण की रास लीलाओं को अपनी रचना में जगह देनेवाले विख्यात लोगों में नवाब वाजिद अली शाह का नाम प्रमुख है. अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता के नज़दीक मटिया बुर्ज में निर्वासित किए जाने से पहले अवध के इस नवाब ने ठुमरी और कथक नृत्य के लिए पद लिखे जिनमें कृष्ण की लीलाओं और उनसे जुड़ी होली के उल्लास का महिमामंडन है.

वयोवृद्ध कथक नर्तक बिरजू महाराज ने नवाब की विरासत को संभाल रखा है. पिछले हफ्ते उनके शिष्यों ने जब प्रह्लाद की कथा को नृत्य नाटिका के माध्यम से मंच पर जीवंत किया तो कराची से आई मेहमान धन्य हो गई. होली मनाने की परंपरा प्रह्लाद कथा से भी जुड़ी है. मेरी भांजी ने बताया कि कथक की विरासत को पाकिस्तान में शीमा किरमानी नाम की नृत्यांगना बहुत परिश्रम से बचाने की कोशिश कर रही हैं.

संजय की जड़ों की तलाश

Image caption मदर इंडिया का किरदार निभानेवाली संजय दत्त की मां नरगिस के पिता हिंदू थे.

सवाल उठता है कि जब मेरे आसपास की दुनिया रंगों से होली मना रही थी और भांग के तरंग में डूबी थी तो मुझे जद्दन बाई और राग दुर्गा सुनने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई? हक़ीकत ये है कि मैं उस संजय दत्त के ख़ानदान की जड़ें तलाशने में लगा था जो फिल्मों में ख़राब अदाकारी करते थे लेकिन खुद एक अच्छे दिल वाले इनसान हैं. हाल ही में उन्हें मुंबई में 1993 में हुए बम धमाकों में कथित भूमिका के मामले में पांच साल क़ैद की सज़ा सुनाई गई है. उनके पास एक प्रतिबंधित बंदूक और शायद एक पिस्तौल पाई गई थी जो कि उन्होंने मुंबई अंडरवर्ल्ड के अपने कथित दोस्तों से हासिल किया था.

संजय दत्त में हिंदू और मुस्लिम दोनों ख़ून हैं अगर खून को आप इस तरह समझ सकें. उनकी मां 1950 के दशक की मशहूर अदाकारा नरगिस थीं जो कि जद्दन बाई की बेटी थीं. जद्दन बाई के तीन बच्चे थे जिनके पिता तीन अलग-अलग शख्स थे, जिनमें दो हिंदू थे और एक मुसलमान. नरगिस के पिता हिंदू थे और वो अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने जद्दन बाई से ब्याह रचाया था. संजय के पिता सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण थे. किंवदंती है कि हुसैनी ब्राह्मणों ने यज़ीद की सेना के खिलाफ़ कर्बला की लड़ाई में हिस्सा लिया था.

'लाचार मुसलमान'

संजय दत्त से जुड़ी धार्मिक विरासत की परंपरा चाहे जो रही हो, हक़ीक़त है कि उन्होंने 1993 में मुस्लिमों के खिलाफ़ हुई हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी. शायद उनके भीतर अपनी जड़ों को लेकर एक असुरक्षा की भावना पैदा हो गई हो जो आज खुद को लाचार महसूस करने वाले मुसलमानों में पाई जाती है.

ये भारत में ही हो सकता है कि होली का सबसे लोकप्रिय गीत शकील बयायूंनी ने लिखा, उसे नौशाद ने संगीतबद्ध किया और गाया शमशाद बेगम ने और इसे फिल्माया गया था नरगिस पर. गीत था - “होली आई से कन्हाई, रंग छलके, सुना दे ज़रा बांसूरी”. इस ऐतिहासिक फिल्म में नरगिस ने मदर इंडिया का किरदार निभाया था. नरगिस का धर्म क्या था? इस गीत में गोपियां नटखट कृष्ण से गुज़ारिश कर रही हैं कि वो होली के मौके पर अपनी जादूई बांसुरी बजाना बंद न करें. संजय दत्त की त्रासदी और जद्दन बाई की धर्मों की दीवार को तोड़ती विरासत इसी गीत के मध्यम होते सुर से बंधे से लगते हैं.

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